अध्याय 18

मोक्षसंन्यासयोग

भगवद गीता का अठारहवा अध्याय मोक्षसन्यासयोग है। अर्जुन कृष्ण से अनुरोध करते हैं कि वे संन्यास और त्याग के बीच अंतर को समझाने की कृपा करें। कृष्ण बताते हैं कि एक संन्यासी वह है जो आध्यात्मिक अनुशासन का अभ्यास करने के लिए परिवार और समाज को त्याग देता है जबकि एक त्यागी वह है जो अपने कर्मों के फलों कि चिंता करे बिना भगवन को समर्पित करके कर्म करता रहता है। कृष्ण बताते हैं कि त्याग संन्यास से श्रेष्ठ है। फिर कृष्णा भौतिक संसार के तीन प्रकार के गुणों का विस्तारपूर्वक वर्णन करते हैं। कृष्णा घोषणा करते हैं कि परमात्मा की शुद्ध एवं सत्य भक्ति ही आध्यात्मिकता का उच्चतम मार्ग है। अगर हम हर क्षण उनका स्मरण करते रहें, उनका नाम जपते रहें, अपना सर्वस्व उनको समर्पित कर दें, उन्हें ही अपना सर्वोच्च लक्ष्य बना लें तो उनकी कृपा से हम निश्चित रूप से सभी बाधाओं और कठिनाइओं को दूर कर पाएंगे और इस जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्त हो पाएंगे।

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श्लोक 1 अर्जुन उवाच · अर्जुन कहते हैं
संस्कृत

अर्जुन उवाच संन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम्। त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन

अंग्रेज़ी

Arjuna said, "O mighty-armed Hrishikesa, I desire to know the essence or truth of renunciation and abandonment severally, O slayer of Kesi."

हिन्दी

अर्जुन ने कहा -- हे महाबाहो ! हे हृषीकेश ! हे केशनिषूदन ! मैं संन्यास और त्याग के तत्त्व को पृथक्-पृथक् जानना चाहता हूँ।।

नेपाली

अर्जुनले भने — हे महाबाहु! हे हृषीकेश! हे केशिनिषूदन! म सन्न्यास र त्यागको तत्त्व अलग-अलग जान्न चाहन्छु।

श्लोक 2 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

श्री भगवानुवाच काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः। सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः

अंग्रेज़ी

The Blessed Lord said, "The sages understand sannyasa to be the renunciation of action with desire; the wise declare the abandonment of the fruits of all actions to be tyaga."

हिन्दी

श्रीभगवान् ने कहा -- (कुछ) कवि (पण्डित) जन काम्य कर्मों के त्याग को "संन्यास" समझते हैं और विचारशील जन समस्त कर्मों के फलों के त्याग को "त्याग" कहते हैं।।

नेपाली

श्रीभगवान्ले भने — कविजनहरूले काम्य कर्मको त्यागलाई 'सन्न्यास' भनेका छन्; विचक्षणहरूले सम्पूर्ण कर्मफलको परित्यागलाई 'त्याग' भनेका छन्।

श्लोक 3 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः। यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे

अंग्रेज़ी

Some philosophers declare that actions should be abandoned as evil; while others declare that acts of sacrifice, gift, and austerity should not be relinquished.

हिन्दी

कुछ मनीषी जन कहते हैं कि समस्त कर्म दोषयुक्त होने के कारण त्याज्य हैं; और अन्य जन कहते हैं कि यज्ञ, दान और तपरूप कर्म त्याज्य नहीं हैं।।

नेपाली

केही विचारकहरू भन्छन् 'सबै कर्म दोषयुक्त हुनाले त्याग्नुपर्छ'; अरूले 'यज्ञ, दान र तपको कर्म त्याग्नु हुँदैन' भन्छन्।

श्लोक 4 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

निश्चयं श्रृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम।त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः संप्रकीर्तितः

अंग्रेज़ी

Hear from Me the conclusion or the final truth about this abandonment, O best of the Bharatas; abandonment, indeed, O best of men, has been declared to be of three kinds.

हिन्दी

हे भरतसत्तम ! उस त्याग के विषय में तुम मेरे निर्णय को सुनो। हे पुरुष श्रेष्ठ ! वह त्याग तीन प्रकार का कहा गया है।।

नेपाली

हे भरतर्षभ! त्यो त्यागको निश्चय मसँग सुन; हे पुरुषव्याघ्र! त्याग तीन प्रकारको बताइएको छ।

श्लोक 5 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्।यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्

अंग्रेज़ी

Acts of sacrifice, gift, and austerity should not be abandoned, but should be performed; for sacrifice, gift, and austerity are the purifiers of the wise.

हिन्दी

यज्ञ, दान और तपरूप कर्म त्याज्य नहीं है, किन्तु वह नि:सन्देह कर्तव्य है; यज्ञ, दान और तप ये मनीषियों (साधकों) को पवित्र करने वाले हैं।।

नेपाली

यज्ञ, दान र तप कर्म त्याज्य होइनन्; ती कर्तव्य नै हुन्; यज्ञ, दान र तप मनस्वी पुरुषहरूका पवित्रकारक हुन्।

श्लोक 6 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च।कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्िचतं मतमुत्तमम्

अंग्रेज़ी

But even these actions should be performed, leaving aside attachment and the desire for rewards, O Arjuna; this is my certain and most assured conviction.

हिन्दी

हे पार्थ ! इन कर्मों को भी, फल और आसक्ति को त्यागकर करना चाहिए, यह मेरा निश्चय किया हुआ उत्तम मत है।।

नेपाली

तर हे पार्थ! यिनलाई पनि आसक्ति र फलको त्याग गरेर गर्नुपर्छ — यो मेरो निश्चित श्रेष्ठ मत हो।

श्लोक 7 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

नियतस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते।मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः

अंग्रेज़ी

Verily, the renunciation of obligatory action is not proper; the abandonment of the same out of delusion is declared to be Tamasic.

हिन्दी

नियत कर्म का त्याग उचित नहीं है; मोहवश उसका त्याग करना "तामस त्याग" कहा गया है।।

नेपाली

नियत कर्मको त्याग गर्नु उचित होइन; मोहले त्यसको त्याग गर्नुलाई तामस त्याग भनिएको छ।

श्लोक 8 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत्।स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत्

अंग्रेज़ी

He who abandons action out of fear of bodily trouble (because it is painful), does not obtain the merit of renunciation by performing such Rajasic renunciation.

हिन्दी

जो मनुष्य, कर्म को दु:ख समझकर शारीरिक कष्ट के भय से त्याग देता है, वह पुरुष उस राजसिक त्याग को करके कदापि त्याग के फल को प्राप्त नहीं होता है।।

नेपाली

जसले 'कर्म दुःखप्रद हो' भनेर शरीरकष्टको भयले त्याग्छ, त्यसले त्यो राजस त्याग गरेर त्यागको फल पाउँदैन।

श्लोक 9 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन।सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः

अंग्रेज़ी

Whatever obligatory action is done, O Arjuna, merely because it ought to be done, abandoning attachment and also the desire for reward, that renunciation is regarded as sattvic (pure).

हिन्दी

हे अर्जुन ! "कर्म करना कर्तव्य है" ऐसा समझकर जो नियत कर्म आसक्ति और फल को त्यागकर किया जाता है, वही सात्त्विक त्याग माना गया है।।

नेपाली

हे अर्जुन! 'कर्तव्य हो' भनेर आसक्ति र फलको त्याग गरेर नियत कर्म गरिएमा त्यो त्याग सात्त्विक मानिन्छ।

श्लोक 10 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते।त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः

अंग्रेज़ी

The man of renunciation, pervaded by purity, intelligent, and with his doubts cut asunder, does not hate an unpleasant task nor is he attached to a pleasant one.

हिन्दी

जो पुरुष अकुशल (अशुभ) कर्म से द्वेष नहीं करता और कुशल (शुभ) कर्म में आसक्त नहीं होता, वह सत्त्वगुण से सम्पन्न पुरुष संशयरहित, मेधावी (ज्ञानी) और त्यागी है।।

नेपाली

सात्त्विकगुणले पूर्ण, मेधावी, संशयरहित त्यागी अकुशल कर्ममा द्वेष गर्दैन र कुशल कर्ममा आसक्त पनि हुँदैन।

श्लोक 11 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः।यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते

अंग्रेज़ी

Indeed, it is not possible for an embodied being to completely abandon actions; however, he who relinquishes the rewards of actions is truly called a man of renunciation.

हिन्दी

क्योंकि देहधारी पुरुष के द्वारा अशेष कर्मों का त्याग संभव नहीं है, इसलिए जो कर्मफल त्यागी है, वही पुरुष त्यागी कहा जाता है।।

नेपाली

देहधारीद्वारा सम्पूर्ण कर्म छाड्न सम्भव छैन; जसले कर्मफलको त्याग गर्छ, त्यसैलाई त्यागी भनिन्छ।

श्लोक 12 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम्।भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु संन्यासिनां क्वचित्

अंग्रेज़ी

The threefold fruit of action (evil, good, and mixed) accrues after death to those who do not abandon it, but never to those who do.

हिन्दी

कर्मों के शुभ, अशुभ और मिश्र ये त्रिविध फल केवल अत्यागी जनों को मरण के पश्चात् भी प्राप्त होते हैं; परन्तु संन्यासी पुरुषों को कदापि नहीं।।

नेपाली

त्यागीहरूलाई कर्मफल पछि कहिल्यै लाग्दैन; तर अत्यागीहरूलाई इष्ट, अनिष्ट र मिश्रित — तीन प्रकारको कर्मफल मरणपछि प्राप्त हुन्छ।

श्लोक 13 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे।सांख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम्

अंग्रेज़ी

Learn from Me, O mighty-armed Arjuna, these five causes, as declared in the Sankhya system, for the accomplishment of all actions.

हिन्दी

हे महाबाहो ! समस्त कर्मों की सिद्धि के लिए ये पांच कारण सांख्य सिद्धांत में कहे गये हैं, जिनको तुम मुझसे भलीभांति जानो।।

नेपाली

हे महाबाहु! सम्पूर्ण कर्मको सिद्धिका लागि साङ्ख्य-शास्त्रमा कथित पाँच कारण मसँग सुन।

श्लोक 14 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्।विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम्

अंग्रेज़ी

The body, the doer, the various senses, the different functions of various kinds, and the presiding deity—the fifth.

हिन्दी

अधिष्ठान (शरीर), कर्ता ,विविध करण (इन्द्रियादि) ,विविध और पृथक्-पृथक् चेष्टाएं तथा पाँचवा हेतु दैव है।।

नेपाली

अधिष्ठान (शरीर), कर्ता, विविध प्रकारका करण, विविध प्रकारका चेष्टा र पाँचौँ दैव —

श्लोक 15 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः।न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः

अंग्रेज़ी

Whatever action a person performs with their body, speech, and mind, whether right or wrong, these five are its causes.

हिन्दी

मनुष्य अपने शरीर, वाणी और मन से जो कोई न्याय्य (उचित) या विपरीत (अनुचित) कर्म करता है, उसके ये पाँच कारण ही हैं।।

नेपाली

मानिसले शरीर, वाणी र मनद्वारा जे जे शास्त्रोचित वा विपरीत कर्म आरम्भ गर्छ, ती पाँच नै यसका कारण हुन्।

श्लोक 16 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः।पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः

अंग्रेज़ी

Now, such being the case, verily he who, owing to an untrained understanding, looks upon his Self, which is isolated, as the agent, he of perverted intelligence does not see.

हिन्दी

अब इस स्थिति में जो पुरुष असंस्कृत बुद्धि होने के कारण, केवल शुद्ध आत्मा को कर्ता समझता हैं, वह दुर्मति पुरुष (यथार्थ) नहीं देखता है।।

नेपाली

यस्तो स्थितिमा पनि असंस्कृत बुद्धि भएकाले शुद्ध आत्मालाई कर्ता देख्ने त्यो मन्द-बुद्धि पुरुषले यथार्थ देख्दैन।

श्लोक 17 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते।हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते

अंग्रेज़ी

He who is free from the egoistic notion, whose intelligence is not tainted by good or evil, though he slays these people, he does not slay, nor is he bound by the action.

हिन्दी

जिस पुरुष में अहंकार का भाव नहीं है और बुद्धि किसी (गुण दोष) से लिप्त नहीं होती, वह पुरुष इन सब लोकों को मारकर भी वास्तव में न मरता है और न (पाप से) बँधता है।।

नेपाली

जसमा अहङ्कारको भाव छैन र जसको बुद्धि लिप्त हुँदैन, उसले यी लोकलाई मारेर पनि न मार्छ, न कर्मले बाँधिन्छ।

श्लोक 18 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना।करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसंग्रहः

अंग्रेज़ी

Knowledge, the knowable, and the knower form the threefold impulse for action; the organ, the action, and the agent form the threefold basis of action.

हिन्दी

ज्ञान, ज्ञेय और परिज्ञाता ये त्रिविध कर्म प्रेरक हैं, और, करण, कर्म. कर्ता ये त्रिविध कर्म संग्रह हैं।।

नेपाली

ज्ञान, ज्ञेय र परिज्ञाता — कर्मको त्रिविध प्रेरणा हुन्; करण, कर्म र कर्ता — कर्मको त्रिविध सङ्ग्रह हो।

श्लोक 19 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः।प्रोच्यते गुणसंख्याने यथावच्छृणु तान्यपि

अंग्रेज़ी

Knowledge, action, and actor are declared in the science of the Gunas (Sankhya philosophy) to be of three kinds only, according to the distinction of the Gunas. Of these, hear duly.

हिन्दी

ज्ञान, कर्म और कर्ता भी गुणों के भेद से सांख्यशास्त्र (गुणसंख्याने) में त्रिविध ही कहे गये हैं; उनको भी तुम मुझ से यथावत् श्रवण करो।।

नेपाली

गुण-गणनमा गुण-भेद अनुसार ज्ञान, कर्म र कर्ता तीन प्रकारका भनिएका छन्; तिनलाई पनि यथार्थ रूपमा सुन।

श्लोक 20 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते।अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम्

अंग्रेज़ी

That by which one sees the indestructible Reality in all beings, not separate in any of them—know that knowledge to be Sattvic.

हिन्दी

जिस ज्ञान से मनुष्य, विभक्त रूप में स्थित समस्त भूतों में एक अविभक्त और अविनाशी (अव्यय) स्वरूप को देखता है, उस ज्ञान को तुम सात्त्विक जानो।।

नेपाली

जसले विभक्त भएका सबै प्राणीमा अविभक्त एक अव्ययभावलाई देख्छ — त्यो ज्ञान सात्त्विक हो।

श्लोक 21 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान्।वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम्

अंग्रेज़ी

But that knowledge which sees in all beings various entities of distinct kinds as being distinct from one another, know thou that knowledge to be Rajasic.

हिन्दी

जिस ज्ञान के द्वारा मनुष्य समस्त भूतों में नाना भावों को पृथक्-पृथक् जानता है, उस ज्ञान को तुम राजस जानो।।

नेपाली

जुन ज्ञानले सबै प्राणीमा पृथक्-पृथक् नानाविध भाव देख्छ, त्यो ज्ञान राजस हो।

श्लोक 22 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम्।अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम्

अंग्रेज़ी

But that which clings to one single effect as if it were the whole, without reason, without any foundation in Truth, and is trivial—that is declared to be Tamasic.

हिन्दी

और जिस ज्ञान के द्वारा मनुष्य एक कार्य (शरीर) में ही आसक्त हो जाता है, मानो वह (कार्य ही) पूर्ण वस्तु हो तथा जो (ज्ञान) हेतुरहित (अयुक्तिक), तत्त्वार्थ से रहित तथा संकुचित (अल्प) है, वह (ज्ञान) तामस है।।

नेपाली

जुन ज्ञान कुनै एउटा कार्यलाई सबै ठानेर हेर्छ, हेतुरहित, तत्त्वार्थरहित र तुच्छ छ, त्यो ज्ञान तामस भनिएको छ।

श्लोक 23 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

नियतं सङ्गरहितमरागद्वेषतः कृतम्।अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते

अंग्रेज़ी

An action that is ordained, free from attachment, done without love or hatred, and without desire for reward is declared to be Sattvic.

हिन्दी

जो कर्म (शास्त्रविधि से) नियत और संगरहित है, तथा फल को न चाहने वाले पुरुष के द्वारा बिना किसी राग द्वेष के किया गया है, वह (कर्म) सात्त्विक कहा जाता है।।

नेपाली

नियत, अनासक्त, रागद्वेषरहित, फलाकाङ्क्षारहितले गरिएको कर्म सात्त्विक भनिन्छ।

श्लोक 24 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

यत्तु कामेप्सुना कर्म साहङ्कारेण वा पुनः।क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम्

अंग्रेज़ी

But that action which is done by one longing for the fulfillment of desires or gain with egotism or with much effort is declared to be Rajasic (passionate).

हिन्दी

और जो कर्म बहुत परिश्रम से युक्त है तथा फल की कामना वाले, अहंकारयुक्त पुरुष के द्वारा किया जाता है, वह कर्म राजस कहा गया है।।

नेपाली

कामनाले प्रेरित वा अहङ्कारले बहुप्रयासले गरिएको कर्म राजस भनिएको छ।

श्लोक 25 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

अनुबन्धं क्षयं हिंसामनपेक्ष्य च पौरुषम्।मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते

अंग्रेज़ी

That action which is undertaken from delusion, without regard for the consequences, loss, injury, and one's own ability, is declared to be Tamasic (dark).

हिन्दी

जो कर्म परिणाम, हानि, हिंसा और सार्मथ्य (पौरुषम्) का विचार न करके केवल मोहवश आरम्भ किया जाता है, वह कर्म तामस कहलाता है।।

नेपाली

अनुबन्ध, क्षय, हिंसा र आफ्नो सामर्थ्य नविचारी मोहले आरम्भ गरिएको कर्म तामस भनिन्छ।

श्लोक 26 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः।सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते

अंग्रेज़ी

An agent who is free from attachment, non-egoistic, endowed with firmness and enthusiasm, and unaffected by success or failure, is considered to be of a Sattvic (pure) nature.

हिन्दी

जो कर्ता संगरहित, अहंमन्यता से रहित, धैर्य और उत्साह से युक्त एवं कार्य की सिद्धि (सफलता) और असिद्धि (विफलता) में निर्विकार रहता है, वह कर्ता सात्त्विक कहा जाता है।।

नेपाली

मुक्तसङ्ग, अहङ्कारशून्य, धैर्य र उत्साहले पूर्ण, सिद्धि-असिद्धिमा निर्विकार कर्ता सात्त्विक हो।

श्लोक 27 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः।हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः

अंग्रेज़ी

Passionate, desiring to obtain the reward of their actions, greedy, cruel, impure, moved by joy and sorrow, such an agent is said to be Rajasic.

हिन्दी

रागी, कर्मफल का इच्छुक, लोभी, हिंसक स्वभाव वाला, अशुद्ध और हर्षशोक से युक्त कर्ता राजस कहलाता है।।

नेपाली

रागी, कर्मफलकामी, लोभी, हिंस्र, अशुद्ध, हर्ष-शोकले युक्त कर्ता राजस भनिन्छ।

श्लोक 28 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैष्कृतिकोऽलसः।विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते

अंग्रेज़ी

Unsteady, vulgar, inflexible, deceitful, malicious, lazy, despondent, and procrastinating—such an agent is called Tamasic.

हिन्दी

अयुक्त, प्राकृत, स्तब्ध, शठ, नैष्कृतिक, आलसी, विषादी और दीर्घसूत्री कर्ता तामस कहा जाता है।।

नेपाली

अयुक्त, अशिष्ट, हठी, शठ, नैष्कृतिक, आलसी, विषादी र दीर्घसूत्री कर्ता तामस भनिन्छ।

श्लोक 29 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं श्रृणु।प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनञ्जय

अंग्रेज़ी

Hear thou the threefold division of intellect and firmness, according to the Gunas, as I declare them fully and distinctly, O Arjuna.

हिन्दी

हे धनंजय ! मेरे द्वारा अशेषत: और पृथकत: कहे जाने वाले, गुणों के कारण उत्पन्न हुए बुद्धि और धृति के त्रिविध भेद को सुनो।।

नेपाली

हे धनञ्जय! बुद्धि र धैर्यको पनि गुणानुसार त्रिविध भेद म पूर्णतः बताउँछु, सुन।

श्लोक 30 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये।बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी

अंग्रेज़ी

The intellect which knows the path of work and renunciation, what should be done and what should not be done, fear and fearlessness, bondage and liberation—that intellect is Sattvic (pure), O Arjuna.

हिन्दी

हे पार्थ ! जो बुद्धि प्रवृत्ति और निवृत्ति, कार्य और अकार्य, भय और अभय तथा बन्ध और मोक्ष को तत्त्वत जानती है, वह बुद्धि सात्विकी है।।

नेपाली

हे पार्थ! प्रवृत्ति-निवृत्ति, कर्तव्य-अकर्तव्य, भय-अभय र बन्ध-मोक्ष जान्ने बुद्धि सात्त्विक हो।

श्लोक 31 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च।अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी

अंग्रेज़ी

That by which one wrongly understands dharma and adharma, and also what ought to be done and what ought not to be done—that intellect, O Arjuna, is rajasic (passionate).

हिन्दी

हे पार्थ ! जिस बुद्धि के द्वारा मनुष्य धर्म और अधर्म को तथा कर्तव्य और अकर्तव्य को यथावत् नहीं जानता है, वह बुद्धि राजसी है।।

नेपाली

हे पार्थ! धर्म र अधर्म, कर्तव्य र अकर्तव्य अयथार्थ रूपमा जान्ने बुद्धि राजस हो।

श्लोक 32 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसाऽऽवृता।सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी

अंग्रेज़ी

That intellect, O Arjuna, which is enveloped in darkness and sees Adharma as Dharma and all things perverted, is Tamasic (dark).

हिन्दी

हे पार्थ ! तमस् (अज्ञान अन्ध:कार) से आवृत जो बुद्धि अधर्म को ही धर्म मानती है और सभी पदार्थों को विपरीत रूप से जानती है, वह बुद्धि तामसी है।।

नेपाली

हे पार्थ! जुन बुद्धि तमोग्रस्त भएर अधर्मलाई धर्म र सबै वस्तुलाई विपरीत देख्छ, त्यो बुद्धि तामस हो।

श्लोक 33 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः।योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी

अंग्रेज़ी

The unwavering firmness, through which Yoga restrains the functions of the mind, life-force, and senses—that firmness, O Arjuna, is Sattvic (pure).

हिन्दी

सात्त्विकी है।।

नेपाली

हे पार्थ! जुन अव्यभिचारिणी धृतिले मन, प्राण र इन्द्रियका क्रियाहरूलाई योगद्वारा धारण गर्छ, त्यो धृति सात्त्विक हो।

श्लोक 34 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

यया तु धर्मकामार्थान् धृत्या धारयतेऽर्जुन।प्रसङ्गेन फलाकाङ्क्षी धृतिः सा पार्थ राजसी

अंग्रेज़ी

But that, O Arjuna, by which one holds fast to Dharma (duty), enjoyment of pleasures, and earning of wealth, on account of attachment and desire for reward—that firmness, O Arjuna, is Rajasic (passionate).

हिन्दी

हे पृथापुत्र अर्जुन ! कर्मफल का इच्छुक पुरुष अति आसक्ति (प्रसंग) से जिस धृति के द्वारा धर्म, अर्थ और काम (इन तीन पुरुषार्थों) को धारण करता है, वह धृति राजसी है।।

नेपाली

हे अर्जुन! जुन धृतिले धर्म, अर्थ र कामलाई आसक्ति र फलकामनाले धारण गर्छ, त्यो धृति राजस हो।

श्लोक 35 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च।न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी

अंग्रेज़ी

That firmness, O Arjuna, by which a stupid man does not abandon sleep, fear, grief, despair, and conceit, is Tamasic.

हिन्दी

हो पार्थ ! दुर्बुद्धि पुरुष जिस धारणा के द्वारा, स्वप्न, भय, शोक, विषाद और मद को नहीं त्यागता है, वह धृति तामसी है।।

नेपाली

हे पार्थ! जुन धृतिले दुर्बुद्धि पुरुषले निद्रा, भय, शोक, विषाद र मद त्याग्दैन, त्यो धृति तामस हो।

श्लोक 36 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

सुखं त्विदानीं त्रिविधं श्रृणु मे भरतर्षभ।अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति

अंग्रेज़ी

And now, O Arjuna, hear from Me of the threefold pleasure, in which one rejoices through practice and surely comes to the end of pain.

हिन्दी

हे भरतश्रेष्ठ ! अब तुम त्रिविध सुख को मुझसे सुनो, जिसमें (साधक पुरुष) अभ्यास से रमता है और दु:खों के अन्त को प्राप्त होता है (जहाँ उसके दु:खों का अन्त हो जाता है।)।।

नेपाली

हे भरतर्षभ! अब तीन प्रकारका सुख मसँग सुन — जसमा अभ्यासले रमाएको पुरुषले दुःखको अन्त्य पाउँछ।

श्लोक 37 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम्।तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम्

अंग्रेज़ी

That which is like poison at first but in the end like nectar—that happiness is declared to be sattvic, born of the purity of one's own mind due to self-realization.

हिन्दी

जो सुख प्रथम (प्रारम्भ में) विष के समान (भासता) है, परन्तु परिणाम में अमृत के समान है, वह आत्मबुद्धि के प्रसाद से उत्पन्न सुख सात्त्विक कहा गया है।।

नेपाली

सुरुमा विषजस्तो लाग्ने तर अन्त्यमा अमृत हुने, आत्मबुद्धि-प्रसादबाट उत्पन्न सुख सात्त्विक भनिएको छ।

श्लोक 38 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम्।परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम्

अंग्रेज़ी

That happiness which arises from the contact of the senses with the objects, which is initially like nectar but eventually like poison, is said to be Rajasic.

हिन्दी

जो सुख विषयों और इन्द्रियों के संयोग से उत्पन्न होता है, वह प्रथम तो अमृत के समान, परन्तु परिणाम में विष तुल्य होता है, वह सुख राजस कहा गया है।।

नेपाली

विषय र इन्द्रियको संयोगबाट उत्पन्न सुरुमा अमृतजस्तो र अन्त्यमा विषतुल्य हुने सुख राजस भनिएको छ।

श्लोक 39 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः।निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम्

अंग्रेज़ी

That happiness which at first, as well as in the end, deludes the self, and which arises from sleep, indolence, and heedlessness—that is declared to be Tamasic.

हिन्दी

जो सुख प्रारम्भ में और परिणाम (अनुबन्ध) में भी आत्मा (मनुष्य) को मोहित करने वाला होता है, वह निद्रा, आलस्य और प्रमाद से उत्पन्न सुख तामस कहा जाता है।।

नेपाली

जुन सुख आरम्भमा र पछि पनि आत्मालाई मोहित गर्ने, निद्रा, आलस्य र प्रमादबाट उत्पन्न हो — त्यो तामस भनिएको छ।

श्लोक 40 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः।सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्ित्रभिर्गुणैः

अंग्रेज़ी

There is no being on earth or in heaven among the gods that is liberated from the three qualities born of Nature.

हिन्दी

पृथ्वी पर अथवा स्वर्ग के देवताओं में ऐसा कोई प्राणी (सत्त्वं अर्थात् विद्यमान वस्तु) नहीं है जो प्रकृति से उत्पन्न इन तीन गुणों से मुक्त (रहित) हो।।

नेपाली

पृथ्वीमा वा स्वर्गमा देवताहरूमध्ये कुनै पनि त्यस्तो प्राणी छैन जो प्रकृतिजात यी तीन गुणबाट मुक्त हो।

श्लोक 41 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परंतप।कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः

अंग्रेज़ी

Of Brahmanas, Kshatriyas, Vaisyas, and Sudras, O Arjuna, the duties are distributed according to the qualities born of their own nature.

हिन्दी

हे परन्तप!  ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों और शूद्रों के कर्म, स्वभाव से उत्पन्न गुणों के अनुसार विभक्त किये गये हैं।।

नेपाली

हे परन्तप! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य र शूद्र — सबैका कर्म स्वभावजात गुण अनुसार विभाजित छन्।

श्लोक 42 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च।ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम्

अंग्रेज़ी

Serenity, self-restraint, austerity, purity, forgiveness, and uprightness, as well as knowledge, realization, and belief in God, are the duties of Brahmanas, born of their own nature.

हिन्दी

शम, दम, तप, शौच, क्षान्ति, आर्जव, ज्ञान, विज्ञान और आस्तिक्य - ये ब्राह्मण के स्वाभाविक कर्म हैं।।

नेपाली

शम, दम, तप, शौच, क्षमा, आर्जव, ज्ञान, विज्ञान र आस्तिकता — ब्राह्मणको स्वभावजात कर्म हुन्।

श्लोक 43 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम्।दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम्

अंग्रेज़ी

Prowess, splendor, firmness, dexterity, and not fleeing from battle, generosity, and lordliness are the duties of the Kshatriyas, born of their own nature.

हिन्दी

शौर्य, तेज, धृति, दाक्ष्य (दक्षता), युद्ध से पलायन न करना, दान और ईश्वर भाव (स्वामी भाव) - ये सब क्षत्रिय के स्वाभाविक कर्म हैं।।

नेपाली

शौर्य, तेज, धैर्य, दक्षता, युद्धमा नभाग्ने, दान र ईश्वर-भाव — क्षत्रियको स्वभावजात कर्म हुन्।

श्लोक 44 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम्।परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम्

अंग्रेज़ी

Agriculture, cattle-rearing, and trade are the duties of the Vaisya (merchant), born of their own nature; and service is the duty of the Sudra (servant-class), born of their own nature.

हिन्दी

कृषि, गौपालन तथा वाणिज्य - ये वैश्य के स्वाभाविक कर्म हैं, और शूद्र का स्वाभाविक कर्म है परिचर्या अर्थात् सेवा करना।।

नेपाली

कृषि, गोरक्षा र वाणिज्य वैश्यको स्वभावजात कर्म हुन्; सेवा शूद्रको स्वभावजात कर्म हो।

श्लोक 45 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः।स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु

अंग्रेज़ी

Each person devoted to their own duty attains perfection. How they attain perfection while being engaged in their own duty, hear now.

हिन्दी

अपने-अपने स्वाभाविक कर्म में अभिरत मनुष्य संसिद्धि को प्राप्त कर लेता है। स्वकर्म में रत मनुष्य किस प्रकार सिद्धि प्राप्त करता है, उसे तुम सुनो।।

नेपाली

आ-आफ्नो कर्ममा रत मानिसले सिद्धि पाउँछ; स्वकर्म-रत पुरुषले कसरी सिद्धि पाउँछ, त्यो सुन।

श्लोक 46 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्।स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः

अंग्रेज़ी

He from whom all the beings have evolved and by whom all this is pervaded, worshipping Him with his own duty, one attains perfection.

हिन्दी

जिस (परमात्मा) से भूतमात्र की प्रवृत्ति अर्थात् उत्पत्ति हुई है और जिससे यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है, उस (परमात्मा) की स्वकर्म द्वारा पूजा करके मनुष्य सिद्धि को प्राप्त होता है।।

नेपाली

जुन परमेश्वरबाट प्राणीहरूको उत्पत्ति हुन्छ र जसले सम्पूर्ण जगत् व्याप्त गरेका छन्, त्यसैलाई स्वकर्मद्वारा पुजेर मानिसले सिद्धि पाउँछ।

श्लोक 47 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्

अंग्रेज़ी

Better is one's own duty, even if it is destitute of merits, than the duty of another well performed. He who does the duty ordained by his own nature incurs no sin.

हिन्दी

सम्यक् अनुष्ठित परधर्म की अपेक्षा गुणरहित स्वधर्म श्रेष्ठ है। (क्योंकि) स्वभाव से नियत किये गये कर्म को करते हुए मनुष्य पाप को नहीं प्राप्त करता।।

नेपाली

राम्ररी अनुष्ठान गरिएको पराधर्मभन्दा गुणरहित स्वधर्म पनि श्रेष्ठ हो; स्वभावजात कर्म गर्ने पुरुषलाई पाप लाग्दैन।

श्लोक 48 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्।सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः

अंग्रेज़ी

One should not, O Arjuna, abandon the duty to which one is born, though it may be faulty; for, all undertakings are enveloped by evil, just as fire is by smoke.

हिन्दी

हे कौन्तेय ! दोषयुक्त होने पर भी सहज कर्म को नहीं त्यागना चाहिए; क्योंकि सभी कर्म दोष से आवृत होते है, जैसे धुयें से अग्नि।।

नेपाली

हे कौन्तेय! दोषयुक्त भए पनि सहज कर्म त्याग्नु हुँदैन; धूवाँले आगो ढाकिएझैँ सबै आरम्भ दोषले छोपिएका हुन्छन्।

श्लोक 49 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः।नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां संन्यासेनाधिगच्छति

अंग्रेज़ी

He whose intellect is unattached everywhere, who has subdued his self, from whom desire has fled, he attains the supreme state of freedom from action through renunciation.

हिन्दी

सर्वत्र आसक्ति रहित बुद्धि वाला वह पुरुष जो स्पृहारहित तथा जितात्मा है, संन्यास के द्वारा परम नैर्ष्कम्य सिद्धि को प्राप्त होता है।।

नेपाली

सर्वत्र असक्त बुद्धि, जितेन्द्रिय, कामनारहित पुरुषले सन्न्यासद्वारा परम नैष्कर्म्य-सिद्धि प्राप्त गर्छ।

श्लोक 50 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे।समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा

अंग्रेज़ी

Learn from Me, O Arjuna, in brief how one who has attained perfection reaches Brahman—the Eternal, that supreme state of knowledge.

हिन्दी

सिद्धि को प्राप्त पुरुष किस प्रकार ब्रह्म को प्राप्त होता है, तथा ज्ञान की परा निष्ठा को भी तुम मुझसे संक्षेप में जानो।।

नेपाली

हे कौन्तेय! सिद्धि पाएको पुरुष कसरी ब्रह्म प्राप्त गर्छ — त्यो ज्ञानको परम निष्ठा मसँग सङ्क्षेपमा सुन।

श्लोक 51 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्याऽऽत्मानं नियम्य च।शब्दादीन् विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च

अंग्रेज़ी

Endowed with a pure intellect, controlling the self through firmness, relinquishing sound and other objects and abandoning attraction and hatred.

हिन्दी

विशुद्ध बुद्धि से युक्त, धृति से आत्मसंयम कर, शब्दादि विषयों को त्याग कर और राग-द्वेष का परित्याग कर....৷৷৷৷।।

नेपाली

विशुद्ध बुद्धिले युक्त, धैर्यले आत्म-संयम गर्दै शब्दादि विषयको त्याग गर्दै राग-द्वेष त्यागेर —

श्लोक 52 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः।ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः

अंग्रेज़ी

Dwelling in solitude, eating sparingly, with speech, body, and mind subdued, always engaged in meditation and concentration, and resorting to dispassion.

हिन्दी

विविक्त सेवी, लघ्वाशी (मिताहारी) जिसने अपने शरीर, वाणी और मन को संयत किया है, ध्यानयोग के अभ्यास में सदैव तत्पर तथा वैराग्य पर समाश्रित।।

नेपाली

एकान्तसेवी, मिताहारी, संयतवाक्-काय-मन, सदा ध्यान-योगमा परायण, वैराग्य-समाश्रित —

श्लोक 53 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम्।विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते

अंग्रेज़ी

Having abandoned egoism, strength, arrogance, desire, anger, and covetousness, and being free from the notion of 'mine' and peaceful, he is fit for becoming Brahman.

हिन्दी

अहंकार, बल, दर्प, काम, क्रोध और परिग्रह को त्याग कर ममत्वभाव से रहित और शान्त पुरुष ब्रह्म प्राप्ति के योग्य बन जाता है।।

नेपाली

अहङ्कार, बल, दर्प, काम, क्रोध र परिग्रह त्यागेर निर्ममता र शान्ति पाएको पुरुष ब्रह्म-भावको योग्य हुन्छ।

श्लोक 54 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति।समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम्

अंग्रेज़ी

Becoming Brahman, serene in the Self, he neither grieves nor desires; he is the same to all beings, and obtains supreme devotion to Me.

हिन्दी

ब्रह्मभूत (जो साधक ब्रह्म बन गया है), प्रसन्न मन वाला पुरुष न इच्छा करता है और न शोक, समस्त भूतों के प्रति सम होकर वह मेरी परा भक्ति को प्राप्त करता है।।

नेपाली

ब्रह्म-भाव पाएको प्रसन्न-आत्मा पुरुषले न शोक गर्छ न कामना गर्छ; सबै प्राणीमा समान भएर ममा परम भक्ति प्राप्त गर्छ।

श्लोक 55 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः।ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्

अंग्रेज़ी

By devotion, he knows Me in truth, who and what I am; then, having known Me in truth, he immediately enters into the Supreme.

हिन्दी

(उस परा) भक्ति के द्वारा मुझे वह तत्त्वत: जानता है कि मैं कितना (व्यापक) हूँ तथा मैं क्या हूँ। (इस प्रकार) तत्त्वत: जानने के पश्चात् तत्काल ही वह मुझमें प्रवेश कर जाता है, अर्थात् मत्स्वरूप बन जाता है।।

नेपाली

त्यो भक्तिले उसले मलाई जे र जति छु, त्यथार्थ रूपमा जान्दछ; तत्त्वतः जानेपछि उसले मेरो स्वरूपमा प्रवेश गर्छ।

श्लोक 56 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः।मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम्

अंग्रेज़ी

Having taken refuge in Me and doing all actions, by My grace he obtains the eternal, indestructible state of being.

हिन्दी

जो पुरुष मदाश्रित होकर सदैव समस्त कर्मों को करता है, वह मेरे प्रसाद (अनुग्रह) से शाश्वत, अव्यय पद को प्राप्त कर लेता है।।

नेपाली

मेरै शरणमा रहेर सम्पूर्ण कर्म गर्ने पुरुषले मेरो अनुग्रहले शाश्वत अव्यय पद प्राप्त गर्छ।

श्लोक 57 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः।बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव

अंग्रेज़ी

Mentally renouncing all actions in Me, having Me as the highest goal, and resorting to the yoga of discrimination, do thou ever fix thy mind on Me.

हिन्दी

मन से समस्त कर्मों का संन्यास मुझमें करके मत्परायण होकर बुद्धियोग का आश्रय लेकर तुम सतत मच्चित्त बनो।।

नेपाली

चेतना-पूर्वक मलाई सम्पूर्ण कर्म समर्पण गर्दै, मलाई परम लक्ष्य मानेर बुद्धियोगमा स्थित रहेर सदा ममा चित्त लगाऊ।

श्लोक 58 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि।अथ चेत्त्वमहङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि

अंग्रेज़ी

Fixing your mind on Me, you shall, by My grace, overcome all obstacles; but if you will not hear Me due to egoism, you shall perish.

हिन्दी

मच्चित्त होकर तुम मेरी कृपा से समस्त कठिनाइयों (सर्वदुर्गाणि) को पार कर जाओगे; और यदि अहंकारवश (इस उपदेश को) नहीं सुनोगे, तो तुम नष्ट हो जाओगे।।

नेपाली

ममा चित्त लगाएमा मेरो अनुग्रहले सम्पूर्ण विघ्न तर्नेछौ; तर अहङ्कारवश नसुने तिमी नष्ट हुनेछौ।

श्लोक 59 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

यदहङ्कारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे।मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति

अंग्रेज़ी

If, filled with egoism, thou thinkest, "I will not fight," then thy resolve is vain; nature will compel thee.

हिन्दी

और अहंकारवश तुम जो यह सोच रहे हो, "मैं युद्ध नहीं करूंगा", यह तुम्हारा निश्चय मिथ्या है, (क्योंकि) प्रकृति (तुम्हारा स्वभाव) ही तुम्हें (बलात् कर्म में) प्रवृत्त करेगी।।

नेपाली

अहङ्कारले 'म युद्ध गर्दिनँ' भन्ने तिम्रो निश्चय व्यर्थ हो; तिम्रो प्रकृतिले नै तिमीलाई कर्ममा लगाउनेछ।

श्लोक 60 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा।कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपि तत्

अंग्रेज़ी

O Arjuna, bound by your own Karma (action) born of your own nature, that which from delusion you wish not to do, even that you shall do helplessly.

हिन्दी

हे कौन्तेय ! तुम अपने स्वाभाविक कर्मों से बंधे हो, (अत:) मोहवशात् जिस कर्म को तुम करना नहीं चाहते हो, वही तुम विवश होकर करोगे।।

नेपाली

हे कौन्तेय! स्वभावजात आफ्नै कर्मले बाँधिएको तिमी, जुन कर्म मोहले गर्न चाहन्नौ — त्यही पनि परवश भएर गर्नेछौ।

श्लोक 61 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया

अंग्रेज़ी

The Lord dwells in the hearts of all beings, O Arjuna, causing all beings, by His illusory power, to revolve as if mounted on a machine.

हिन्दी

हे अर्जुन (मानों किसी) यन्त्र पर आरूढ़ समस्त भूतों को ईश्वर अपनी माया से घुमाता हुआ (भ्रामयन्) भूतमात्र के हृदय में स्थित रहता है।।

नेपाली

हे अर्जुन! ईश्वर सम्पूर्ण प्राणीको हृदयमा बसेर मायाले यन्त्रमा बसालिएझैँ सबै प्राणीलाई भुमाइरहेका छन्।

श्लोक 62 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्

अंग्रेज़ी

Fly to Him for refuge with all your being, O Arjuna; by His grace you will obtain supreme peace and the eternal abode.

हिन्दी

हे भारत ! तुम सम्पूर्ण भाव से उसी (ईश्वर) की शरण में जाओ। उसके प्रसाद से तुम परम शान्ति और शाश्वत स्थान को प्राप्त करोगे।।

नेपाली

हे भारत! सर्वभावले उहाँकै शरण लेऊ; उहाँको अनुग्रहले परम शान्ति र शाश्वत स्थान पाउने छौ।

श्लोक 63 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया।विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु

अंग्रेज़ी

Thus, wisdom more secret than secrecy itself has been declared to you by me. Reflect on it fully, then act as you wish.

हिन्दी

इस प्रकार समस्त गोपनीयों से अधिक गुह्य ज्ञान मैंने तुमसे कहा; इस पर पूर्ण विचार (विमृश्य) करने के पश्चात् तुम्हारी जैसी इच्छा हो, वैसा तुम करो।।

नेपाली

यसरी गोप्यभन्दा पनि गोप्य ज्ञान मैले तिमीलाई बताएँ; यसलाई पूर्ण रूपले विचार गरेर जे चाहन्छौ, त्यही गर।

श्लोक 64 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

सर्वगुह्यतमं भूयः श्रृणु मे परमं वचः।इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम्

अंग्रेज़ी

Hear again My supreme word, most secret of all; for you are dearly beloved of Me, I will tell you what is good.

हिन्दी

पुन: एक बार तुम मुझसे समस्त गुह्यों में गुह्यतम परम वचन (उपदेश) को सुनो। तुम मुझे अतिशय प्रिय हो, इसलिए मैं तुम्हें तुम्हारे हित की बात कहूंगा।।

नेपाली

सबभन्दा गोप्य परम वचन फेरि सुन; तिमी मेरो अति प्रिय छौ, त्यसैले तिम्रो हितको कुरा म तिमीलाई भन्छु।

श्लोक 65 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे

अंग्रेज़ी

Fix your mind on Me, be devoted to Me, sacrifice to Me, bow down to Me. You will come to Me; I truly promise you this, for you are dear to Me.

हिन्दी

तुम मच्चित, मद्भक्त और मेरे पूजक (मद्याजी) बनो और मुझे नमस्कार करो; (इस प्रकार) तुम मुझे ही प्राप्त होगे; यह मैं तुम्हे सत्य वचन देता हूँ,(क्योंकि) तुम मेरे प्रिय हो।।

नेपाली

ममा मन लगाऊ, मेरो भक्त बन, मलाई यज्ञ अर्पण गर, मलाई प्रणाम गर — तिमी मलाई नै प्राप्त गर्नेछौ; तिमी मलाई प्रिय छौ, यो म साँचो प्रतिज्ञा गर्छु।

श्लोक 66 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः

अंग्रेज़ी

Abandon all duties and take refuge in Me alone; I will liberate you from all sins; do not grieve.

हिन्दी

सब धर्मों का परित्याग करके तुम एक मेरी ही शरण में आओ, मैं तुम्हें समस्त पापों से मुक्त कर दूँगा, तुम शोक मत करो।।

नेपाली

सबै धर्म त्यागेर एकमात्र म नै शरण भएर आऊ; म तिमीलाई सम्पूर्ण पापबाट मुक्त गर्नेछु, शोक नगर।

श्लोक 67 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन।न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति

अंग्रेज़ी

Never speak this to one who is devoid of austerities or devotion, who does not render service, who does not desire to listen, or who cavils at Me.

हिन्दी

यह ज्ञान ऐसे पुरुष से नहीं कहना चाहिए, जो अतपस्क (तपरहित) है, और न उसे जो अभक्त है; उसे भी नहीं जो अशुश्रुषु (सेवा में अतत्पर) है और उस पुरुष से भी नहीं कहना चाहिए, जो मुझ (ईश्वर) से असूया करता है, अर्थात् मुझ में दोष देखता है।।

नेपाली

यो रहस्य अतपस्वी, अभक्त, अशुश्रूषु वा मेरो निन्दा गर्नेलाई कहिल्यै नभन।

श्लोक 68 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

य इमं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति।भक्ितं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः

अंग्रेज़ी

He who, with supreme devotion to Me, teaches this supreme secret to My devotees, shall undoubtedly come to Me.

हिन्दी

जो पुरुष मुझसे परम प्रेम (परा भक्ति) करके इस परम गुह्य ज्ञान का उपदेश मेरे भक्तों को देता है, वह नि:सन्देह मुझे ही प्राप्त होता है।।

नेपाली

जसले मेरा भक्तहरूलाई परम भक्तिले यो परम गोप्य उपदेश दिन्छ, त्यो निःसन्देह मलाई नै प्राप्त गर्छ।

श्लोक 69 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

न च तस्मान्मनुष्येषु कश्िचन्मे प्रियकृत्तमः।भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि

अंग्रेज़ी

There is no one among men who does service dearer to Me, nor shall there be anyone on earth dearer to Me than him.

हिन्दी

न तो उससे बढ़कर मेरा अतिशय प्रिय कार्य करने वाला मनुष्यों में कोई है और न उससे बढ़कर मेरा प्रिय इस पृथ्वी पर दूसरा कोई होगा।।

नेपाली

मानिसहरूमा त्यसभन्दा प्रिय कर्मकर्ता मेरा लागि कोही छैन; पृथ्वीमा पनि त्योभन्दा प्रिय अरू मेरा लागि हुने छैन।

श्लोक 70 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः।ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः

अंग्रेज़ी

And he who studies this sacred dialogue of ours, by him I shall have been worshipped through the sacrifice of wisdom; such is my conviction.

हिन्दी

जो पुरुष, हम दोनों के इस धर्ममय संवाद का पठन करेगा, उसके द्वारा मैं ज्ञानयज्ञ से पूजित होऊँगा - ऐसा मेरा मत है।।

नेपाली

जसले हाम्रो यो धर्म-संवादलाई अध्ययन गर्छ, त्यसले मलाई ज्ञान-यज्ञद्वारा पुजेको हुनेछ — यो मेरो मत हो।

श्लोक 71 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

श्रद्धावाननसूयश्च श्रृणुयादपि यो नरः।सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम्

अंग्रेज़ी

Also, the man who hears this, full of faith and free from malice, shall attain to the happy worlds of those of righteous deeds, and be liberated.

हिन्दी

तथा जो श्रद्धावान् और अनसुयु (दोषदृष्टि रहित) पुरुष इसका श्रवणमात्र भी करेगा, वह भी (पापों से) मुक्त होकर पुण्यकर्मियों के शुभ (श्रेष्ठ) लोकों को प्राप्त कर लेगा।।

नेपाली

र जसले श्रद्धालु एवं अनसूय भएर मात्र सुन्छ, त्यो पनि मुक्त भएर पुण्यवान्हरूको शुभ लोक पाउँछ।

श्लोक 72 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा।कच्चिदज्ञानसंमोहः प्रनष्टस्ते धनञ्जय

अंग्रेज़ी

Has this been heard, O Arjuna, with one-pointed focus? Has the delusion of your ignorance been destroyed, O Dhananjaya?

हिन्दी

हे पार्थ ! क्या इसे (मेरे उपदेश को) तुमने एकाग्रचित्त होकर श्रवण किया ? और हे धनञ्जय ! क्या तुम्हारा अज्ञान जनित संमोह पूर्णतया नष्ट हुआ ?

नेपाली

हे पार्थ! के यो तिमीले एकाग्र चित्तले सुन्यौ? हे धनञ्जय! के तिम्रो अज्ञानजन्य मोह नष्ट भयो?

श्लोक 73 अर्जुन उवाच · अर्जुन कहते हैं
संस्कृत

अर्जुन उवाचनष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत।स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव

अंग्रेज़ी

Arjuna said, "My delusion has been destroyed, for I have gained my knowledge (memory) through Your grace, O Krishna. I am now free from doubts. I will act according to Your word."

हिन्दी

अर्जुन ने कहा -- हे अच्युत ! आपके कृपाप्रसाद से मेरा मोह नष्ट हो गया है, और मुझे स्मृति (ज्ञान) प्राप्त हो गयी है? अब मैं संशयरहित हो गया हूँ और मैं आपके वचन (आज्ञा) का पालन करूँगा।।

नेपाली

अर्जुनले भने — हे अच्युत! तपाईंको अनुग्रहले मेरो मोह नष्ट भयो, र मलाई स्मृति प्राप्त भयो; अब म संशयरहित भएर खडा छु, तपाईंको वचन अनुसार गर्नेछु।

श्लोक 74 सञ्जय उवाच · संजय सुनाते हैं
संस्कृत

सञ्जय उवाचइत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः।संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम्

अंग्रेज़ी

Sanjaya said, Thus, I have heard this wonderful dialogue between Krishna and the high-souled Arjuna, which causes one's hair to stand on end.

हिन्दी

संजय ने कहा -- इस प्रकार मैंने भगवान् वासुदेव और महात्मा अर्जुन के इस अद्भुत और रोमान्चक संवाद का वर्णन किया।।

नेपाली

सञ्जयले भने — यसरी मैले श्रीकृष्ण र महात्मा पार्थको यो अद्भुत, रोमाञ्चकारी संवाद सुनेँ।

vyasa
श्लोक 75 सञ्जय उवाच · संजय सुनाते हैं
संस्कृत

व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतद्गुह्यमहं परम्।योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम्

अंग्रेज़ी

Through the grace of Vyasa, I have heard this supreme and most secret Yoga, directly from Krishna, the Lord of Yoga, Himself declaring it.

हिन्दी

व्यास जी की कृपा से मैंने इस परम् गुह्य योग को साक्षात् कहते हुए स्वयं योगोश्वर श्रीकृष्ण भगवान् से सुना।।

नेपाली

व्यासको कृपाले मैले यो परम गोप्य योग साक्षात् योगेश्वर श्रीकृष्णको मुखबाट सुनेँ।

श्लोक 76 सञ्जय उवाच · संजय सुनाते हैं
संस्कृत

राजन्संस्मृत्य संस्मृत्य संवादमिममद्भुतम्।केशवार्जुनयोः पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहुः

अंग्रेज़ी

O King, remembering this wonderful and holy dialogue between Krishna and Arjuna, I continually rejoice.

हिन्दी

हे राजन् ! भगवान् केशव और अर्जुन के इस अद्भुत और पुण्य (पवित्र) संवाद को स्मरण करके मैं बारम्बार हर्षित होता हूँ।।

नेपाली

हे राजन्! केशव र अर्जुनको यो अद्भुत पवित्र संवादलाई बारम्बार सम्झेर म पटक-पटक हर्षित हुँदै छु।

श्लोक 77 सञ्जय उवाच · संजय सुनाते हैं
संस्कृत

तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः। विस्मयो मे महान् राजन् हृष्यामि च पुनः पुनः

अंग्रेज़ी

And, remembering again and again that most wonderful form of Hari, I am filled with great wonder, O King; and I rejoice again and again.

हिन्दी

हे राजन ! श्री हरि के अति अद्भुत रूप को भी पुन: पुन: स्मरण करके मुझे महान् विस्मय होता है और मैं बारम्बार हर्षित हो रहा हूँ।।

नेपाली

हे राजन्! हरिको त्यो अति अद्भुत रूपलाई पनि बारम्बार सम्झेर मेरो हृदय महान् विस्मयले भरिएको छ — म पटक-पटक हर्षित हुँदै छु।

श्लोक 78 सञ्जय उवाच · संजय सुनाते हैं
संस्कृत

यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः। तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम।।18.78।

अंग्रेज़ी

Wherever Krishna, the Lord of Yoga, is; and wherever Arjuna, the wielder of the bow, is; there is prosperity, victory, happiness, and a firm policy; this is my conviction.

हिन्दी

जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण हैं और जहाँ धनुर्धारी अर्जुन है वहीं पर श्री, विजय, विभूति और ध्रुव नीति है, ऐसा मेरा मत है।।

नेपाली

जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण छन् र जहाँ धनुर्धर पार्थ छन्, त्यहीँ श्री, विजय, समृद्धि र अचल नीति छन् — यो मेरो दृढ मत हो।