Chapter 18

Moksha Sanyasa Yoga

The eighteenth chapter of the Bhagavad Gita is "Moksha Sanyas Yoga". Arjuna requests the Lord to explain the difference between the two types of renunciations - sanyaas(renunciation of actions) and tyaag(renunciation of desires). Krishna explains that a sanyaasi is one who abandons family and society in order to practise spiritual discipline whereas a tyaagi is one who performs their duties without attachment to the rewards of their actions and dedicating them to the God. Krishna recommends the second kind of renunciation - tyaag. Krishna then gives a detailed analysis of the effects of the three modes of material nature. He declares that the highest path of spirituality is pure, unconditional loving service unto the Supreme Divine Personality, Krishna. If we always remember Him, keep chanting His name and dedicate all our actions unto Him, take refuge in Him and make Him our Supreme goal, then by His grace, we will surely overcome all obstacles and difficulties and be freed from this cycle of birth and death.

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Verse 1 अर्जुन उवाच · Arjuna speaks
Sanskrit

अर्जुन उवाच संन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम्। त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन

English

Arjuna said, "O mighty-armed Hrishikesa, I desire to know the essence or truth of renunciation and abandonment severally, O slayer of Kesi."

Hindi

अर्जुन ने कहा -- हे महाबाहो ! हे हृषीकेश ! हे केशनिषूदन ! मैं संन्यास और त्याग के तत्त्व को पृथक्-पृथक् जानना चाहता हूँ।।

Nepali

अर्जुनले भने — हे महाबाहु! हे हृषीकेश! हे केशिनिषूदन! म सन्न्यास र त्यागको तत्त्व अलग-अलग जान्न चाहन्छु।

Verse 2 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

श्री भगवानुवाच काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः। सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः

English

The Blessed Lord said, "The sages understand sannyasa to be the renunciation of action with desire; the wise declare the abandonment of the fruits of all actions to be tyaga."

Hindi

श्रीभगवान् ने कहा -- (कुछ) कवि (पण्डित) जन काम्य कर्मों के त्याग को "संन्यास" समझते हैं और विचारशील जन समस्त कर्मों के फलों के त्याग को "त्याग" कहते हैं।।

Nepali

श्रीभगवान्ले भने — कविजनहरूले काम्य कर्मको त्यागलाई 'सन्न्यास' भनेका छन्; विचक्षणहरूले सम्पूर्ण कर्मफलको परित्यागलाई 'त्याग' भनेका छन्।

Verse 3 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः। यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे

English

Some philosophers declare that actions should be abandoned as evil; while others declare that acts of sacrifice, gift, and austerity should not be relinquished.

Hindi

कुछ मनीषी जन कहते हैं कि समस्त कर्म दोषयुक्त होने के कारण त्याज्य हैं; और अन्य जन कहते हैं कि यज्ञ, दान और तपरूप कर्म त्याज्य नहीं हैं।।

Nepali

केही विचारकहरू भन्छन् 'सबै कर्म दोषयुक्त हुनाले त्याग्नुपर्छ'; अरूले 'यज्ञ, दान र तपको कर्म त्याग्नु हुँदैन' भन्छन्।

Verse 4 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

निश्चयं श्रृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम।त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः संप्रकीर्तितः

English

Hear from Me the conclusion or the final truth about this abandonment, O best of the Bharatas; abandonment, indeed, O best of men, has been declared to be of three kinds.

Hindi

हे भरतसत्तम ! उस त्याग के विषय में तुम मेरे निर्णय को सुनो। हे पुरुष श्रेष्ठ ! वह त्याग तीन प्रकार का कहा गया है।।

Nepali

हे भरतर्षभ! त्यो त्यागको निश्चय मसँग सुन; हे पुरुषव्याघ्र! त्याग तीन प्रकारको बताइएको छ।

Verse 5 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्।यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्

English

Acts of sacrifice, gift, and austerity should not be abandoned, but should be performed; for sacrifice, gift, and austerity are the purifiers of the wise.

Hindi

यज्ञ, दान और तपरूप कर्म त्याज्य नहीं है, किन्तु वह नि:सन्देह कर्तव्य है; यज्ञ, दान और तप ये मनीषियों (साधकों) को पवित्र करने वाले हैं।।

Nepali

यज्ञ, दान र तप कर्म त्याज्य होइनन्; ती कर्तव्य नै हुन्; यज्ञ, दान र तप मनस्वी पुरुषहरूका पवित्रकारक हुन्।

Verse 6 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च।कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्िचतं मतमुत्तमम्

English

But even these actions should be performed, leaving aside attachment and the desire for rewards, O Arjuna; this is my certain and most assured conviction.

Hindi

हे पार्थ ! इन कर्मों को भी, फल और आसक्ति को त्यागकर करना चाहिए, यह मेरा निश्चय किया हुआ उत्तम मत है।।

Nepali

तर हे पार्थ! यिनलाई पनि आसक्ति र फलको त्याग गरेर गर्नुपर्छ — यो मेरो निश्चित श्रेष्ठ मत हो।

Verse 7 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

नियतस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते।मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः

English

Verily, the renunciation of obligatory action is not proper; the abandonment of the same out of delusion is declared to be Tamasic.

Hindi

नियत कर्म का त्याग उचित नहीं है; मोहवश उसका त्याग करना "तामस त्याग" कहा गया है।।

Nepali

नियत कर्मको त्याग गर्नु उचित होइन; मोहले त्यसको त्याग गर्नुलाई तामस त्याग भनिएको छ।

Verse 8 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत्।स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत्

English

He who abandons action out of fear of bodily trouble (because it is painful), does not obtain the merit of renunciation by performing such Rajasic renunciation.

Hindi

जो मनुष्य, कर्म को दु:ख समझकर शारीरिक कष्ट के भय से त्याग देता है, वह पुरुष उस राजसिक त्याग को करके कदापि त्याग के फल को प्राप्त नहीं होता है।।

Nepali

जसले 'कर्म दुःखप्रद हो' भनेर शरीरकष्टको भयले त्याग्छ, त्यसले त्यो राजस त्याग गरेर त्यागको फल पाउँदैन।

Verse 9 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन।सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः

English

Whatever obligatory action is done, O Arjuna, merely because it ought to be done, abandoning attachment and also the desire for reward, that renunciation is regarded as sattvic (pure).

Hindi

हे अर्जुन ! "कर्म करना कर्तव्य है" ऐसा समझकर जो नियत कर्म आसक्ति और फल को त्यागकर किया जाता है, वही सात्त्विक त्याग माना गया है।।

Nepali

हे अर्जुन! 'कर्तव्य हो' भनेर आसक्ति र फलको त्याग गरेर नियत कर्म गरिएमा त्यो त्याग सात्त्विक मानिन्छ।

Verse 10 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते।त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः

English

The man of renunciation, pervaded by purity, intelligent, and with his doubts cut asunder, does not hate an unpleasant task nor is he attached to a pleasant one.

Hindi

जो पुरुष अकुशल (अशुभ) कर्म से द्वेष नहीं करता और कुशल (शुभ) कर्म में आसक्त नहीं होता, वह सत्त्वगुण से सम्पन्न पुरुष संशयरहित, मेधावी (ज्ञानी) और त्यागी है।।

Nepali

सात्त्विकगुणले पूर्ण, मेधावी, संशयरहित त्यागी अकुशल कर्ममा द्वेष गर्दैन र कुशल कर्ममा आसक्त पनि हुँदैन।

Verse 11 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः।यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते

English

Indeed, it is not possible for an embodied being to completely abandon actions; however, he who relinquishes the rewards of actions is truly called a man of renunciation.

Hindi

क्योंकि देहधारी पुरुष के द्वारा अशेष कर्मों का त्याग संभव नहीं है, इसलिए जो कर्मफल त्यागी है, वही पुरुष त्यागी कहा जाता है।।

Nepali

देहधारीद्वारा सम्पूर्ण कर्म छाड्न सम्भव छैन; जसले कर्मफलको त्याग गर्छ, त्यसैलाई त्यागी भनिन्छ।

Verse 12 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम्।भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु संन्यासिनां क्वचित्

English

The threefold fruit of action (evil, good, and mixed) accrues after death to those who do not abandon it, but never to those who do.

Hindi

कर्मों के शुभ, अशुभ और मिश्र ये त्रिविध फल केवल अत्यागी जनों को मरण के पश्चात् भी प्राप्त होते हैं; परन्तु संन्यासी पुरुषों को कदापि नहीं।।

Nepali

त्यागीहरूलाई कर्मफल पछि कहिल्यै लाग्दैन; तर अत्यागीहरूलाई इष्ट, अनिष्ट र मिश्रित — तीन प्रकारको कर्मफल मरणपछि प्राप्त हुन्छ।

Verse 13 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे।सांख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम्

English

Learn from Me, O mighty-armed Arjuna, these five causes, as declared in the Sankhya system, for the accomplishment of all actions.

Hindi

हे महाबाहो ! समस्त कर्मों की सिद्धि के लिए ये पांच कारण सांख्य सिद्धांत में कहे गये हैं, जिनको तुम मुझसे भलीभांति जानो।।

Nepali

हे महाबाहु! सम्पूर्ण कर्मको सिद्धिका लागि साङ्ख्य-शास्त्रमा कथित पाँच कारण मसँग सुन।

Verse 14 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्।विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम्

English

The body, the doer, the various senses, the different functions of various kinds, and the presiding deity—the fifth.

Hindi

अधिष्ठान (शरीर), कर्ता ,विविध करण (इन्द्रियादि) ,विविध और पृथक्-पृथक् चेष्टाएं तथा पाँचवा हेतु दैव है।।

Nepali

अधिष्ठान (शरीर), कर्ता, विविध प्रकारका करण, विविध प्रकारका चेष्टा र पाँचौँ दैव —

Verse 15 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः।न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः

English

Whatever action a person performs with their body, speech, and mind, whether right or wrong, these five are its causes.

Hindi

मनुष्य अपने शरीर, वाणी और मन से जो कोई न्याय्य (उचित) या विपरीत (अनुचित) कर्म करता है, उसके ये पाँच कारण ही हैं।।

Nepali

मानिसले शरीर, वाणी र मनद्वारा जे जे शास्त्रोचित वा विपरीत कर्म आरम्भ गर्छ, ती पाँच नै यसका कारण हुन्।

Verse 16 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः।पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः

English

Now, such being the case, verily he who, owing to an untrained understanding, looks upon his Self, which is isolated, as the agent, he of perverted intelligence does not see.

Hindi

अब इस स्थिति में जो पुरुष असंस्कृत बुद्धि होने के कारण, केवल शुद्ध आत्मा को कर्ता समझता हैं, वह दुर्मति पुरुष (यथार्थ) नहीं देखता है।।

Nepali

यस्तो स्थितिमा पनि असंस्कृत बुद्धि भएकाले शुद्ध आत्मालाई कर्ता देख्ने त्यो मन्द-बुद्धि पुरुषले यथार्थ देख्दैन।

Verse 17 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते।हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते

English

He who is free from the egoistic notion, whose intelligence is not tainted by good or evil, though he slays these people, he does not slay, nor is he bound by the action.

Hindi

जिस पुरुष में अहंकार का भाव नहीं है और बुद्धि किसी (गुण दोष) से लिप्त नहीं होती, वह पुरुष इन सब लोकों को मारकर भी वास्तव में न मरता है और न (पाप से) बँधता है।।

Nepali

जसमा अहङ्कारको भाव छैन र जसको बुद्धि लिप्त हुँदैन, उसले यी लोकलाई मारेर पनि न मार्छ, न कर्मले बाँधिन्छ।

Verse 18 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना।करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसंग्रहः

English

Knowledge, the knowable, and the knower form the threefold impulse for action; the organ, the action, and the agent form the threefold basis of action.

Hindi

ज्ञान, ज्ञेय और परिज्ञाता ये त्रिविध कर्म प्रेरक हैं, और, करण, कर्म. कर्ता ये त्रिविध कर्म संग्रह हैं।।

Nepali

ज्ञान, ज्ञेय र परिज्ञाता — कर्मको त्रिविध प्रेरणा हुन्; करण, कर्म र कर्ता — कर्मको त्रिविध सङ्ग्रह हो।

Verse 19 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः।प्रोच्यते गुणसंख्याने यथावच्छृणु तान्यपि

English

Knowledge, action, and actor are declared in the science of the Gunas (Sankhya philosophy) to be of three kinds only, according to the distinction of the Gunas. Of these, hear duly.

Hindi

ज्ञान, कर्म और कर्ता भी गुणों के भेद से सांख्यशास्त्र (गुणसंख्याने) में त्रिविध ही कहे गये हैं; उनको भी तुम मुझ से यथावत् श्रवण करो।।

Nepali

गुण-गणनमा गुण-भेद अनुसार ज्ञान, कर्म र कर्ता तीन प्रकारका भनिएका छन्; तिनलाई पनि यथार्थ रूपमा सुन।

Verse 20 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते।अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम्

English

That by which one sees the indestructible Reality in all beings, not separate in any of them—know that knowledge to be Sattvic.

Hindi

जिस ज्ञान से मनुष्य, विभक्त रूप में स्थित समस्त भूतों में एक अविभक्त और अविनाशी (अव्यय) स्वरूप को देखता है, उस ज्ञान को तुम सात्त्विक जानो।।

Nepali

जसले विभक्त भएका सबै प्राणीमा अविभक्त एक अव्ययभावलाई देख्छ — त्यो ज्ञान सात्त्विक हो।

Verse 21 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान्।वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम्

English

But that knowledge which sees in all beings various entities of distinct kinds as being distinct from one another, know thou that knowledge to be Rajasic.

Hindi

जिस ज्ञान के द्वारा मनुष्य समस्त भूतों में नाना भावों को पृथक्-पृथक् जानता है, उस ज्ञान को तुम राजस जानो।।

Nepali

जुन ज्ञानले सबै प्राणीमा पृथक्-पृथक् नानाविध भाव देख्छ, त्यो ज्ञान राजस हो।

Verse 22 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम्।अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम्

English

But that which clings to one single effect as if it were the whole, without reason, without any foundation in Truth, and is trivial—that is declared to be Tamasic.

Hindi

और जिस ज्ञान के द्वारा मनुष्य एक कार्य (शरीर) में ही आसक्त हो जाता है, मानो वह (कार्य ही) पूर्ण वस्तु हो तथा जो (ज्ञान) हेतुरहित (अयुक्तिक), तत्त्वार्थ से रहित तथा संकुचित (अल्प) है, वह (ज्ञान) तामस है।।

Nepali

जुन ज्ञान कुनै एउटा कार्यलाई सबै ठानेर हेर्छ, हेतुरहित, तत्त्वार्थरहित र तुच्छ छ, त्यो ज्ञान तामस भनिएको छ।

Verse 23 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

नियतं सङ्गरहितमरागद्वेषतः कृतम्।अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते

English

An action that is ordained, free from attachment, done without love or hatred, and without desire for reward is declared to be Sattvic.

Hindi

जो कर्म (शास्त्रविधि से) नियत और संगरहित है, तथा फल को न चाहने वाले पुरुष के द्वारा बिना किसी राग द्वेष के किया गया है, वह (कर्म) सात्त्विक कहा जाता है।।

Nepali

नियत, अनासक्त, रागद्वेषरहित, फलाकाङ्क्षारहितले गरिएको कर्म सात्त्विक भनिन्छ।

Verse 24 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

यत्तु कामेप्सुना कर्म साहङ्कारेण वा पुनः।क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम्

English

But that action which is done by one longing for the fulfillment of desires or gain with egotism or with much effort is declared to be Rajasic (passionate).

Hindi

और जो कर्म बहुत परिश्रम से युक्त है तथा फल की कामना वाले, अहंकारयुक्त पुरुष के द्वारा किया जाता है, वह कर्म राजस कहा गया है।।

Nepali

कामनाले प्रेरित वा अहङ्कारले बहुप्रयासले गरिएको कर्म राजस भनिएको छ।

Verse 25 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

अनुबन्धं क्षयं हिंसामनपेक्ष्य च पौरुषम्।मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते

English

That action which is undertaken from delusion, without regard for the consequences, loss, injury, and one's own ability, is declared to be Tamasic (dark).

Hindi

जो कर्म परिणाम, हानि, हिंसा और सार्मथ्य (पौरुषम्) का विचार न करके केवल मोहवश आरम्भ किया जाता है, वह कर्म तामस कहलाता है।।

Nepali

अनुबन्ध, क्षय, हिंसा र आफ्नो सामर्थ्य नविचारी मोहले आरम्भ गरिएको कर्म तामस भनिन्छ।

Verse 26 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः।सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते

English

An agent who is free from attachment, non-egoistic, endowed with firmness and enthusiasm, and unaffected by success or failure, is considered to be of a Sattvic (pure) nature.

Hindi

जो कर्ता संगरहित, अहंमन्यता से रहित, धैर्य और उत्साह से युक्त एवं कार्य की सिद्धि (सफलता) और असिद्धि (विफलता) में निर्विकार रहता है, वह कर्ता सात्त्विक कहा जाता है।।

Nepali

मुक्तसङ्ग, अहङ्कारशून्य, धैर्य र उत्साहले पूर्ण, सिद्धि-असिद्धिमा निर्विकार कर्ता सात्त्विक हो।

Verse 27 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः।हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः

English

Passionate, desiring to obtain the reward of their actions, greedy, cruel, impure, moved by joy and sorrow, such an agent is said to be Rajasic.

Hindi

रागी, कर्मफल का इच्छुक, लोभी, हिंसक स्वभाव वाला, अशुद्ध और हर्षशोक से युक्त कर्ता राजस कहलाता है।।

Nepali

रागी, कर्मफलकामी, लोभी, हिंस्र, अशुद्ध, हर्ष-शोकले युक्त कर्ता राजस भनिन्छ।

Verse 28 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैष्कृतिकोऽलसः।विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते

English

Unsteady, vulgar, inflexible, deceitful, malicious, lazy, despondent, and procrastinating—such an agent is called Tamasic.

Hindi

अयुक्त, प्राकृत, स्तब्ध, शठ, नैष्कृतिक, आलसी, विषादी और दीर्घसूत्री कर्ता तामस कहा जाता है।।

Nepali

अयुक्त, अशिष्ट, हठी, शठ, नैष्कृतिक, आलसी, विषादी र दीर्घसूत्री कर्ता तामस भनिन्छ।

Verse 29 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं श्रृणु।प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनञ्जय

English

Hear thou the threefold division of intellect and firmness, according to the Gunas, as I declare them fully and distinctly, O Arjuna.

Hindi

हे धनंजय ! मेरे द्वारा अशेषत: और पृथकत: कहे जाने वाले, गुणों के कारण उत्पन्न हुए बुद्धि और धृति के त्रिविध भेद को सुनो।।

Nepali

हे धनञ्जय! बुद्धि र धैर्यको पनि गुणानुसार त्रिविध भेद म पूर्णतः बताउँछु, सुन।

Verse 30 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये।बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी

English

The intellect which knows the path of work and renunciation, what should be done and what should not be done, fear and fearlessness, bondage and liberation—that intellect is Sattvic (pure), O Arjuna.

Hindi

हे पार्थ ! जो बुद्धि प्रवृत्ति और निवृत्ति, कार्य और अकार्य, भय और अभय तथा बन्ध और मोक्ष को तत्त्वत जानती है, वह बुद्धि सात्विकी है।।

Nepali

हे पार्थ! प्रवृत्ति-निवृत्ति, कर्तव्य-अकर्तव्य, भय-अभय र बन्ध-मोक्ष जान्ने बुद्धि सात्त्विक हो।

Verse 31 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च।अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी

English

That by which one wrongly understands dharma and adharma, and also what ought to be done and what ought not to be done—that intellect, O Arjuna, is rajasic (passionate).

Hindi

हे पार्थ ! जिस बुद्धि के द्वारा मनुष्य धर्म और अधर्म को तथा कर्तव्य और अकर्तव्य को यथावत् नहीं जानता है, वह बुद्धि राजसी है।।

Nepali

हे पार्थ! धर्म र अधर्म, कर्तव्य र अकर्तव्य अयथार्थ रूपमा जान्ने बुद्धि राजस हो।

Verse 32 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसाऽऽवृता।सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी

English

That intellect, O Arjuna, which is enveloped in darkness and sees Adharma as Dharma and all things perverted, is Tamasic (dark).

Hindi

हे पार्थ ! तमस् (अज्ञान अन्ध:कार) से आवृत जो बुद्धि अधर्म को ही धर्म मानती है और सभी पदार्थों को विपरीत रूप से जानती है, वह बुद्धि तामसी है।।

Nepali

हे पार्थ! जुन बुद्धि तमोग्रस्त भएर अधर्मलाई धर्म र सबै वस्तुलाई विपरीत देख्छ, त्यो बुद्धि तामस हो।

Verse 33 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः।योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी

English

The unwavering firmness, through which Yoga restrains the functions of the mind, life-force, and senses—that firmness, O Arjuna, is Sattvic (pure).

Hindi

सात्त्विकी है।।

Nepali

हे पार्थ! जुन अव्यभिचारिणी धृतिले मन, प्राण र इन्द्रियका क्रियाहरूलाई योगद्वारा धारण गर्छ, त्यो धृति सात्त्विक हो।

Verse 34 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

यया तु धर्मकामार्थान् धृत्या धारयतेऽर्जुन।प्रसङ्गेन फलाकाङ्क्षी धृतिः सा पार्थ राजसी

English

But that, O Arjuna, by which one holds fast to Dharma (duty), enjoyment of pleasures, and earning of wealth, on account of attachment and desire for reward—that firmness, O Arjuna, is Rajasic (passionate).

Hindi

हे पृथापुत्र अर्जुन ! कर्मफल का इच्छुक पुरुष अति आसक्ति (प्रसंग) से जिस धृति के द्वारा धर्म, अर्थ और काम (इन तीन पुरुषार्थों) को धारण करता है, वह धृति राजसी है।।

Nepali

हे अर्जुन! जुन धृतिले धर्म, अर्थ र कामलाई आसक्ति र फलकामनाले धारण गर्छ, त्यो धृति राजस हो।

Verse 35 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च।न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी

English

That firmness, O Arjuna, by which a stupid man does not abandon sleep, fear, grief, despair, and conceit, is Tamasic.

Hindi

हो पार्थ ! दुर्बुद्धि पुरुष जिस धारणा के द्वारा, स्वप्न, भय, शोक, विषाद और मद को नहीं त्यागता है, वह धृति तामसी है।।

Nepali

हे पार्थ! जुन धृतिले दुर्बुद्धि पुरुषले निद्रा, भय, शोक, विषाद र मद त्याग्दैन, त्यो धृति तामस हो।

Verse 36 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

सुखं त्विदानीं त्रिविधं श्रृणु मे भरतर्षभ।अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति

English

And now, O Arjuna, hear from Me of the threefold pleasure, in which one rejoices through practice and surely comes to the end of pain.

Hindi

हे भरतश्रेष्ठ ! अब तुम त्रिविध सुख को मुझसे सुनो, जिसमें (साधक पुरुष) अभ्यास से रमता है और दु:खों के अन्त को प्राप्त होता है (जहाँ उसके दु:खों का अन्त हो जाता है।)।।

Nepali

हे भरतर्षभ! अब तीन प्रकारका सुख मसँग सुन — जसमा अभ्यासले रमाएको पुरुषले दुःखको अन्त्य पाउँछ।

Verse 37 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम्।तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम्

English

That which is like poison at first but in the end like nectar—that happiness is declared to be sattvic, born of the purity of one's own mind due to self-realization.

Hindi

जो सुख प्रथम (प्रारम्भ में) विष के समान (भासता) है, परन्तु परिणाम में अमृत के समान है, वह आत्मबुद्धि के प्रसाद से उत्पन्न सुख सात्त्विक कहा गया है।।

Nepali

सुरुमा विषजस्तो लाग्ने तर अन्त्यमा अमृत हुने, आत्मबुद्धि-प्रसादबाट उत्पन्न सुख सात्त्विक भनिएको छ।

Verse 38 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम्।परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम्

English

That happiness which arises from the contact of the senses with the objects, which is initially like nectar but eventually like poison, is said to be Rajasic.

Hindi

जो सुख विषयों और इन्द्रियों के संयोग से उत्पन्न होता है, वह प्रथम तो अमृत के समान, परन्तु परिणाम में विष तुल्य होता है, वह सुख राजस कहा गया है।।

Nepali

विषय र इन्द्रियको संयोगबाट उत्पन्न सुरुमा अमृतजस्तो र अन्त्यमा विषतुल्य हुने सुख राजस भनिएको छ।

Verse 39 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः।निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम्

English

That happiness which at first, as well as in the end, deludes the self, and which arises from sleep, indolence, and heedlessness—that is declared to be Tamasic.

Hindi

जो सुख प्रारम्भ में और परिणाम (अनुबन्ध) में भी आत्मा (मनुष्य) को मोहित करने वाला होता है, वह निद्रा, आलस्य और प्रमाद से उत्पन्न सुख तामस कहा जाता है।।

Nepali

जुन सुख आरम्भमा र पछि पनि आत्मालाई मोहित गर्ने, निद्रा, आलस्य र प्रमादबाट उत्पन्न हो — त्यो तामस भनिएको छ।

Verse 40 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः।सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्ित्रभिर्गुणैः

English

There is no being on earth or in heaven among the gods that is liberated from the three qualities born of Nature.

Hindi

पृथ्वी पर अथवा स्वर्ग के देवताओं में ऐसा कोई प्राणी (सत्त्वं अर्थात् विद्यमान वस्तु) नहीं है जो प्रकृति से उत्पन्न इन तीन गुणों से मुक्त (रहित) हो।।

Nepali

पृथ्वीमा वा स्वर्गमा देवताहरूमध्ये कुनै पनि त्यस्तो प्राणी छैन जो प्रकृतिजात यी तीन गुणबाट मुक्त हो।

Verse 41 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परंतप।कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः

English

Of Brahmanas, Kshatriyas, Vaisyas, and Sudras, O Arjuna, the duties are distributed according to the qualities born of their own nature.

Hindi

हे परन्तप!  ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों और शूद्रों के कर्म, स्वभाव से उत्पन्न गुणों के अनुसार विभक्त किये गये हैं।।

Nepali

हे परन्तप! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य र शूद्र — सबैका कर्म स्वभावजात गुण अनुसार विभाजित छन्।

Verse 42 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च।ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम्

English

Serenity, self-restraint, austerity, purity, forgiveness, and uprightness, as well as knowledge, realization, and belief in God, are the duties of Brahmanas, born of their own nature.

Hindi

शम, दम, तप, शौच, क्षान्ति, आर्जव, ज्ञान, विज्ञान और आस्तिक्य - ये ब्राह्मण के स्वाभाविक कर्म हैं।।

Nepali

शम, दम, तप, शौच, क्षमा, आर्जव, ज्ञान, विज्ञान र आस्तिकता — ब्राह्मणको स्वभावजात कर्म हुन्।

Verse 43 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम्।दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम्

English

Prowess, splendor, firmness, dexterity, and not fleeing from battle, generosity, and lordliness are the duties of the Kshatriyas, born of their own nature.

Hindi

शौर्य, तेज, धृति, दाक्ष्य (दक्षता), युद्ध से पलायन न करना, दान और ईश्वर भाव (स्वामी भाव) - ये सब क्षत्रिय के स्वाभाविक कर्म हैं।।

Nepali

शौर्य, तेज, धैर्य, दक्षता, युद्धमा नभाग्ने, दान र ईश्वर-भाव — क्षत्रियको स्वभावजात कर्म हुन्।

Verse 44 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम्।परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम्

English

Agriculture, cattle-rearing, and trade are the duties of the Vaisya (merchant), born of their own nature; and service is the duty of the Sudra (servant-class), born of their own nature.

Hindi

कृषि, गौपालन तथा वाणिज्य - ये वैश्य के स्वाभाविक कर्म हैं, और शूद्र का स्वाभाविक कर्म है परिचर्या अर्थात् सेवा करना।।

Nepali

कृषि, गोरक्षा र वाणिज्य वैश्यको स्वभावजात कर्म हुन्; सेवा शूद्रको स्वभावजात कर्म हो।

Verse 45 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः।स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु

English

Each person devoted to their own duty attains perfection. How they attain perfection while being engaged in their own duty, hear now.

Hindi

अपने-अपने स्वाभाविक कर्म में अभिरत मनुष्य संसिद्धि को प्राप्त कर लेता है। स्वकर्म में रत मनुष्य किस प्रकार सिद्धि प्राप्त करता है, उसे तुम सुनो।।

Nepali

आ-आफ्नो कर्ममा रत मानिसले सिद्धि पाउँछ; स्वकर्म-रत पुरुषले कसरी सिद्धि पाउँछ, त्यो सुन।

Verse 46 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्।स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः

English

He from whom all the beings have evolved and by whom all this is pervaded, worshipping Him with his own duty, one attains perfection.

Hindi

जिस (परमात्मा) से भूतमात्र की प्रवृत्ति अर्थात् उत्पत्ति हुई है और जिससे यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है, उस (परमात्मा) की स्वकर्म द्वारा पूजा करके मनुष्य सिद्धि को प्राप्त होता है।।

Nepali

जुन परमेश्वरबाट प्राणीहरूको उत्पत्ति हुन्छ र जसले सम्पूर्ण जगत् व्याप्त गरेका छन्, त्यसैलाई स्वकर्मद्वारा पुजेर मानिसले सिद्धि पाउँछ।

Verse 47 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्

English

Better is one's own duty, even if it is destitute of merits, than the duty of another well performed. He who does the duty ordained by his own nature incurs no sin.

Hindi

सम्यक् अनुष्ठित परधर्म की अपेक्षा गुणरहित स्वधर्म श्रेष्ठ है। (क्योंकि) स्वभाव से नियत किये गये कर्म को करते हुए मनुष्य पाप को नहीं प्राप्त करता।।

Nepali

राम्ररी अनुष्ठान गरिएको पराधर्मभन्दा गुणरहित स्वधर्म पनि श्रेष्ठ हो; स्वभावजात कर्म गर्ने पुरुषलाई पाप लाग्दैन।

Verse 48 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्।सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः

English

One should not, O Arjuna, abandon the duty to which one is born, though it may be faulty; for, all undertakings are enveloped by evil, just as fire is by smoke.

Hindi

हे कौन्तेय ! दोषयुक्त होने पर भी सहज कर्म को नहीं त्यागना चाहिए; क्योंकि सभी कर्म दोष से आवृत होते है, जैसे धुयें से अग्नि।।

Nepali

हे कौन्तेय! दोषयुक्त भए पनि सहज कर्म त्याग्नु हुँदैन; धूवाँले आगो ढाकिएझैँ सबै आरम्भ दोषले छोपिएका हुन्छन्।

Verse 49 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः।नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां संन्यासेनाधिगच्छति

English

He whose intellect is unattached everywhere, who has subdued his self, from whom desire has fled, he attains the supreme state of freedom from action through renunciation.

Hindi

सर्वत्र आसक्ति रहित बुद्धि वाला वह पुरुष जो स्पृहारहित तथा जितात्मा है, संन्यास के द्वारा परम नैर्ष्कम्य सिद्धि को प्राप्त होता है।।

Nepali

सर्वत्र असक्त बुद्धि, जितेन्द्रिय, कामनारहित पुरुषले सन्न्यासद्वारा परम नैष्कर्म्य-सिद्धि प्राप्त गर्छ।

Verse 50 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे।समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा

English

Learn from Me, O Arjuna, in brief how one who has attained perfection reaches Brahman—the Eternal, that supreme state of knowledge.

Hindi

सिद्धि को प्राप्त पुरुष किस प्रकार ब्रह्म को प्राप्त होता है, तथा ज्ञान की परा निष्ठा को भी तुम मुझसे संक्षेप में जानो।।

Nepali

हे कौन्तेय! सिद्धि पाएको पुरुष कसरी ब्रह्म प्राप्त गर्छ — त्यो ज्ञानको परम निष्ठा मसँग सङ्क्षेपमा सुन।

Verse 51 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्याऽऽत्मानं नियम्य च।शब्दादीन् विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च

English

Endowed with a pure intellect, controlling the self through firmness, relinquishing sound and other objects and abandoning attraction and hatred.

Hindi

विशुद्ध बुद्धि से युक्त, धृति से आत्मसंयम कर, शब्दादि विषयों को त्याग कर और राग-द्वेष का परित्याग कर....৷৷৷৷।।

Nepali

विशुद्ध बुद्धिले युक्त, धैर्यले आत्म-संयम गर्दै शब्दादि विषयको त्याग गर्दै राग-द्वेष त्यागेर —

Verse 52 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः।ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः

English

Dwelling in solitude, eating sparingly, with speech, body, and mind subdued, always engaged in meditation and concentration, and resorting to dispassion.

Hindi

विविक्त सेवी, लघ्वाशी (मिताहारी) जिसने अपने शरीर, वाणी और मन को संयत किया है, ध्यानयोग के अभ्यास में सदैव तत्पर तथा वैराग्य पर समाश्रित।।

Nepali

एकान्तसेवी, मिताहारी, संयतवाक्-काय-मन, सदा ध्यान-योगमा परायण, वैराग्य-समाश्रित —

Verse 53 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम्।विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते

English

Having abandoned egoism, strength, arrogance, desire, anger, and covetousness, and being free from the notion of 'mine' and peaceful, he is fit for becoming Brahman.

Hindi

अहंकार, बल, दर्प, काम, क्रोध और परिग्रह को त्याग कर ममत्वभाव से रहित और शान्त पुरुष ब्रह्म प्राप्ति के योग्य बन जाता है।।

Nepali

अहङ्कार, बल, दर्प, काम, क्रोध र परिग्रह त्यागेर निर्ममता र शान्ति पाएको पुरुष ब्रह्म-भावको योग्य हुन्छ।

Verse 54 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति।समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम्

English

Becoming Brahman, serene in the Self, he neither grieves nor desires; he is the same to all beings, and obtains supreme devotion to Me.

Hindi

ब्रह्मभूत (जो साधक ब्रह्म बन गया है), प्रसन्न मन वाला पुरुष न इच्छा करता है और न शोक, समस्त भूतों के प्रति सम होकर वह मेरी परा भक्ति को प्राप्त करता है।।

Nepali

ब्रह्म-भाव पाएको प्रसन्न-आत्मा पुरुषले न शोक गर्छ न कामना गर्छ; सबै प्राणीमा समान भएर ममा परम भक्ति प्राप्त गर्छ।

Verse 55 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः।ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्

English

By devotion, he knows Me in truth, who and what I am; then, having known Me in truth, he immediately enters into the Supreme.

Hindi

(उस परा) भक्ति के द्वारा मुझे वह तत्त्वत: जानता है कि मैं कितना (व्यापक) हूँ तथा मैं क्या हूँ। (इस प्रकार) तत्त्वत: जानने के पश्चात् तत्काल ही वह मुझमें प्रवेश कर जाता है, अर्थात् मत्स्वरूप बन जाता है।।

Nepali

त्यो भक्तिले उसले मलाई जे र जति छु, त्यथार्थ रूपमा जान्दछ; तत्त्वतः जानेपछि उसले मेरो स्वरूपमा प्रवेश गर्छ।

Verse 56 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः।मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम्

English

Having taken refuge in Me and doing all actions, by My grace he obtains the eternal, indestructible state of being.

Hindi

जो पुरुष मदाश्रित होकर सदैव समस्त कर्मों को करता है, वह मेरे प्रसाद (अनुग्रह) से शाश्वत, अव्यय पद को प्राप्त कर लेता है।।

Nepali

मेरै शरणमा रहेर सम्पूर्ण कर्म गर्ने पुरुषले मेरो अनुग्रहले शाश्वत अव्यय पद प्राप्त गर्छ।

Verse 57 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः।बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव

English

Mentally renouncing all actions in Me, having Me as the highest goal, and resorting to the yoga of discrimination, do thou ever fix thy mind on Me.

Hindi

मन से समस्त कर्मों का संन्यास मुझमें करके मत्परायण होकर बुद्धियोग का आश्रय लेकर तुम सतत मच्चित्त बनो।।

Nepali

चेतना-पूर्वक मलाई सम्पूर्ण कर्म समर्पण गर्दै, मलाई परम लक्ष्य मानेर बुद्धियोगमा स्थित रहेर सदा ममा चित्त लगाऊ।

Verse 58 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि।अथ चेत्त्वमहङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि

English

Fixing your mind on Me, you shall, by My grace, overcome all obstacles; but if you will not hear Me due to egoism, you shall perish.

Hindi

मच्चित्त होकर तुम मेरी कृपा से समस्त कठिनाइयों (सर्वदुर्गाणि) को पार कर जाओगे; और यदि अहंकारवश (इस उपदेश को) नहीं सुनोगे, तो तुम नष्ट हो जाओगे।।

Nepali

ममा चित्त लगाएमा मेरो अनुग्रहले सम्पूर्ण विघ्न तर्नेछौ; तर अहङ्कारवश नसुने तिमी नष्ट हुनेछौ।

Verse 59 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

यदहङ्कारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे।मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति

English

If, filled with egoism, thou thinkest, "I will not fight," then thy resolve is vain; nature will compel thee.

Hindi

और अहंकारवश तुम जो यह सोच रहे हो, "मैं युद्ध नहीं करूंगा", यह तुम्हारा निश्चय मिथ्या है, (क्योंकि) प्रकृति (तुम्हारा स्वभाव) ही तुम्हें (बलात् कर्म में) प्रवृत्त करेगी।।

Nepali

अहङ्कारले 'म युद्ध गर्दिनँ' भन्ने तिम्रो निश्चय व्यर्थ हो; तिम्रो प्रकृतिले नै तिमीलाई कर्ममा लगाउनेछ।

Verse 60 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा।कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपि तत्

English

O Arjuna, bound by your own Karma (action) born of your own nature, that which from delusion you wish not to do, even that you shall do helplessly.

Hindi

हे कौन्तेय ! तुम अपने स्वाभाविक कर्मों से बंधे हो, (अत:) मोहवशात् जिस कर्म को तुम करना नहीं चाहते हो, वही तुम विवश होकर करोगे।।

Nepali

हे कौन्तेय! स्वभावजात आफ्नै कर्मले बाँधिएको तिमी, जुन कर्म मोहले गर्न चाहन्नौ — त्यही पनि परवश भएर गर्नेछौ।

Verse 61 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया

English

The Lord dwells in the hearts of all beings, O Arjuna, causing all beings, by His illusory power, to revolve as if mounted on a machine.

Hindi

हे अर्जुन (मानों किसी) यन्त्र पर आरूढ़ समस्त भूतों को ईश्वर अपनी माया से घुमाता हुआ (भ्रामयन्) भूतमात्र के हृदय में स्थित रहता है।।

Nepali

हे अर्जुन! ईश्वर सम्पूर्ण प्राणीको हृदयमा बसेर मायाले यन्त्रमा बसालिएझैँ सबै प्राणीलाई भुमाइरहेका छन्।

Verse 62 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्

English

Fly to Him for refuge with all your being, O Arjuna; by His grace you will obtain supreme peace and the eternal abode.

Hindi

हे भारत ! तुम सम्पूर्ण भाव से उसी (ईश्वर) की शरण में जाओ। उसके प्रसाद से तुम परम शान्ति और शाश्वत स्थान को प्राप्त करोगे।।

Nepali

हे भारत! सर्वभावले उहाँकै शरण लेऊ; उहाँको अनुग्रहले परम शान्ति र शाश्वत स्थान पाउने छौ।

Verse 63 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया।विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु

English

Thus, wisdom more secret than secrecy itself has been declared to you by me. Reflect on it fully, then act as you wish.

Hindi

इस प्रकार समस्त गोपनीयों से अधिक गुह्य ज्ञान मैंने तुमसे कहा; इस पर पूर्ण विचार (विमृश्य) करने के पश्चात् तुम्हारी जैसी इच्छा हो, वैसा तुम करो।।

Nepali

यसरी गोप्यभन्दा पनि गोप्य ज्ञान मैले तिमीलाई बताएँ; यसलाई पूर्ण रूपले विचार गरेर जे चाहन्छौ, त्यही गर।

Verse 64 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

सर्वगुह्यतमं भूयः श्रृणु मे परमं वचः।इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम्

English

Hear again My supreme word, most secret of all; for you are dearly beloved of Me, I will tell you what is good.

Hindi

पुन: एक बार तुम मुझसे समस्त गुह्यों में गुह्यतम परम वचन (उपदेश) को सुनो। तुम मुझे अतिशय प्रिय हो, इसलिए मैं तुम्हें तुम्हारे हित की बात कहूंगा।।

Nepali

सबभन्दा गोप्य परम वचन फेरि सुन; तिमी मेरो अति प्रिय छौ, त्यसैले तिम्रो हितको कुरा म तिमीलाई भन्छु।

Verse 65 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे

English

Fix your mind on Me, be devoted to Me, sacrifice to Me, bow down to Me. You will come to Me; I truly promise you this, for you are dear to Me.

Hindi

तुम मच्चित, मद्भक्त और मेरे पूजक (मद्याजी) बनो और मुझे नमस्कार करो; (इस प्रकार) तुम मुझे ही प्राप्त होगे; यह मैं तुम्हे सत्य वचन देता हूँ,(क्योंकि) तुम मेरे प्रिय हो।।

Nepali

ममा मन लगाऊ, मेरो भक्त बन, मलाई यज्ञ अर्पण गर, मलाई प्रणाम गर — तिमी मलाई नै प्राप्त गर्नेछौ; तिमी मलाई प्रिय छौ, यो म साँचो प्रतिज्ञा गर्छु।

Verse 66 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः

English

Abandon all duties and take refuge in Me alone; I will liberate you from all sins; do not grieve.

Hindi

सब धर्मों का परित्याग करके तुम एक मेरी ही शरण में आओ, मैं तुम्हें समस्त पापों से मुक्त कर दूँगा, तुम शोक मत करो।।

Nepali

सबै धर्म त्यागेर एकमात्र म नै शरण भएर आऊ; म तिमीलाई सम्पूर्ण पापबाट मुक्त गर्नेछु, शोक नगर।

Verse 67 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन।न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति

English

Never speak this to one who is devoid of austerities or devotion, who does not render service, who does not desire to listen, or who cavils at Me.

Hindi

यह ज्ञान ऐसे पुरुष से नहीं कहना चाहिए, जो अतपस्क (तपरहित) है, और न उसे जो अभक्त है; उसे भी नहीं जो अशुश्रुषु (सेवा में अतत्पर) है और उस पुरुष से भी नहीं कहना चाहिए, जो मुझ (ईश्वर) से असूया करता है, अर्थात् मुझ में दोष देखता है।।

Nepali

यो रहस्य अतपस्वी, अभक्त, अशुश्रूषु वा मेरो निन्दा गर्नेलाई कहिल्यै नभन।

Verse 68 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

य इमं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति।भक्ितं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः

English

He who, with supreme devotion to Me, teaches this supreme secret to My devotees, shall undoubtedly come to Me.

Hindi

जो पुरुष मुझसे परम प्रेम (परा भक्ति) करके इस परम गुह्य ज्ञान का उपदेश मेरे भक्तों को देता है, वह नि:सन्देह मुझे ही प्राप्त होता है।।

Nepali

जसले मेरा भक्तहरूलाई परम भक्तिले यो परम गोप्य उपदेश दिन्छ, त्यो निःसन्देह मलाई नै प्राप्त गर्छ।

Verse 69 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

न च तस्मान्मनुष्येषु कश्िचन्मे प्रियकृत्तमः।भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि

English

There is no one among men who does service dearer to Me, nor shall there be anyone on earth dearer to Me than him.

Hindi

न तो उससे बढ़कर मेरा अतिशय प्रिय कार्य करने वाला मनुष्यों में कोई है और न उससे बढ़कर मेरा प्रिय इस पृथ्वी पर दूसरा कोई होगा।।

Nepali

मानिसहरूमा त्यसभन्दा प्रिय कर्मकर्ता मेरा लागि कोही छैन; पृथ्वीमा पनि त्योभन्दा प्रिय अरू मेरा लागि हुने छैन।

Verse 70 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः।ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः

English

And he who studies this sacred dialogue of ours, by him I shall have been worshipped through the sacrifice of wisdom; such is my conviction.

Hindi

जो पुरुष, हम दोनों के इस धर्ममय संवाद का पठन करेगा, उसके द्वारा मैं ज्ञानयज्ञ से पूजित होऊँगा - ऐसा मेरा मत है।।

Nepali

जसले हाम्रो यो धर्म-संवादलाई अध्ययन गर्छ, त्यसले मलाई ज्ञान-यज्ञद्वारा पुजेको हुनेछ — यो मेरो मत हो।

Verse 71 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

श्रद्धावाननसूयश्च श्रृणुयादपि यो नरः।सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम्

English

Also, the man who hears this, full of faith and free from malice, shall attain to the happy worlds of those of righteous deeds, and be liberated.

Hindi

तथा जो श्रद्धावान् और अनसुयु (दोषदृष्टि रहित) पुरुष इसका श्रवणमात्र भी करेगा, वह भी (पापों से) मुक्त होकर पुण्यकर्मियों के शुभ (श्रेष्ठ) लोकों को प्राप्त कर लेगा।।

Nepali

र जसले श्रद्धालु एवं अनसूय भएर मात्र सुन्छ, त्यो पनि मुक्त भएर पुण्यवान्हरूको शुभ लोक पाउँछ।

Verse 72 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा।कच्चिदज्ञानसंमोहः प्रनष्टस्ते धनञ्जय

English

Has this been heard, O Arjuna, with one-pointed focus? Has the delusion of your ignorance been destroyed, O Dhananjaya?

Hindi

हे पार्थ ! क्या इसे (मेरे उपदेश को) तुमने एकाग्रचित्त होकर श्रवण किया ? और हे धनञ्जय ! क्या तुम्हारा अज्ञान जनित संमोह पूर्णतया नष्ट हुआ ?

Nepali

हे पार्थ! के यो तिमीले एकाग्र चित्तले सुन्यौ? हे धनञ्जय! के तिम्रो अज्ञानजन्य मोह नष्ट भयो?

Verse 73 अर्जुन उवाच · Arjuna speaks
Sanskrit

अर्जुन उवाचनष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत।स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव

English

Arjuna said, "My delusion has been destroyed, for I have gained my knowledge (memory) through Your grace, O Krishna. I am now free from doubts. I will act according to Your word."

Hindi

अर्जुन ने कहा -- हे अच्युत ! आपके कृपाप्रसाद से मेरा मोह नष्ट हो गया है, और मुझे स्मृति (ज्ञान) प्राप्त हो गयी है? अब मैं संशयरहित हो गया हूँ और मैं आपके वचन (आज्ञा) का पालन करूँगा।।

Nepali

अर्जुनले भने — हे अच्युत! तपाईंको अनुग्रहले मेरो मोह नष्ट भयो, र मलाई स्मृति प्राप्त भयो; अब म संशयरहित भएर खडा छु, तपाईंको वचन अनुसार गर्नेछु।

Verse 74 सञ्जय उवाच · Sanjaya narrates
Sanskrit

सञ्जय उवाचइत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः।संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम्

English

Sanjaya said, Thus, I have heard this wonderful dialogue between Krishna and the high-souled Arjuna, which causes one's hair to stand on end.

Hindi

संजय ने कहा -- इस प्रकार मैंने भगवान् वासुदेव और महात्मा अर्जुन के इस अद्भुत और रोमान्चक संवाद का वर्णन किया।।

Nepali

सञ्जयले भने — यसरी मैले श्रीकृष्ण र महात्मा पार्थको यो अद्भुत, रोमाञ्चकारी संवाद सुनेँ।

vyasa
Verse 75 सञ्जय उवाच · Sanjaya narrates
Sanskrit

व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतद्गुह्यमहं परम्।योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम्

English

Through the grace of Vyasa, I have heard this supreme and most secret Yoga, directly from Krishna, the Lord of Yoga, Himself declaring it.

Hindi

व्यास जी की कृपा से मैंने इस परम् गुह्य योग को साक्षात् कहते हुए स्वयं योगोश्वर श्रीकृष्ण भगवान् से सुना।।

Nepali

व्यासको कृपाले मैले यो परम गोप्य योग साक्षात् योगेश्वर श्रीकृष्णको मुखबाट सुनेँ।

Verse 76 सञ्जय उवाच · Sanjaya narrates
Sanskrit

राजन्संस्मृत्य संस्मृत्य संवादमिममद्भुतम्।केशवार्जुनयोः पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहुः

English

O King, remembering this wonderful and holy dialogue between Krishna and Arjuna, I continually rejoice.

Hindi

हे राजन् ! भगवान् केशव और अर्जुन के इस अद्भुत और पुण्य (पवित्र) संवाद को स्मरण करके मैं बारम्बार हर्षित होता हूँ।।

Nepali

हे राजन्! केशव र अर्जुनको यो अद्भुत पवित्र संवादलाई बारम्बार सम्झेर म पटक-पटक हर्षित हुँदै छु।

Verse 77 सञ्जय उवाच · Sanjaya narrates
Sanskrit

तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः। विस्मयो मे महान् राजन् हृष्यामि च पुनः पुनः

English

And, remembering again and again that most wonderful form of Hari, I am filled with great wonder, O King; and I rejoice again and again.

Hindi

हे राजन ! श्री हरि के अति अद्भुत रूप को भी पुन: पुन: स्मरण करके मुझे महान् विस्मय होता है और मैं बारम्बार हर्षित हो रहा हूँ।।

Nepali

हे राजन्! हरिको त्यो अति अद्भुत रूपलाई पनि बारम्बार सम्झेर मेरो हृदय महान् विस्मयले भरिएको छ — म पटक-पटक हर्षित हुँदै छु।

Verse 78 सञ्जय उवाच · Sanjaya narrates
Sanskrit

यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः। तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम।।18.78।

English

Wherever Krishna, the Lord of Yoga, is; and wherever Arjuna, the wielder of the bow, is; there is prosperity, victory, happiness, and a firm policy; this is my conviction.

Hindi

जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण हैं और जहाँ धनुर्धारी अर्जुन है वहीं पर श्री, विजय, विभूति और ध्रुव नीति है, ऐसा मेरा मत है।।

Nepali

जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण छन् र जहाँ धनुर्धर पार्थ छन्, त्यहीँ श्री, विजय, समृद्धि र अचल नीति छन् — यो मेरो दृढ मत हो।