अङ्ग्रेजी
1The Blessed Lord said, "I will again declare to thee that supreme knowledge, the best of all knowledge, having known which all the sages have gone to supreme perfection after this life."
2Those who, having taken refuge in this knowledge, have attained unity with Me, are neither born at the time of creation nor disturbed at the time of dissolution.
3My womb is the great Brahma; in it I place the germ; thence, O Arjuna, is the birth of all beings.
4Whatever forms are produced, O Arjuna, in any womb whatsoever, the great Brahma is their womb, and I am the seed-giving father.
5These qualities, O Arjuna, born of Nature, bind fast in the body of the embodied, the indestructible: purity, passion, and inertia.
6Of these, sattva, which is luminous and healthy due to its stainlessness, binds one by attachment to happiness and knowledge, O sinless one.
7Know, O Arjuna, that Rajas is of the nature of passion, the source of thirst and attachment; it binds fast the embodied one by attachment to action.
8But know thou Tamas to be born of ignorance, deluding all embodied beings; it binds fast, O Arjuna, through heedlessness, indolence, and sleep.
9Sattva attaches to happiness, Rajas to action, O Arjuna, while Tamas, verily shrouding knowledge, attaches to heedlessness.
10Now, O Arjuna, Sattva prevails, having overpowered Rajas and Tamas; then Rajas, having overpowered Sattva and Tamas; and then Tamas, having overpowered Sattva and Rajas.
11When the wisdom-light shines through every gate of this body, then it may be known that Sattva is predominant.
12Greed, activity, the undertaking of actions, restlessness, and longing—these arise when Rajas is predominant, O Arjuna.
13Darkness, inertia, carelessness, and delusion—these arise when Tamas is predominant, O Arjuna.
14If the embodied one meets death when Sattva is predominant, then they attain the spotless worlds of the knowers of the Highest.
15Meeting death in Rajas, he is born among those who are attached to action; and dying in Tamas, he is born in the womb of the thoughtless.
16They say that the fruit of good action is Sattvic and pure; indeed, the fruit of Rajas is pain, and the fruit of Tamas is ignorance.
17From Sattva arises knowledge, and greed from Rajas; heedlessness and delusion arise from Tamas, and also ignorance.
18Those seated in Sattva ascend; those of Rajasic nature dwell in the middle; and those of Tamasic nature, abiding in the function of the lowest Guna, descend.
19When the seer beholds no agent other than the Gunas and knows that which is higher than them, he attains to My Being.
20The embodied one, having crossed beyond these three Gunas from which the body is evolved, is freed from birth, death, decay, and pain, and attains immortality.
21Arjuna said, "What are the marks of one who has transcended the three qualities, O Lord? What is their conduct, and how do they go beyond these three qualities?"
22The Blessed Lord said, "When light, activity, and delusion are present, he does not hate them, nor does he long for them when they are absent.
23He who, seated like one unconcerned, is not moved by the dualities, and who, knowing that the dualities are active, is self-centered and does not move.
24Who is the same in pleasure and pain, who dwells in the Self, to whom a clod of earth, a stone, and gold are all alike, who is the same to the dear and the unfriendly, who is firm, and to whom censure and praise are one and the same.
25Who is the same in honor and dishonor, the same to friend and foe, abandoning all undertakings, he is said to have transcended the dualities.
26And he who serves Me with unwavering devotion, he, crossing beyond the dualities, is fit for becoming Brahman.
27For I am the abode of Brahman, the immortal, immutable, and everlasting Dharma, and absolute bliss.
हिन्दी
1श्री भगवान् ने कहा -- समस्त ज्ञानों में उत्तम परम ज्ञान को मैं पुन: कहूंगा, जिसको जानकर सभी मुनिजन इस (लोक) से जाकर (इस जीवनोपरान्त) परम सिद्धि को प्राप्त हुए हैं।।
2इस ज्ञान का आश्रय लेकर मेरे स्वरूप (सार्धम्यम्) को प्राप्त पुरुष सृष्टि के आदि में जन्म नहीं लेते और प्रलयकाल में व्याकुल भी नहीं होते हैं।।
3हे भारत ! मेरी महद् ब्रह्मरूप प्रकृति, (भूतों की) योनि है, जिसमें मैं गर्भाधान करता हूँ; इससे समस्त भूतों की उत्पत्ति होती है।।
4हे कौन्तेय ! समस्त योनियों में जितनी मूर्तियाँ (शरीर) उत्पन्न होती हैं, उन सबकी योनि अर्थात् गर्भ है महद्ब्रह्म और मैं बीज की स्थापना करने वाला पिता हूँ।।
5हे महाबाहो ! सत्त्व, रज और तम ये प्रकृति से उत्पन्न तीनों गुण देही आत्मा को देह के साथ बांध देते हैं।।
6हे निष्पाप अर्जुन ! इन (तीनों) में, सत्त्वगुण निर्मल होने से प्रकाशक और अनामय (निरुपद्रव, निर्विकार या निरोग) है; (वह जीव को) सुख की आसक्ति से और ज्ञान की आसक्ति से बांध देता है।।
7हे कौन्तेय ! रजोगुण को रागस्वरूप जानो, जिससे तृष्णा और आसक्ति उत्पन्न होती है। वह देही आत्मा को कर्मों की आसक्ति से बांधता है।।
8और हे भारत ! तमोगुण को अज्ञान से उत्पन्न जानो; जो समस्त देहधारियों (जीवों) को मोहित करने वाला है। वह प्रमाद, आलस्य और निद्रा के द्वारा जीव को बांधता है।।
9हे भारत ! सत्त्वगुण सुख में आसक्त कर देता है और रजोगुण कर्म में, किन्तु तमोगुण ज्ञान को आवृत्त करके जीव को प्रमाद से युक्त कर देता है।।
10हे भारत ! कभी रज और तम को अभिभूत (दबा) करके सत्त्वगुण की वृद्धि होती है, कभी रज और सत्त्व को दबाकर तमोगुण की वृद्धि होती है, तो कभी तम और सत्त्व को अभिभूत कर रजोगुण की वृद्धि होती है।।
11जब इस देह के द्वारों अर्थात् समस्त इन्द्रियों में ज्ञानरूप प्रकाश उत्पन्न होता है, तब सत्त्वगुण को प्रवृद्ध हुआ जानो।।
12हे भरत-श्रेष्ठ ! रजोगुण के प्रवृद्ध होने पर लोभ, प्रवृत्ति (सामान्य चेष्टा) कर्मों का आरम्भ, शम का अभाव तथा स्पृहा, ये सब उत्पन्न होते हैं।।
13हे कुरुनन्दन ! तमोगुण के प्रवृद्ध होने पर अप्रकाश, अप्रवृत्ति, प्रमाद और मोह ये सब उत्पन्न होते हैं।।
14जब यह जीव (देहभृत्) सत्त्वगुण की प्रवृद्धि में मृत्यु को प्राप्त होता है, तब उत्तम कर्म करने वालों के निर्मल अर्थात् स्वर्गादि लोकों को प्राप्त होता है।।
15रजोगुण के प्रवृद्ध काल में मृत्यु को प्राप्त होकर कर्मासक्ति वाले (मनुष्य) लोक में वह जन्म लेता है तथा तमोगुण के प्रवृद्धकाल में (मरण होने पर) मूढ़योनि में जन्म लेता है।।
16शुभ कर्म का फल सात्विक और निर्मल कहा गया है; रजोगुण का फल दु;ख और तमोगुण का फल अज्ञान है।।
17सत्त्वगुण से ज्ञान उत्पन्न होता है। रजोगुण से लोभ तथा तमोगुण से प्रमाद, मोह और अज्ञान उत्पन्न होता है।।
18सत्त्वगुण में स्थित पुरुष उच्च (लोकों को) जाते हैं; राजस पुरुष मध्य (मनुष्य लोक) में रहते हैं और तमोगुण की अत्यन्त हीन प्रवृत्तियों में स्थित तामस लोग अधोगति को प्राप्त होते हैं।।
19जब द्रष्टा (साधक) पुरुष तीनों गुणों के अतिरिक्त किसी अन्य को कर्ता नहीं देखता, अर्थात् नहीं समझता है और तीनों गुणों से परे मेरे तत्व को जानता है, तब वह मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है।।
20यह देही पुरुष शरीर की उत्पत्ति के कारणरूप तीनों गुणों से अतीत होकर जन्म, मृत्यु, जरा और दु:खों से विमुक्त हुआ अमृतत्व को प्राप्त होता है।।
21अर्जुन ने कहा -- हे प्रभो ! इन तीनो गुणों से अतीत हुआ पुरुष किन लक्षणों से युक्त होता है ? वह किस प्रकार के आचरण वाला होता है ? और, वह किस उपाय से इन तीनों गुणों से अतीत होता है।।
22श्रीभगवान् ने कहा -- हे पाण्डव ! (ज्ञानी पुरुष) प्रकाश, प्रवृत्ति और मोह के प्रवृत्त होने पर भी उनका द्वेष नहीं करता तथा निवृत्त होने पर उनकी आकांक्षा नहीं करता है।।
23जो उदासीन के समान आसीन होकर गुणों के द्वारा विचलित नहीं किया जा सकता और "गुण ही व्यवहार करते हैं" ऐसा जानकर स्थित रहता है और उस स्थिति से विचलित नहीं होता।।
24जो स्वस्थ (स्वरूप में स्थित), सुख-दु:ख में समान रहता है तथा मिट्टी, पत्थर और स्वर्ण में समदृष्टि रखता है; ऐसा वीर पुरुष प्रिय और अप्रिय को तथा निन्दा और आत्मस्तुति को तुल्य समझता है।।
25जो मान और अपमान में सम है; शत्रु और मित्र के पक्ष में भी सम है, ऐसा सर्वारम्भ परित्यागी पुरुष गुणातीत कहा जाता है।।
26जो पुरुष अव्यभिचारी भक्तियोग के द्वारा मेरी सेवा अर्थात् उपासना करता है, वह इन तीनों गुणों के अतीत होकर ब्रह्म बनने के लिये योग्य हो जाता है।।
27क्योंकि मैं अमृत, अव्यय, ब्रह्म, शाश्वत धर्म और ऐकान्तिक अर्थात् पारमार्थिक सुख की प्रतिष्ठा हूँ।।
नेपाली
1श्रीभगवान्ले भने — सबै ज्ञानभन्दा श्रेष्ठ त्यो परम ज्ञान म फेरि भन्छु; जुन जानेर मुनिहरूले यस संसारबाट परम सिद्धि प्राप्त गरेका छन्।
2यो ज्ञानको शरण लिएर मेरो स्वरूपमा एकीभाव प्राप्त गरेकाहरू सृष्टिको प्रारम्भमा जन्मँदैनन् र प्रलयमा व्यथित पनि हुँदैनन्।
3हे भारत! मेरो योनि महान् ब्रह्म हो; त्यसमा म गर्भ राख्छु; त्यसैबाट सम्पूर्ण भूतहरूको उत्पत्ति हुन्छ।
4हे कौन्तेय! जुन-जुन योनिमा जे जति प्राणी जन्मन्छन्, ती सबको योनि महान् ब्रह्म हो र म बीजप्रद पिता हुँ।
5हे महाबाहु! सत्त्व, रजस् र तमस् — यी तीन प्रकृतिजात गुणले अविनाशी आत्मालाई शरीरमा बाँध्छन्।
6तीमध्ये निर्मलताका कारण प्रकाशक र अनामय सत्त्वगुणले हे निष्पाप! सुख र ज्ञानको आसक्तिले बाँध्छ।
7हे कौन्तेय! राग-आत्मक र तृष्णा-सङ्गबाट उत्पन्न रजोगुण देहधारीलाई कर्मासक्तिले बाँध्छ भनी जान।
8हे भारत! अज्ञानबाट उत्पन्न तमस्ले सबै देहधारीलाई मोहित गर्छ; प्रमाद, आलस्य र निद्राद्वारा यसले बाँध्छ।
9हे भारत! सत्त्व सुखमा बाँध्छ, रजस् कर्ममा बाँध्छ; तमस् ज्ञानलाई ढाकेर प्रमादमा बाँध्छ।
10हे भारत! रजस् र तमस्लाई दबाएर सत्त्व बढ्छ; सत्त्व र तमस्लाई दबाएर रजस् बढ्छ; र सत्त्व र रजस्लाई दबाएर तमस् बढ्छ।
11जब यस देहका सबै द्वारबाट ज्ञानको प्रकाश फैलिन्छ, त्यतिबेला सत्त्वगुण बढेको हो भनी जान्नुपर्छ।
12हे भरतर्षभ! लोभ, प्रवृत्ति, कर्मारम्भ, अशान्ति र स्पृहा — यी रजोगुण बढ्दा उत्पन्न हुन्छन्।
13हे कुरुनन्दन! अप्रकाश, अप्रवृत्ति, प्रमाद र मोह — यी तमोगुण बढ्दा उत्पन्न हुन्छन्।
14सत्त्व बढेको समयमा शरीर त्यागे, देहधारीले उत्तम ज्ञानीहरूको निष्पाप लोक प्राप्त गर्छ।
15रजोगुणमा मरे कर्मसङ्गीहरूमा जन्मिन्छ; तमस्मा मरे मूढ-योनिमा जन्मिन्छ।
16सत्कर्मको फल सात्त्विक र निर्मल भनिएको छ; राजसकर्मको फल दुःख र तामस कर्मको फल अज्ञान हो।
17सत्त्वबाट ज्ञान उत्पन्न हुन्छ, रजस्बाट लोभ निःसन्देह उत्पन्न हुन्छ; तमस्बाट प्रमाद, मोह र अज्ञान पनि उत्पन्न हुन्छन्।
18सत्त्वमा स्थितहरू ऊर्ध्वगति पाउँछन्; राजसहरू मध्यमा रहन्छन्; जघन्य तामस वृत्तिमा बसेकाहरू अधोगतिमा जान्छन्।
19जब दर्शीले गुणहरूबाहेक अरू कुनै कर्ता देख्दैन र गुणभन्दा परको तत्त्व जान्दछ, त्यतिबेला मेरो स्वरूप प्राप्त गर्छ।
20शरीरबाट उत्पन्न यी तीन गुणहरूलाई अतिक्रमण गरेर देहधारीले जन्म, मृत्यु, बुढेसकाल र दुःखबाट मुक्त भएर अमृतत्व प्राप्त गर्छ।
21अर्जुनले भने — हे प्रभो! यी तीन गुणलाई अतिक्रमण गरेको पुरुषको लक्षण के हो? उसको आचरण कस्तो हुन्छ? तीन गुणलाई कसरी अतिक्रमण गर्न सकिन्छ?
22श्रीभगवान्ले भने — हे पाण्डव! प्रकाश, प्रवृत्ति र मोह आउँदा द्वेष गर्दैन र निवृत्त भएको समयमा कामना पनि गर्दैन।
23जो उदासीनझैँ बसेर गुणहरूले विचलित हुँदैन; गुण नै वर्तिरहेका छन् भनी जानेर आत्म-स्थित रही चल्दैन।
24जो सुख-दुःखमा समान, आत्मामा स्थित, माटो-ढुङ्गा-सुनलाई समान देख्ने, प्रिय-अप्रियमा समान, धैर्यवान्, निन्दा-स्तुति आफ्ना लागि समान देख्ने —
25मान-अपमानमा समान, मित्र-शत्रुमा समान, सबै आरम्भहरूको त्याग गर्ने पुरुष गुणातीत भनिन्छ।
26जो अव्यभिचारिणी भक्तियोगले मेरो सेवा गर्छ, ऊ यी गुणहरूलाई अतिक्रमण गरेर ब्रह्म-भावको योग्य हुन्छ।
27किनकि म नै ब्रह्मको आधार हुँ — अमृत, अव्यय, सनातन धर्म र ऐकान्तिक सुखको पनि म नै आधार हुँ।