अध्याय 9

राजविद्याराजगुह्ययोग

भगवद गीता का नौवां अध्याय राजविद्याराजगुह्ययोग है। इस अध्याय में, कृष्ण समझाते हैं कि वह सर्वोच्च हैं और यह भौतिक संसार उनकी योगमाया द्वारा रचित और खंडित होता रहता है अथवा मनुष्य उनकी देखरेख में आते जाते रहते हैं। वे हमारी आध्यात्मिक जागरूकता के प्रति भक्ति की भूमिका और महत्व का वर्णन करते हैं। ऐसी भक्ति में मनुष्य को भगवन के लिए ही जीवित रहना चाहिए, अपना सर्वस्व भगवन को ही समर्पित करना चाहिए और सबकुछ भगवन के लिए ही करना चाहिए। जो इस प्रकार की भक्ति का अनुसरण करता है वह इस भौतिक संसार के बंधनों से मुक्त हो जाता है और भगवान के साथ एकजुट हो जाता है।

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श्लोक 1 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

श्री भगवानुवाच इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे। ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्

अंग्रेज़ी

The Blessed Lord said, "I shall now declare to thee, who does not cavil, the greatest secret—the knowledge combined with experience (Self-realisation). Having known this, thou shalt be free from evil."

हिन्दी

श्रीभगवान् ने कहा -- तुम अनसूयु (दोष दृष्टि रहित) के लिए मैं इस गुह्यतम ज्ञान को विज्ञान के सहित कहूँगा, जिसको जानकर तुम अशुभ (संसार बंधन) से मुक्त हो जाओगे।।

नेपाली

श्रीभगवान्ले भने — दोषदृष्टिरहित तिमीलाई म अब विज्ञानसहितको त्यो परम गोप्य ज्ञान भन्छु; यो जानेपछि तिमी अशुभबाट मुक्त हुनेछौ।

श्लोक 2 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम्। प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम्

अंग्रेज़ी

This is the royal science, the royal secret, the supreme purifier, realizable by direct intuitive knowledge, according to righteousness, very easy to perform and imperishable.

हिन्दी

यह ज्ञान राजविद्या (विद्याओं का राजा) और राजगुह्य (सब गुह्यों अर्थात् रहस्यों का राजा) एवं पवित्र, उत्तम, प्रत्यक्ष ज्ञानवाला और धर्मयुक्त है, तथा करने में सरल और अव्यय है।।

नेपाली

यो राजविद्या, राजगुह्य, परम पवित्र, प्रत्यक्ष अनुभवद्वारा जान्न सकिने, धर्मयुक्त, अति सहज र अविनाशी ज्ञान हो।

श्लोक 3 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप। अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि

अंग्रेज़ी

Those who have no faith in this Dharma, O Parantapa, return to the path of this world without attaining Me.

हिन्दी

हे परन्तप ! इस धर्म में श्रद्धारहित पुरुष मुझे प्राप्त न होकर मृत्युरूपी संसार में रहते हैं (भ्रमण करते हैं)।।

नेपाली

हे परन्तप! यो धर्ममा श्रद्धा नभएकाहरू मलाई नपाई संसारको पुनरावृत्ति-मार्गमा फर्किन्छन्।

श्लोक 4 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना। मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः

अंग्रेज़ी

All of this world is pervaded by Me in My unmanifest aspect; all beings exist within Me, but I do not dwell within them.

हिन्दी

यह सम्पूर्ण जगत् मुझ (परमात्मा) के अव्यक्त स्वरूप से व्याप्त है; भूतमात्र मुझमें स्थित है, परन्तु मैं उनमें स्थित नहीं हूं।।

नेपाली

यो सम्पूर्ण जगत् मेरो अव्यक्त स्वरूपले व्याप्त छ; सबै प्राणी ममा छन्, तर म तिनीहरूमा छैनँ।

श्लोक 5 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम्। भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः

अंग्रेज़ी

Nor do beings exist in Me (in reality); behold, My divine Yoga, which supports all beings, but does not dwell in them, is My Self, the efficient cause of beings.

हिन्दी

और (वस्तुत:) भूतमात्र मुझ में स्थित नहीं है; मेरे ईश्वरीय योग को देखो कि भूतों को धारण करने वाली और भूतों को उत्पन्न करने वाली मेरी आत्मा उन भूतों में स्थित नहीं है।।

नेपाली

र वास्तवमा ती प्राणी ममा पनि छैनन्; मेरो ईश्वरीय योग हेर — सबै भूतलाई पाल्ने तरै पनि भूतमा नस्थित मेरो आत्मा नै भूतहरूको कारण हो।

श्लोक 6 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

यथाऽऽकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान्। तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय

अंग्रेज़ी

As the mighty wind, moving everywhere, always rests in the ether, so too, know that all beings rest in Me.

हिन्दी

जैसे सर्वत्र विचरण करने वाली महान् वायु सदा आकाश में स्थित रहती हैं, वैसे ही सम्पूर्ण भूत मुझमें स्थित हैं, ऐसा तुम जानो।।

नेपाली

जसरी सबैतिर गति गर्ने महान् वायु सदा आकाशमै रहन्छ, त्यसरी नै सबै प्राणी ममा स्थित छन् भनी जान।

श्लोक 7 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम्। कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम्

अंग्रेज़ी

All beings, O Arjuna, go into My Nature at the end of a Kalpa; I send them forth again at the beginning of the next Kalpa.

हिन्दी

हे कौन्तेय ! (एक) कल्प के अन्त में समस्त भूत मेरी प्रकृति को प्राप्त होते हैं; और (दूसरे) कल्प के प्रारम्भ में उनको मैं फिर रचता हूँ।।

नेपाली

हे कौन्तेय! कल्पको अन्तमा सम्पूर्ण भूत मेरो प्रकृतिमा लीन हुन्छन्; अनि कल्पको आदिमा म तिनलाई पुनः सृष्टि गर्छु।

श्लोक 8 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः। भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात्

अंग्रेज़ी

Animating My Nature, I again and again send forth all this multitude of beings, helpless under the force of Nature.

हिन्दी

प्रकृति को अपने वश में करके (अर्थात् उसे चेतनता प्रदान कर) स्वभाव के वश से परतन्त्र (अवश) हुए इस सम्पूर्ण भूत समुदाय को मैं पुन:-पुन: रचता हूँ।।

नेपाली

आफ्नो प्रकृतिलाई आधार बनाएर म प्रकृतिको वशमा रहेका यी सम्पूर्ण भूत-समूहलाई पटक-पटक उत्पन्न गर्छु।

श्लोक 9 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय। उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु

अंग्रेज़ी

These acts do not bind Me, O Arjuna, sitting as one indifferent, unattached to those acts.

हिन्दी

हे धनंजय ! उन कर्मों में आसक्ति रहित और उदासीन के समान स्थित मुझ (परमात्मा) को वे कर्म नहीं बांधते हैं।।

नेपाली

हे धनञ्जय! ती कर्महरूमा उदासीनझैँ रहेको र अनासक्त म त्यस्ता कर्मले बाँधिँदिनँ।

श्लोक 10 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

मयाऽध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम्। हेतुनाऽनेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते

अंग्रेज़ी

Under Me, as supervisor, Nature produces the moving and the unmoving; therefore, O Arjuna, the world revolves.

हिन्दी

हे कौन्तेय ! मुझ अध्यक्ष के कारण ( अर्थात् मेरी अध्यक्षता में) प्रकृति चराचर जगत् को उत्पन्न करती है; इस कारण यह जगत् घूमता रहता है।।

नेपाली

हे कौन्तेय! मेरो अध्यक्षतामा प्रकृतिले चर र अचर सम्पूर्ण जगत् रच्छ; यसैले संसार चक्रवत् घुम्छ।

श्लोक 11 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्। परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम्

अंग्रेज़ी

Fools disregard Me, clad in human form, not knowing My higher Being as the great Lord of all beings.

हिन्दी

समस्त भूतों के महान् ईश्वर रूप मेरे परम भाव को नहीं जानते हुए मूढ़ लोग मनुष्य शरीरधारी मुझ परमात्मा का अनादर करते हैं।।

नेपाली

सम्पूर्ण भूतका महान् ईश्वरमा रहेको मेरो परम भावलाई नजानेर मूढहरूले मनुष्य-तनुधारी मेरो अवहेलना गर्छन्।

श्लोक 12 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः। राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः

अंग्रेज़ी

They are possessed of the deceitful nature of demons and undivine beings, filled with vain hopes, vain actions, and vain knowledge that is senseless.

हिन्दी

वृथा आशा, वृथा कर्म और वृथा ज्ञान वाले अविचारीजन राक्षसों के और असुरों के मोहित करने वाले स्वभाव को धारण किये रहते हैं।।

नेपाली

व्यर्थ आशा, व्यर्थ कर्म, व्यर्थ ज्ञानसहित मोहित ती मानिसहरू राक्षसी र आसुरी मायामा बसेका हुन्छन्।

श्लोक 13 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः। भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम्

अंग्रेज़ी

But the great souls, O Arjuna, partaking of My divine nature, worship Me with a single-minded devotion, knowing Me as the imperishable source of all beings.

हिन्दी

हे पार्थ ! परन्तु दैवी प्रकृति के आश्रित महात्मा पुरुष मुझे समस्त भूतों का आदिकारण और अव्ययस्वरूप जानकर अनन्यमन से युक्त होकर मुझे भजते हैं।।

नेपाली

हे पार्थ! दैवी प्रकृतिमा आश्रित महात्माहरूले अनन्य चित्तले मलाई भूतादि, अव्यय जानेर भज्छन्।

श्लोक 14 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः। नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते

अंग्रेज़ी

Always glorifying Me, striving, firm in their vows, prostrating themselves before Me, they worship Me with steadfast devotion.

हिन्दी

सतत मेरा कीर्तन करते हुए, प्रयत्नशील, दढ़व्रती पुरुष मुझे नमस्कार करते हुए, नित्ययुक्त होकर भक्तिपूर्वक मेरी उपासना करते हैं।।

नेपाली

ती सदा मेरो कीर्तन गर्दै, दृढ-व्रत भएर प्रयत्न गर्दै, मलाई प्रणाम गर्दै निरन्तर भक्तियुक्त भएर उपासना गर्छन्।

श्लोक 15 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते। एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम्

अंग्रेज़ी

Others also, sacrificing with the wisdom-sacrifice, worship Me, the All-Faced, as one, distinct, and manifold.

हिन्दी

कोई मुझे ज्ञानयज्ञ के द्वारा पूजन करते हुए एकत्वभाव से उपासते हैं, कोई पृथक भाव से, कोई बहुत प्रकार से मुझ विराट स्वरूप (विश्वतो मुखम्) को उपासते हैं।।

नेपाली

अरूले पनि ज्ञान-यज्ञद्वारा मेरो उपासना गर्छन्; कोही एकत्वले, कोही पृथक्त्वले र कोही विश्वरूप मलाई बहुधा रूपमा।

श्लोक 16 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाऽहमहमौषधम्। मंत्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम्

अंग्रेज़ी

I am Kratu; I am Yajna; I am the offering to the manes; I am the medicinal herbs and all plants; I am the Mantra; I am also the ghee or melted butter; I am the fire; I am the oblation.

हिन्दी

मैं ऋक्रतु हूँ; मैं यज्ञ हूँ; स्वधा और औषध मैं हूँ, मैं मन्त्र हूँ, घी हूँ, मैं अग्नि हूँ और हुतं अर्थात् हवन कर्म मैं हूँ।।

नेपाली

क्रतु म नै हुँ, यज्ञ म हुँ, स्वधा म हुँ, औषधि म हुँ, मन्त्र म हुँ, घृत म हुँ, अग्नि म हुँ, हवन पनि म नै हुँ।

श्लोक 17 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

पिताऽहमस्य जगतो माता धाता पितामहः। वेद्यं पवित्रमोंकार ऋक् साम यजुरेव च

अंग्रेज़ी

I am the father of this world, the mother, the dispenser of the fruits of actions, and the grandfather; the one thing to be known, the purifier, the sacred monosyllable (Om), and also the Rik, Sama, and Yajur Vedas.

हिन्दी

मैं ही इस जगत् का पिता, माता, धाता (धारण करने वाला) और पितामह हूँमैं वेद्य (जानने योग्य) वस्तु हूँ, पवित्र, ओंकार, ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद भी मैं ही हूँ।।

नेपाली

यस जगत्को पिता, माता, धाता र पितामह म नै हुँ; एकमात्र जान्नुपर्ने तत्त्व, पवित्रकारी ओङ्कार र ऋक्, साम र यजुर्वेद म नै हुँ।

श्लोक 18 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत्। प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम्

अंग्रेज़ी

I am the goal, the supporter, the Lord, the witness, the abode, the shelter, the friend, the origin, the dissolution, the foundation, the treasure-house, and the imperishable seed.

हिन्दी

गति (लक्ष्य), भरण-पोषण करने वाला, प्रभु (स्वामी), साक्षी, निवास, शरणस्थान तथा मित्र और उत्पत्ति, प्रलयरूप तथा स्थान (आधार), निधान और अव्यय कारण भी मैं हूँ।।

नेपाली

गति, भर्ता, प्रभु, साक्षी, निवास, शरण, मित्र, उत्पत्ति, प्रलय, स्थान, निधान र अव्यय बीज म नै हुँ।

श्लोक 19 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च। अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन

अंग्रेज़ी

As the sun, I give heat; I withhold and send forth the rain; I am immortality and also death, existence and non-existence, O Arjuna.

हिन्दी

हे अर्जुन ! मैं ही (सूर्य रूप में) तपता हूँ; मैं वर्षा का निग्रह और उत्सर्जन करता हूँ। मैं ही अमृत और मृत्यु एवं सत् और असत् हूँ।।

नेपाली

हे अर्जुन! म सूर्य भएर तपाउँछु, वर्षा रोक्छु र वर्षाउँछु; अमृत र मृत्यु, सत् र असत् सबै म नै हुँ।

श्लोक 20 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते। ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोक मश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान्

अंग्रेज़ी

The knowers of the three Vedas, the drinkers of Soma, purified of all sins, worshipping Me through sacrifices, pray for the way to heaven; they reach the holy world of the Lord of the gods and enjoy the divine pleasures of the gods in heaven.

हिन्दी

तीनों वेदों के ज्ञाता (वेदोक्त सकाम कर्म करने वाले), सोमपान करने वाले एवं पापों से पवित्र हुए पुरुष मुझे यज्ञों के द्वारा पूजकर स्वर्ग प्राप्ति चाहते हैं; वे पुरुष अपने पुण्यों के फलरूप इन्द्रलोक को प्राप्त कर स्वर्ग में दिव्य देवताओं के भोग भोगते हैं।।

नेपाली

तीन वेदका वेत्ता, यज्ञद्वारा मलाई पुजेर सोम पिएर पापविहीन भएकाहरू स्वर्गमार्गको प्रार्थना गर्छन्; तिनले देवराजको पुण्यलोक प्राप्त गरेर स्वर्गका दिव्य भोग भोग्छन्।

श्लोक 21 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति। एव त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना गतागतं कामकामा लभन्ते

अंग्रेज़ी

They, having enjoyed the vast heaven, enter the world of mortals when their merit is exhausted; thus abiding by the injunctions of the three (Vedas) and desiring objects of desires, they attain to the state of coming and going.

हिन्दी

वे उस विशाल स्वर्गलोक को भोगकर, पुण्यक्षीण होने पर, मृत्युलोक को प्राप्त होते हैं। इस प्रकार तीनों वेदों में कहे गये कर्म के शरण हुए और भोगों की कामना वाले पुरुष आवागमन (गतागत) को प्राप्त होते हैं।।

नेपाली

विशाल स्वर्ग भोगेर पुण्य क्षीण भएपछि मर्त्यलोकमा फर्किन्छन्; यसरी त्रयी-धर्म पालन गर्ने कामी मानिसहरूले गमनागमनको गति पाउँछन्।

श्लोक 22 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते। तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्

अंग्रेज़ी

For those men who worship Me alone, thinking of no one else, for those ever-united, I secure what they have not already possessed and preserve what they already possess.

हिन्दी

अनन्य भाव से मेरा चिन्तन करते हुए जो भक्तजन मेरी ही उपासना करते हैं, उन नित्ययुक्त पुरुषों का योगक्षेम मैं वहन करता हूँ।।

नेपाली

मलाई अनन्य भावले चिन्तन गर्दै उपासना गर्ने नित्य-योगयुक्त भक्तहरूको योगक्षेम म आफै बहन गर्छु।

श्लोक 23 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयाऽन्विताः। तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम्

अंग्रेज़ी

Even those devotees who, endowed with faith, worship other gods, worship Me alone, O Arjuna, but by the wrong method.

हिन्दी

हे कौन्तेय ! श्रद्धा से युक्त जो भक्त अन्य देवताओं को पूजते हैं, वे भी मुझे ही अविधिपूर्वक पूजते हैं।।

नेपाली

हे कौन्तेय! श्रद्धालु अन्य देवताका भक्तहरूले पनि वास्तवमा मलाई नै पुजिरहेका हुन्छन्, तर अविधिपूर्वक।

श्लोक 24 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च। न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते

अंग्रेज़ी

For I alone am the enjoyer and Lord of all sacrifices; but they do not know Me in reality, and thus they return to this mortal world.

हिन्दी

क्योंकि सब यज्ञों का भोक्ता और स्वामी मैं ही हूँ, परन्तु वे मुझे तत्त्वत: नहीं जानते हैं, इसलिए वे गिरते हैं, अर्थात् संसार को प्राप्त होते हैं।।

नेपाली

किनकि सम्पूर्ण यज्ञको भोक्ता र प्रभु म नै हुँ; तर मलाई तत्त्वतः नचिनेकाले ती फर्केर आउँछन्।

श्लोक 25 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

यान्ति देवव्रता देवान् पितृ़न्यान्ति पितृव्रताः। भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम्

अंग्रेज़ी

The worshippers of the gods go to them; the ancestor-worshippers go to the manes; the worshippers of the deities who preside over the elements go to them; but My devotees come to Me.

हिन्दी

देवताओं के पूजक देवताओं को प्राप्त होते हैं, पितरपूजक पितरों को जाते हैं, भूतों का यजन करने वाले भूतों को प्राप्त होते हैं और मुझे पूजने वाले भक्त मुझे ही प्राप्त होते हैं।।

नेपाली

देवपूजक देवतालाई पाउँछन्, पितृपूजक पितृलाई, भूतपूजक भूतलाई — मेरा भक्तहरू मलाई नै पाउँछन्।

श्लोक 26 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति। तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः

अंग्रेज़ी

Whoever offers Me with devotion a leaf, a flower, a fruit, or a little water, that, so offered devotedly by the pure-minded, I accept.

हिन्दी

जो कोई भी भक्त मेरे लिए पत्र, पुष्प, फल, जल आदि भक्ति से अर्पण करता है, उस शुद्ध मन के भक्त का वह भक्तिपूर्वक अर्पण किया हुआ (पत्र पुष्पादि) मैं भोगता हूँ अर्थात् स्वीकार करता हूँ।।

नेपाली

जसले श्रद्धापूर्वक मलाई पात, फूल, फल वा जल अर्पण गर्छ, शुद्धचित्त भक्तले प्रेमले अर्पण गरेको त्यो म ग्रहण गर्छु।

श्लोक 27 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्। यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्

अंग्रेज़ी

Whatever you do, whatever you eat, whatever you offer in sacrifice, whatever you give, whatever austerity you practice, O Arjuna, do it as an offering to Me.

हिन्दी

हे कौन्तेय ! तुम जो कुछ कर्म करते हो, जो कुछ खाते हो, जो कुछ हवन करते हो, जो कुछ दान देते हो और जो कुछ तप करते हो, वह सब तुम मुझे अर्पण करो।।

नेपाली

हे कौन्तेय! जे गर्छौ, जे खान्छौ, जे होम्छौ, जे दान दिन्छौ, जे तप गर्छौ — त्यो सबै मलाई समर्पण गर।

श्लोक 28 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः। संन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि

अंग्रेज़ी

Thus, you shall be freed from the bonds of actions yielding good and evil fruits; with the mind steadfast in the Yoga of renunciation, and liberated, you shall come to Me.

हिन्दी

इस प्रकार तुम शुभाशुभ फलस्वरूप कर्मबन्धनों से मुक्त हो जाओगे; और संन्यासयोग से युक्तचित्त हुए तुम विमुक्त होकर मुझे ही प्राप्त हो जाओगे।।

नेपाली

यसरी शुभाशुभ फल दिने कर्मबन्धनबाट तिमी मुक्त हुनेछौ; सन्न्यास-योगयुक्त चित्तले मुक्त भएर मलाई प्राप्त गर्नेछौ।

श्लोक 29 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः। ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्

अंग्रेज़ी

I am the same to all beings; there is none hateful or dear to Me; but those who worship Me with devotion are in Me, and I am also in them.

हिन्दी

मैं समस्त भूतों में सम हूँ; न कोई मुझे अप्रिय है और न प्रिय; परन्तु जो मुझे भक्तिपूर्वक भजते हैं, वे मुझमें और मैं भी उनमें हूँ।।

नेपाली

म सबै प्राणीमा समान छु; कोही द्वेष्य र कोही प्रिय छैनन्; तर जो भक्तिले मलाई भज्छन्, ती ममा छन् र म पनि तिनमा छु।

श्लोक 30 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्। साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः

अंग्रेज़ी

Even if the most sinful worships Me, with devotion to no one else, he should indeed be regarded as righteous, for he has rightly resolved.

हिन्दी

यदि कोई अतिशय दुराचारी भी अनन्यभाव से मेरा भक्त होकर मुझे भजता है, वह साधु ही मानने योग्य है, क्योंकि वह यथार्थ निश्चय वाला है।।

नेपाली

अति दुराचारी पनि अनन्य भावले मलाई भजे भने उसलाई साधु नै ठान्नुपर्छ; किनकि उसले उचित निश्चय गरेको छ।

श्लोक 31 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति। कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति

अंग्रेज़ी

Soon he becomes righteous and attains eternal peace; O Arjuna, proclaim thou for certain that My devotee never perishes.

हिन्दी

हे कौन्तेय, वह शीघ्र ही धर्मात्मा बन जाता है और शाश्वत शान्ति को प्राप्त होता है। तुम निश्चयपूर्वक सत्य जानो कि मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता।।

नेपाली

ऊ चाँडै नै धर्मात्मा भएर शाश्वत शान्ति प्राप्त गर्छ; हे कौन्तेय! निश्चय जान — मेरो भक्त कहिल्यै नष्ट हुँदैन।

श्लोक 32 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः। स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम्

अंग्रेज़ी

For, taking refuge in Me, they who, O Arjuna, may be of a sinful birth—women, Vaisyas, and Sudras—attain the Supreme Goal.

हिन्दी

हे पार्थ ! स्त्री, वैश्य और शूद्र ये जो कोई पापयोनि वाले हों, वे भी मुझ पर आश्रित (मेरे शरण) होकर परम गति को प्राप्त होते हैं।।

नेपाली

हे पार्थ! ममा शरण लिएर पापयोनिमा जन्मेका — महिला, वैश्य र शूद्र पनि — परम गति प्राप्त गर्छन्।

श्लोक 33 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा। अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम्

अंग्रेज़ी

How much more easily, then, do Brahmins and devoted royal saints attain the goal? Having come to this impermanent and unhappy world, do thou worship Me.

हिन्दी

फिर क्या कहना है कि पुण्यशील ब्राह्मण और राजर्षि भक्तजन (परम गति को प्राप्त होते हैं); (इसलिए) इस अनित्य और सुखरहित लोक को प्राप्त होकर (अब) तुम भक्तिपूर्वक मेरी ही पूजा करो।।

नेपाली

अनि पुण्यवान् ब्राह्मण र भक्त राजर्षिहरूको त कुरै के? अनित्य र दुःखमय यो लोकमा आइसकेका तिमीले मलाई भज।

श्लोक 34 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु। मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः

अंग्रेज़ी

Fix your mind on Me; be devoted to Me; sacrifice to Me; bow down to Me; having thus united your whole self to Me, taking Me as the supreme goal, you will come to Me.

हिन्दी

(तुम) मुझमें स्थिर मन वाले बनो; मेरे भक्त और मेरे पूजन करने वाले बनो; मुझे नमस्कार करो; इस प्रकार मत्परायण (अर्थात् मैं ही जिसका परम लक्ष्य हूँ ऐसे) होकर आत्मा को मुझसे युक्त करके तुम मुझे ही प्राप्त होओगे।।

नेपाली

ममा चित्त लगाऊ, मेरो भक्त बन, मलाई यज्ञ अर्पण गर, मलाई प्रणाम गर; यसरी मलाई परम लक्ष्य ठानेर आफूलाई ममा युक्त गरे तिमी मलाई नै प्राप्त गर्नेछौ।