अङ्ग्रेजी
1The Blessed Lord said, "O Arjuna, hear how you shall, without doubt, know Me fully, with your mind intent on Me, practicing Yoga and taking refuge in Me."
2I will declare to you in full this knowledge combined with realization, after knowing which nothing else remains to be known here.
3Among thousands of men, one may perchance strive for perfection; even among those successful strivers, only one may perchance know Me in essence.
4Earth, water, fire, air, ether, mind, intellect, and egoism—thus is My Nature divided eightfold.
5O mighty-armed Arjuna, this is the inferior Prakriti; know it as distinct from My higher Prakriti, the very life-element, by which this world is upheld.
6Know that these two are the womb of all beings; thus, I am the source and dissolution of the whole universe.
7There is nothing higher than Me, O Arjuna. All this is strung on Me, like clusters of gems on a string.
8I am the flavor in water, O Arjuna; I am the light in the moon and the sun; I am the syllable Om in all the Vedas, sound in the ether and virility in men.
9I am the sweet fragrance in the earth and the brilliance in the fire, the life in all beings, and I am the austerity of ascetics.
10Know Me, O Arjuna, as the eternal seed of all beings; I am the intelligence of the intelligent, and the splendour of the splendid objects.
11Of the strong, I am the strength devoid of desire and attachment, and in all beings, I am the desire in accordance with Dharma, O Arjuna.
12Whatever beings (and objects) that are pure, active, and inert, know that they proceed from Me. They are in Me, yet I am not in them.
13Deluded by these Natures, composed of the three qualities of Nature, all this world does not know Me as distinct from them and immutable.
14Verily, this divine illusion of Mine, composed of the three qualities, is difficult to cross over; those who take refuge in Me alone, can cross over this illusion.
15The evil-doers and the deluded, who are the lowest of men, do not seek Me; those whose knowledge is destroyed by illusion follow the ways of demons.
16Four kinds of virtuous men worship Me, O Arjuna, and they are the distressed, the seekers of knowledge, the seekers of wealth, and the wise, O Lord of the Bharatas.
17Of them, the wise who are ever steadfast and devoted to the One, excel; for I am exceedingly dear to the wise, and they are dear to Me.
18Indeed, all these are noble; however, I consider the wise man as My very Self; for, he is steadfast in mind and established in Me alone as the supreme goal.
19At the end of many births, the wise man comes to Me, realizing that all this is Vaasudeva (the innermost Self); such a great soul (Mahatma) is very hard to find.
20Those whose wisdom has been taken away by this or that desire, go to other gods, following this or that rite, led by their own nature.
21Whatever form any devotee desires to worship with faith, I make that same faith of his firm and unflinching.
22Endowed with that faith, he engages in the worship of that form and obtains his desired outcome, which is ordained by Me alone.
23Verily, the reward (fruit) that accrues to those men of small intelligence is finite. The worshippers of the gods go to them, whereas My devotees come to Me.
24The foolish think of Me, the Unmanifest, as having manifestation, not knowing My higher, immutable, and most excellent nature.
25I am not manifest to all, veiled as I am by the Yoga-Maya. This deluded world does not know Me, who am unborn and imperishable.
26I know, O Arjuna, the beings of the past, the present, and the future; however, no one knows Me.
27O Bharata, all beings are subject to delusion at birth due to the delusion of the pairs of opposites arising from desire and aversion, O Parantapa.
28But those men of virtuous deeds, whose sins have come to an end and who are freed from the delusion of the pairs of opposites, worship Me steadfastly, with their vows.
29Those who strive for liberation from old age and death, taking refuge in Me, realize in full that Brahman, the whole knowledge of the Self, and all action.
30Those who know Me with the Adhibhuta (pertaining to the elements), Adhidaiva (pertaining to the gods), and the Adhiyajna (pertaining to the sacrifice) know Me even at the time of death, remaining steadfast in mind.
हिन्दी
1हे पार्थ ! मुझमें असक्त हुए मन वाले तथा मदाश्रित होकर योग का अभ्यास करते हुए जिस प्रकार तुम मुझे समग्ररूप से, बिना किसी संशय के, जानोगे वह सुनो।।
2मैं तुम्हारे लिए विज्ञान सहित इस ज्ञान को अशेष रूप से कहूँगा जिसको जानकर यहाँ (जगत् में) फिर और कुछ जानने योग्य (ज्ञातव्य) शेष नहीं रह जाता है।।
3सहस्रों मनुष्यों में कोई ही मनुष्य पूर्णत्व की सिद्धि के लिए प्रयत्न करता है और उन प्रयत्नशील साधकों में भी कोई ही पुरुष मुझे तत्त्व से जानता है।।
4पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश तथा मन, बुद्धि और अहंकार - यह आठ प्रकार से विभक्त हुई मेरी प्रकृति है।।
5हे महाबाहो ! यह अपरा प्रकृति है। इससे भिन्न मेरी जीवरूपी पराप्रकृति को जानो, जिससे यह जगत् धारण किया जाता है।।
6यह जानो कि समम्पूर्ण भूत इन दोनों प्रकृतियों से उत्पत्ति वाले हैं। (अत:) मैं सम्पूर्ण जगत् का उत्पत्ति तथा प्रलय स्थान हूँ।।
7हे धनंजय ! मुझसे श्रेष्ठ (परे) अन्य किचिन्मात्र वस्तु नहीं है। यह सम्पूर्ण जगत् सूत्र में मणियों के सदृश मुझमें पिरोया हुआ है।।
8हे कौन्तेय ! जल में मैं रस हूँ, चन्द्रमा और सूर्य में प्रकाश हूँ, सब वेदों में प्रणव (ँ़कार) हूँ तथा आकाश में शब्द और पुरुषों में पुरुषत्व हूँ।।
9पृथ्वी में पवित्र गन्ध हूँ और अग्नि में तेज हूँ; सम्पूर्ण भूतों में जीवन हूँ और तपस्वियों में मैं तप हूँ।।
10हे पार्थ ! सम्पूर्ण भूतों का सनातन बीज (कारण) मुझे ही जानो; मैं बुद्धिमानों की बुद्धि और तेजस्वियों का तेज हूँ।।
11हे भरत श्रेष्ठ ! मैं बलवानों का कामना तथा आसक्ति से रहित बल हूँ और सब भूतों में धर्म के अविरुद्ध अर्थात् अनुकूल काम हूँ।।
12जो भी सात्त्विक (शुद्ध), राजसिक (क्रियाशील) और तामसिक (जड़) भाव हैं, उन सबको तुम मेरे से उत्पन्न हुए जानो; तथापि मैं उनमें नहीं हूँ, वे मुझमें हैं।।
13त्रिगुणों से उत्पन्न इन भावों (विकारों) से सम्पूर्ण जगत् (लोग) मोहित हुआ इन (गुणों) से परे अव्यय स्वरूप मुझे नहीं जानता है।।
14यह दैवी त्रिगुणमयी मेरी माया बड़ी दुस्तर है। परन्तु जो मेरी शरण में आते हैं, वे इस माया को पार कर जाते हैं।।
15दुष्कृत्य करने वाले, मूढ, नराधम पुरुष मुझे नहीं भजते हैं; माया के द्वारा जिनका ज्ञान हर लिया गया है, वे आसुरी भाव को धारण किये रहते हैं।।
16हे भरत श्रेष्ठ अर्जुन ! उत्तम कर्म करने वाले (सुकृतिन:) आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी और ज्ञानी ऐसे चार प्रकार के लोग मुझे भजते हैं।।
17उनमें भी मुझ से नित्ययुक्त, अनन्य भक्ति वाला ज्ञानी श्रेष्ठ है, क्योंकि ज्ञानी को मैं अत्यन्त प्रिय हूँ और वह मुझे अत्यन्त प्रिय है।।
18(यद्यपि) ये सब उत्कृष्ट हैं, परन्तु ज्ञानी तो मेरा स्वरूप ही है ऐसा मेरा मत है, क्योंकि वह स्थिर बुद्धि ज्ञानी अति उत्तम गतिस्वरूप मुझमें अच्छी प्रकार स्थित है।।
19बहुत जन्मों के अन्त में (किसी एक जन्म विशेष में) ज्ञान को प्राप्त होकर कि 'यह सब वासुदेव है' ज्ञानी भक्त मुझे प्राप्त होता है; ऐसा महात्मा अति दुर्लभ है।।
20भोगविशेष की कामना से जिनका ज्ञान हर लिया गया है, ऐसे पुरुष अपने स्वभाव से प्रेरित हुए अन्य देवताओं को विशिष्ट नियम का पालन करते हुए भजते हैं।।
21जो-जो (सकामी) भक्त जिस-जिस (देवता के) रूप को श्रद्धा से पूजना चाहता है, उस-उस (भक्त) की मैं उस ही देवता के प्रति श्रद्धा को स्थिर करता हूँ।।
22वह (भक्त) उस श्रद्धा से युक्त होकर उस देवता का पूजन करता है और उससे मेरे द्वारा विधान किये हुये इच्छित भोगों को नि:सन्देह प्राप्त करता है।।
23परन्तु उन अल्प बुद्धि पुरुषों का वह फल नाशवान् होता है। देवताओं के पूजक देवताओं को प्राप्त होते हैं और मेरे भक्त मुझे ही प्राप्त होते हैं।।
24बुद्धिहीन पुरुष मेरे अनुत्तम (सर्वोत्तम) अव्यय परम भाव को न जानते हुए मुझ अव्यक्त को व्यक्त मानते हैं।।
25अपनी योगमाया से आवृत्त मैं सबको प्रत्यक्ष नहीं होता हूँ। यह मोहित लोक (मनुष्य) मुझ जन्मरहित, अविनाशी को नहीं जानता है।।
26हे अर्जुन ! पूर्व में व्यतीत हुए और वर्तमान में स्थित तथा भविष्य में होने वाले भूतमात्र को मैं जानता हूँ, परन्तु मुझे कोई भी पुरुष नहीं जानता हैं।।
27हे परन्तप भारत ! इच्छा और द्वेष से उत्पन्न द्वन्द्वमोह से भूतमात्र उत्पत्ति काल में ही संमोह (अविवेक) को प्राप्त होते हैं।।
28परन्तु जिन पुण्यकर्मी पुरुषों का पाप नष्ट हो गया है, वे द्वन्द्वमोह से निर्मुक्त और दृढ़वती पुरुष मुझे भजते हैं।।
29जो मेरे शरणागत होकर जरा और मरण से मुक्ति पाने के लिए यत्न करते हैं, वे पुरुष उस ब्रह्म को, सम्पूर्ण अध्यात्म को और सम्पूर्ण कर्म को जानते हैं।।
30जो पुरुष अधिभूत और अधिदैव तथा अधियज्ञ के सहित मुझे जानते हैं, वे युक्तचित्त वाले पुरुष अन्तकाल में भी मुझे जानते हैं।।
नेपाली
1श्रीभगवान्ले भने — हे पार्थ! ममा आसक्तचित्त भएर, मेरै आश्रयमा रहेर योगाभ्यास गर्दा तिमी कसरी निःसन्देह पूर्ण रूपमा मलाई जान्न सक्छौ, सुन।
2अब म तिमीलाई विज्ञानसहित यो ज्ञान पूर्ण रूपले बताउँछु; यो जानेपछि यस संसारमा अरू केही जान्नुपर्ने रहँदैन।
3हजारौँ मानिसमध्ये कोही एकले सिद्धिको लागि प्रयत्न गर्छ; ती प्रयत्नशील सिद्धमध्ये पनि बिरलैले मलाई तत्त्वतः जान्छ।
4पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि र अहङ्कार — यसरी मेरो प्रकृति आठ भागमा विभाजित छ।
5हे महाबाहु! यो मेरो अपरा प्रकृति हो; यसभन्दा भिन्न मेरो परा प्रकृति, जीवस्वरूप, जान — जसले यो संसारलाई धारण गरेको छ।
6यी दुई प्रकृति नै सम्पूर्ण प्राणीका योनि हुन् भनी जान; म नै सम्पूर्ण जगत्को उत्पत्ति र प्रलयको कारण हुँ।
7हे धनञ्जय! मभन्दा श्रेष्ठ अरू केही छैन; डोरीमा मणिको माला उनिएझैँ यो सबै ममा उनिएको छ।
8हे कौन्तेय! म पानीको स्वाद हुँ, चन्द्र र सूर्यको प्रकाश हुँ; सम्पूर्ण वेदहरूको ओङ्कार, आकाशको शब्द र पुरुषको पौरुष म नै हुँ।
9म पृथ्वीको पवित्र सुगन्ध र अग्निको तेज हुँ, सबै प्राणीको जीवन हुँ र तपस्वीहरूको तप पनि म नै हुँ।
10हे पार्थ! मलाई सम्पूर्ण प्राणीको सनातन बीज जान्नुहोस्; बुद्धिमान्हरूको बुद्धि र तेजस्वीहरूको तेज म नै हुँ।
11हे भरतर्षभ! बलवान्हरूको काम-राग-रहित बल म नै हुँ; प्राणीहरूमा धर्मविरुद्ध नभएको काम म नै हुँ।
12सात्त्विक, राजस र तामस — जे जे भाव छन्, ती सबै मबाटै उत्पन्न भएका जान; तर ती ममा छन्, म ती मा छैनँ।
13त्रिगुणात्मक यी भावले मोहित भएर यो सम्पूर्ण जगत्ले यिनभन्दा परका, अव्यय मलाई चिन्दैन।
14मेरो यो त्रिगुणमयी दैवी माया दुस्तर छ; जो मलाई नै शरण लिन्छन्, तिनले मात्र यो माया तर्न सक्छन्।
15मायाद्वारा अपहृत ज्ञानवाला, असुरी भाव अपनाएका मायावी, मूढ नराधमहरूले मेरो भजन गर्दैनन्।
16हे भरतर्षभ! आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी र ज्ञानी — यी चार प्रकारका सुकृति मानिसले मलाई भज्छन्।
17तिनमध्ये नित्य योगयुक्त, एकनिष्ठ-भक्ति राख्ने ज्ञानी श्रेष्ठ छ; किनकि म ज्ञानीलाई अत्यन्त प्रिय छु र ऊ मलाई प्रिय छ।
18यी सबै नै उदार हुन्; तर ज्ञानी त मेरो आत्मा नै हो भन्ने म ठान्छु; किनकि स्थिरचित्त त्यो मलाई नै परमगति ठानेर ममा स्थित रहन्छ।
19धेरै जन्मपछि ज्ञानी मलाई प्राप्त गर्छ — 'यो सबै वासुदेव नै हो' भनी जान्दछ; त्यस्तो महात्मा अत्यन्त दुर्लभ छ।
20जसको ज्ञान कामनाहरूले अपहृत भएको छ, ती मानिस आ-आफ्नो स्वभाव अनुसार नियम पालन गर्दै अरू देवताहरूतर्फ जान्छन्।
21जुन-जुन भक्तले श्रद्धापूर्वक जुन-जुन देवताको पूजा गर्न चाहन्छ, मै नै त्यसको त्यो श्रद्धा अचल बनाउँछु।
22त्यो श्रद्धायुक्त भक्त त्यो देवताको पूजा गरेर आफ्ना इच्छित कामना पाउँछ; ती कामनाहरू मैले नै विधान गरेका हुन्।
23तर अल्पबुद्धिहरूले पाउने त्यो फल अन्तवान् हुन्छ; देवपूजकहरू देवतालाई पाउँछन्, मेरा भक्तहरू मलाई नै पाउँछन्।
24मूर्खहरूले मेरो परम, अव्यय र अनुपम स्वरूप नजानेकाले अव्यक्त मलाई व्यक्तिगत मानेर ठान्छन्।
25योगमायाले छोपिएको म सबैका लागि प्रकट छैनँ; अजन्मा, अव्यय मलाई यो मोहित संसारले चिन्दैन।
26हे अर्जुन! भूत, वर्तमान र भविष्यमा भएका सबै प्राणीहरूलाई म जान्दछु; तर मलाई कसैले पनि पूर्ण रूपमा जान्दैन।
27हे भारत, हे परन्तप! इच्छा-द्वेषबाट उत्पन्न द्वन्द्वले मोहित भएर सम्पूर्ण प्राणी जन्ममै नै मोहमा परेका हुन्छन्।
28तर पुण्यकर्म गरेका जसका पाप क्षीण भएका छन्, ती द्वन्द्वमोहबाट मुक्त भएर दृढ-व्रती भएर मलाई भज्छन्।
29जरा र मरणबाट मुक्तिका लागि ममा शरण लिएर प्रयत्न गर्नेहरूले ब्रह्म, अध्यात्म र सम्पूर्ण कर्म पनि जान्दछन्।
30जो मलाई अधिभूत, अधिदैव र अधियज्ञसहित जान्दछन्, ती युक्तचित्त मानिसहरूले मरणकालमा पनि मलाई जान्दछन्।