Chapter 2

Sankhya Yoga

The second chapter of the Bhagavad Gita is "Sankhya Yoga". This is the most important chapter of the Bhagavad Gita as Lord Krishna condenses the teachings of the entire Gita in this chapter. This chapter is the essence of the entire Gita. "Sankhya Yoga" can be categorized into 4 main topics - 1. Arjuna completely surrenders himself to Lord Krishna and accepts his position as a disciple and Krishna as his Guru. He requests Krishna to guide him on how to dismiss his sorrow. 2. Explanation of the main cause of all grief, which is ignorance of the true nature of Self. 3. Karma Yoga - the discipline of selfless action without being attached to its fruits. 4. Description of a Perfect Man - One whose mind is steady and one-pointed.

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Verse 1 सञ्जय उवाच · Sanjaya narrates
Sanskrit

सञ्जय उवाच तं तथा कृपयाऽविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम्। विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः

English

Sanjaya said: To him, who was thus overcome with pity, despondent, with eyes full of tears and agitated, Madhusudana (the destroyer of Madhu) or Krishna spoke these words.

Hindi

संजय ने कहा -- इस प्रकार करुणा और विषाद से अभिभूत,  अश्रुपूरित नेत्रों वाले आकुल अर्जुन से मधुसूदन ने यह वाक्य कहा।।

Nepali

सञ्जयले भने — दया र विषादले व्याकुल, आँखामा आँसु भरिएको र मन उद्विग्न भएको त्यो अर्जुनलाई मधुसूदन श्रीकृष्णले यी वचन भन्नुभयो।

Verse 2 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

श्री भगवानुवाच कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम्। अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन

English

The Blessed Lord said, "From whence has this perilous strait come upon you, this dejection which is unworthy of you, disgraceful, and which will close the gates of heaven upon you, O Arjuna?"

Hindi

श्री भगवान् ने कहा -- हे अर्जुन ! तुमको इस विषम स्थल में यह मोह कहाँ से उत्पन्न हुआ?  यह आर्य आचरण के विपरीत न तो स्वर्ग प्राप्ति का साधन ही है और न कीर्ति कराने वाला ही है।।

Nepali

श्रीभगवान्ले भने — हे अर्जुन! यो असमयमा तिमीलाई यो मोह कहाँबाट आइलाग्यो? यो तिमी जस्तो वीरलाई शोभा दिँदैन; यसले स्वर्गको ढोका बन्द गर्छ र अपकीर्ति ल्याउँछ।

Verse 3 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते। क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप

English

Do not yield to impotence, O Arjuna, son of Pritha. It does not befit you. Cast off this mean weakness of the heart! Stand up, O conqueror of foes!

Hindi

हे पार्थ क्लीव (कायर) मत बनो। यह तुम्हारे लिये अशोभनीय है, हे ! परंतप हृदय की क्षुद्र दुर्बलता को त्यागकर खड़े हो जाओ।।

Nepali

हे पार्थ! नपुंसकता ग्रहण नगर; यो तिमीलाई शोभा दिँदैन। हे शत्रुदमन! मनको यो तुच्छ दुर्बलतालाई त्यागेर खडा होऊ।

bhishma drona
Verse 4 अर्जुन उवाच · Arjuna speaks
Sanskrit

अर्जुन उवाच कथं भीष्ममहं संख्ये द्रोणं च मधुसूदन। इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन

English

Arjuna said, "O Madhusudana, how can I fight in battle with arrows against Bhishma and Drona, who are worthy of being worshipped, O destroyer of enemies?"

Hindi

अर्जुन ने कहा -- हे मधुसूदन ! मैं रणभूमि में किस प्रकार भीष्म और द्रोण के साथ बाणों से युद्ध करूँगा। हे अरिसूदन, वे दोनों ही पूजनीय हैं।।

Nepali

अर्जुनले भने — हे मधुसूदन! हे अरिसूदन! युद्धमा पूज्य भीष्म र द्रोणाचार्यविरुद्ध म कसरी बाणले प्रहार गर्न सक्छु?

Verse 5 अर्जुन उवाच · Arjuna speaks
Sanskrit

गुरूनहत्वा हि महानुभावान् श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके। हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव भुञ्जीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान्

English

Better it is, indeed, in this world to accept alms than to slay the most noble teachers. But if I were to kill them, even in this world, all my enjoyments of wealth and fulfilled desires would be stained with their blood.

Hindi

इन महानुभाव गुरुजनों को मारने से इस लोक में भिक्षा का अन्न भी ग्रहण करना अधिक कल्याण कारक है, क्योंकि गुरुजनों को मारकर मैं इस लोक में रक्तरंजित अर्थ और काम रूप भोगों को ही भोगूँगा।।

Nepali

महानुभाव गुरुहरूलाई मार्नुभन्दा यस संसारमा भिक्षा माग्नु पनि श्रेयस्कर हो; यिनलाई मारे पनि यिनकै रगतले लथपथ अर्थ र कामका भोग मात्र भोग्नु पर्नेछ।

Verse 6 अर्जुन उवाच · Arjuna speaks
Sanskrit

न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः। यानेव हत्वा न जिजीविषाम स्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः

English

I can hardly tell which would be better, that we should conquer them or that they should conquer us. Even the sons of Dhritarashtra, whom we do not wish to slay, stand facing us.

Hindi

हम नहीं जानते कि हमें क्या करना उचित है। हम यह भी नहीं जानते कि हम जीतेंगे, या वे हमको जीतेंगे, जिनको मारकर हम जीवित नहीं रहना चाहते वे ही धृतराष्ट्र के पुत्र हमारे सामने युद्ध के लिए खड़े हैं।।

Nepali

हाम्रा लागि के श्रेयस्कर हो — हामीले उनीहरूलाई जित्नु कि उनीहरूले हामीलाई जित्नु, यो पनि थाहा छैन; जसलाई मारेर हामी जिउन चाहँदैनौँ, ती धृतराष्ट्र-पुत्रहरू नै हाम्रा सामु खडा छन्।

Verse 7 अर्जुन उवाच · Arjuna speaks
Sanskrit

कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसंमूढचेताः। यच्छ्रेयः स्यान्निश्िचतं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्

English

My heart is overpowered by the taint of pity; my mind is confused as to my duty. I ask Thee: Tell me decisively what is good for me. I am Thy disciple; instruct me, who has taken refuge in Thee.

Hindi

करुणा के कलुष से अभिभूत और कर्तव्यपथ पर संभ्रमित हुआ मैं आपसे पूछता हूँ, कि मेरे लिये जो श्रेयष्कर हो, उसे आप निश्चय करके कहिये, क्योंकि मैं आपका शिष्य हूँ; शरण में आये मुझको आप उपदेश दीजिये।।

Nepali

कायरताको दोषले मेरो स्वभाव दबिएको छ, धर्मको विषयमा मेरो बुद्धि भ्रमित छ; मेरा लागि निश्चित रूपमा जे श्रेयस्कर हो, त्यो मलाई भनिदिनुहोस्। म तपाईंको शिष्य हुँ; तपाईंको शरणमा परेको मलाई शिक्षा दिनुहोस्।

Verse 8 अर्जुन उवाच · Arjuna speaks
Sanskrit

न हि प्रपश्यामि ममापनुद्या द्यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम्। अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धम् राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम्

English

I do not see that this sorrow that burns up my senses would be removed, even if I were to attain prosperous and unrivaled dominion on earth or lordship over the gods.

Hindi

पृथ्वी पर निष्कण्टक समृद्ध राज्य को और देवताओं के स्वामित्व को प्राप्त होकर भी मैं उस उपाय को नहीं देखता हूँ, जो मेरी इन्द्रियों को सुखाने वाले इस शोक को दूर कर सके।।

Nepali

पृथ्वीको अप्रतिम र समृद्ध राज्य अनि देवताहरूको स्वामित्व पाए पनि मेरा इन्द्रियहरूलाई जलाउने यो शोक टर्ने जस्तो मलाई देखिँदैन।

Verse 9 सञ्जय उवाच · Sanjaya narrates
Sanskrit

सञ्जय उवाच एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तप। न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह

English

Sanjaya said: Having spoken thus to Hrishikesha, the Lord of the senses, Arjuna, the conqueror of sleep and destroyer of foes, said, "I will not fight," and became silent.

Hindi

संजय ने कहा -- इस प्रकार गुडाकेश परंतप अर्जुन भगवान् हृषीकेश से यह कहकर कि हे गोविन्द "मैं युद्ध नहीं करूँगा" चुप हो गया।।

Nepali

सञ्जयले भने — हे भरतवंशी! हृषीकेश श्रीकृष्णलाई यसो भनेर निद्राजित् शत्रुदमन अर्जुनले 'म युद्ध गर्दिनँ' भनेर मौन भए।

Verse 10 सञ्जय उवाच · Sanjaya narrates
Sanskrit

तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत। सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदन्तमिदं वचः

English

To him who was despondent in the midst of the two armies, Krishna, smiling, O Bharata, spoke these words.

Hindi

हे भारत (धृतराष्ट्र) ! दोनों सेनाओं के बीच में उस शोकमग्न अर्जुन को भगवान् हृषीकेश ने हँसते हुए से यह वचन कहे।।

Nepali

हे भरत! दुवै सेनाको बीचमा विषादग्रस्त अर्जुनलाई हेर्दै, श्रीकृष्णले मुस्कुराउँदै यी वचन भन्नुभयो।

Verse 11 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

श्री भगवानुवाच अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे। गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः

English

The Blessed Lord said, "You have grieved for those who should not be grieved for; yet, you speak words of wisdom. The wise grieve neither for the living nor for the dead."

Hindi

श्री भगवान् ने कहा -- (अशोच्यान्) जिनके लिये शोक करना उचित नहीं है, उनके लिये तुम शोक करते हो और ज्ञानियों के से वचनों को कहते हो, परन्तु ज्ञानी पुरुष मृत (गतासून्) और जीवित (अगतासून्) दोनों के लिये शोक नहीं करते हैं।।

Nepali

श्रीभगवान्ले भने — तिमीले शोक नगर्नुपर्नेहरूका लागि शोक गर्यौ, अनि पण्डितजस्तो कुरा पनि गर्यौ। वास्तविक पण्डितहरू न जीवितका लागि न मृतकका लागि शोक गर्छन्।

Verse 12 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः। न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम्

English

Nor, at any time, was I not, nor thou, nor these rulers of men; nor, verily, shall we ever cease to be hereafter.

Hindi

वास्तव में न तो ऐसा ही है कि मैं किसी काल में नहीं था अथवा तुम नहीं थे अथवा ये राजालोग नहीं थे और न ऐसा ही है कि इससे आगे हम सब नहीं रहेंगे।।

Nepali

वास्तवमा कुनै कालमा न म थिइनँ, न तिमी थियौ, न यी राजाहरू थिएनन्; र भविष्यमा पनि हामी सबै नरहने होइन।

Verse 13 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा। तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति

English

Just as the embodied soul passes through childhood, youth, and old age in this body, so too does it pass into another body; the steadfast one does not grieve over this.

Hindi

जैसे इस देह में देही जीवात्मा की कुमार, युवा और वृद्धावस्था होती है, वैसे ही उसको अन्य शरीर की प्राप्ति होती है;  धीर पुरुष इसमें मोहित नहीं होता है।।

Nepali

जसरी देहधारीले यस शरीरमा बाल्यकाल, युवावस्था र वृद्धावस्था पाउँछ, त्यसरी नै अर्को शरीर पनि प्राप्त गर्छ; धीर पुरुष यसमा मोहित हुँदैन।

Verse 14 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः। आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत

English

The contact of the senses with the objects, O son of Kunti, which causes heat and cold, pleasure and pain, has a beginning and an end; they are impermanent; endure them bravely, O Arjuna.

Hindi

हे कुन्तीपुत्र ! शीत और उष्ण और सुख दुख को देने वाले इन्द्रिय और विषयों के संयोग का प्रारम्भ और अन्त होता है;  वे अनित्य हैं,  इसलिए,  हे भारत ! उनको तुम सहन करो।।

Nepali

हे कुन्तीपुत्र! इन्द्रिय-विषयको संयोगले शीत-उष्ण र सुख-दुःख दिन्छ; यी आउने-जाने अनित्य कुरा हुन्। हे अर्जुन! धैर्यपूर्वक यिनलाई सहनेगर।

Verse 15 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ। समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते

English

That firm man, whom surely these afflictions do not, O chief among men, to whom pleasure and pain are the same, is fit for attaining immortality.

Hindi

हे पुरुषश्रेष्ठ ! दुख और सुख में समान भाव से रहने वाले जिस धीर पुरुष को ये व्यथित नहीं कर सकते हैं वह अमृतत्व (मोक्ष) का अधिकारी होता है।।

Nepali

हे पुरुषश्रेष्ठ! जुन धीर पुरुषलाई यिनले व्यथित गर्न सक्दैनन्, जो सुख-दुःखमा समान रहन्छ, त्यही अमृतत्व पाउने योग्य हुन्छ।

Verse 16 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः। उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः

English

The unreal has no being; there is no non-being of the real; the truth about both has been seen by the knowers of the truth (or the seers of the essence).

Hindi

असत् वस्तु का तो अस्तित्व नहीं है और सत् का कभी अभाव नहीं है। इस प्रकार इन दोनों का ही तत्त्व,  तत्त्वदर्शी ज्ञानी पुरुषों के द्वारा देखा गया है।।

Nepali

असत्को कुनै अस्तित्व छैन र सत्को कुनै अनस्तित्व छैन; तत्त्वदर्शीहरूले यी दुवैको सत्य देखेका छन्।

Verse 17 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम्। विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित् कर्तुमर्हति

English

Know that to be indestructible, by which all this is pervaded. No one can cause the destruction of that, the Imperishable.

Hindi

उस वस्तु को तुम अविनाशी जानों,  जिससे यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है। इस अव्यय का नाश करने में कोई भी समर्थ नहीं है।।

Nepali

जसले यो सम्पूर्ण व्याप्त गरेको छ, त्यसलाई अविनाशी जान। त्यो अव्ययलाई कसैले पनि नष्ट गर्न सक्दैन।

Verse 18 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः। अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत

English

These bodies of the embodied Self, which are eternal, indestructible, and immeasurable, are said to have an end. Therefore, fight, O Arjuna.

Hindi

इस नाशरहित अप्रमेय नित्य देही आत्मा के ये सब शरीर नाशवान् कहे गये हैं। इसलिये हे भारत ! तुम युद्ध करो।।

Nepali

नित्य, अविनाशी र अमेय आत्माका यी देहहरू अन्त हुने भनिएका छन्। त्यसैले हे अर्जुन! युद्ध गर।

Verse 19 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम्। उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते

English

He who takes the Self to be the slayer and he who thinks it is slain, neither of them knows. It does not slay, nor is it slain.

Hindi

जो इस आत्मा को मारने वाला समझता है और जो इसको मरा समझता है वे दोनों ही नहीं जानते हैं,  क्योंकि यह आत्मा न मरता है और न मारा जाता है।।

Nepali

जो आत्मालाई मार्ने ठान्छ र जो आत्मा मरिन्छ भन्ने ठान्छ — यी दुवै अज्ञानी हुन्। आत्मा न मार्छ, न मरिन्छ।

Verse 20 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

न जायते म्रियते वा कदाचि न्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः। अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे

English

It is not born, nor does it ever die; after having been, it again does not cease to be; unborn, eternal, changeless, and ancient, it is not killed when the body is killed.

Hindi

यह आत्मा किसी काल में भी न जन्मता है और न मरता है और न यह एक बार होकर फिर अभावरूप होने वाला है। यह आत्मा अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है,  शरीर के नाश होने पर भी इसका नाश नहीं होता।।

Nepali

आत्मा न जन्मिन्छ न मर्छ; एक पटक भएर पुन: नहुने होइन; यो अजन्मा, नित्य, शाश्वत, पुरातन छ — शरीर मारिँदा पनि आत्मा मारिँदैन।

Verse 21 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम्। कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम्

English

Whoever knows it to be indestructible, eternal, unborn, and inexhaustible, how can that person slay, O Arjuna, or cause to be slain?

Hindi

हे पार्थ ! जो पुरुष इस आत्मा को अविनाशी,  नित्य और अव्ययस्वरूप जानता है,  वह कैसे किसको मरवायेगा और कैसे किसको मारेगा?

Nepali

हे पार्थ! जसले आत्मालाई अविनाशी, नित्य, अजन्मा र अव्यय जानेको छ, त्यो पुरुष कसैलाई कसरी मार्न लगाउँछ र कसरी मार्छ?

Verse 22 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि। तथा शरीराणि विहाय जीर्णा न्यन्यानि संयाति नवानि देही

English

Just as a man casts off worn-out clothes and puts on new ones, so too the embodied Self casts off worn-out bodies and enters others that are new.

Hindi

जैसे मनुष्य जीर्ण वस्त्रों को त्यागकर दूसरे नये वस्त्रों को धारण करता है, वैसे ही देही जीवात्मा पुराने शरीरों को त्याग कर दूसरे नए शरीरों को प्राप्त होता है।।

Nepali

जसरी मानिसले पुराना वस्त्र त्यागेर नयाँ वस्त्र लगाउँछ, त्यसरी नै देहधारी आत्माले जीर्ण शरीर त्यागेर नयाँ शरीरमा प्रवेश गर्छ।

Verse 23 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः। न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः

English

Weapons cannot cut it, fire cannot burn it, water cannot wet it, wind cannot dry it.

Hindi

इस आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकते और न अग्नि इसे जला सकती है ; जल इसे गीला नहीं कर सकता और वायु इसे सुखा नहीं सकती।।

Nepali

आत्मालाई शस्त्रले काट्न सकिँदैन, आगोले डढाउन सकिँदैन, पानीले भिजाउन सकिँदैन, र हावाले सुकाउन सकिँदैन।

Verse 24 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च। नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः

English

This Self cannot be cut, burned, wetted, nor dried up; it is eternal, all-pervasive, stable, immovable, and ancient.

Hindi

क्योंकि यह आत्मा अच्छेद्य (काटी नहीं जा सकती),  अदाह्य (जलाई नहीं जा सकती),  अक्लेद्य (गीली नहीं हो सकती ) और अशोष्य (सुखाई नहीं जा सकती) है;  यह नित्य,  सर्वगत,  स्थाणु (स्थिर),  अचल और सनातन है।।

Nepali

आत्मा अच्छेद्य, अदाह्य, अक्लेद्य र अशोष्य छ; नित्य, सर्वव्यापी, स्थिर, अचल र सनातन छ।

Verse 25 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते। तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि

English

This Self is said to be unmanifested, unthinkable, and unchangeable. Therefore, knowing this to be so, you should not grieve.

Hindi

यह आत्मा अव्यक्त,  अचिन्त्य और अविकारी कहा जाता है;  इसलिए इसको इस प्रकार जानकर तुमको शोक करना उचित नहीं है।।

Nepali

आत्मा अव्यक्त, अचिन्त्य र अविकारी भनिएको छ; त्यसैले यो थाहा पाएर तिमीले शोक गर्नु हुँदैन।

Verse 26 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम्। तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि

English

But even if thou thinkest of It as constantly being born and constantly dying, even then, O mighty-armed one, thou shouldst not grieve.

Hindi

और यदि तुम आत्मा को नित्य जन्मने और नित्य मरने वाला मानो तो भी,  हे महाबाहो !  इस प्रकार शोक करना तुम्हारे लिए उचित नहीं है।।

Nepali

र हे महाबाहु! यदि तिमीले यसलाई बारम्बार जन्मने र मर्ने नै ठान्यौ भने पनि यसरी शोक गर्नु तिमीलाई शोभा दिँदैन।

Verse 27 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च। तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि

English

For the born, death is certain, and for the dead, birth is certain; therefore, you should not grieve over the inevitable.

Hindi

जन्मने वाले की मृत्यु निश्चित है और मरने वाले का जन्म निश्चित है;  इसलिए जो अटल है अपरिहार्य - है उसके विषय में तुमको शोक नहीं करना चाहिये।।

Nepali

जन्मने को मृत्यु निश्चित छ र मर्नेको पुनर्जन्म निश्चित छ; त्यसैले यो अपरिहार्य कुरामा शोक गर्नु तिमीलाई शोभा दिँदैन।

Verse 28 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत। अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना

English

Beings are unmanifest in their beginning, manifest in their middle state, O Arjuna, and unmanifest again in their end. What is there to grieve about?

Hindi

हे भारत ! समस्त प्राणी जन्म से पूर्व और मृत्यु के बाद अव्यक्त अवस्था में रहते हैं और बीच में व्यक्त होते हैं। फिर उसमें चिन्ता या शोक की क्या बात है ?

Nepali

हे अर्जुन! प्राणीहरू सुरुमा अव्यक्त हुन्छन्, बीचमा व्यक्त हुन्छन् र अन्तमा फेरि अव्यक्त हुन्छन्; यसमा शोक गर्नुपर्ने के छ?

Verse 29 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेन माश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः। आश्चर्यवच्चैनमन्यः श्रृणोति श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित्

English

One sees this (the Self) as a wonder; another speaks of it as a wonder; another hears of it as a wonder; yet, having heard, none understands it at all.

Hindi

कोई इसे आश्चर्य के समान देखता है;  कोई इसके विषय में आश्चर्य के समान कहता है;  और कोई अन्य पुरुष इसे आश्चर्य के समान सुनता है;  और फिर कोई सुनकर भी नहीं जानता।।

Nepali

कसैले यो आत्मालाई आश्चर्यरूप देख्छ, कसैले आश्चर्यरूप वर्णन गर्छ, कसैले आश्चर्यरूप सुन्छ; तर सुनेर पनि कसैले यसलाई पूर्णतः बुझ्दैनन्।

Verse 30 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत। तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि

English

This indweller in the body of everyone is ever indestructible, O Arjuna; therefore, you should not grieve for any creature.

Hindi

हे भारत ! यह देही आत्मा सबके शरीर में सदा ही अवध्य है, इसलिए समस्त प्राणियों के लिए तुम्हें शोक करना उचित नहीं।।

Nepali

हे अर्जुन! सबै प्राणीको देहमा रहेको यो आत्मा सदा अवध्य छ; त्यसैले कुनै पनि प्राणीका लागि तिमीले शोक गर्नु हुँदैन।

Verse 31 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि। धर्म्याद्धि युद्धाछ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते

English

Further, having regard to your duty, you should not waver, for there is nothing higher for a Kshatriya than a righteous war.

Hindi

और स्वधर्म को भी देखकर तुमको विचलित होना उचित नहीं है,  क्योंकि धर्मयुक्त युद्ध से बढ़कर दूसरा कोई कल्याणकारक कर्त्तव्य क्षत्रिय के लिये नहीं है।।

Nepali

आफ्नो स्वधर्म हेरेर पनि तिमीलाई विचलित हुनु हुँदैन; क्षत्रियका लागि धर्मयुद्धभन्दा बढी कल्याणकारी अरू केही छैन।

Verse 32 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम्। सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम्

English

Happy are the Kshatriyas, O Arjuna! who are called to fight in such a battle that comes of its own accord as an open door to heaven.

Hindi

और हे पार्थ ! अपने आप प्राप्त हुए और स्वर्ग के लिए खुले हुए द्वाररूप इस प्रकार के युद्ध को भाग्यवान क्षत्रिय लोग ही पाते हैं।।

Nepali

हे पार्थ! स्वतः खुलेर आएको स्वर्गको ढोका जस्तै युद्ध त भाग्यमानी क्षत्रियहरूलाई मात्र मिल्छ।

Verse 33 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

अथ चैत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि। ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि

English

But if you will not fight this righteous war, then having abandoned your own duty and reputation, you will incur sin.

Hindi

और यदि तुम इस धर्मयुद्ध को स्वीकार नहीं करोगे,  तो स्वधर्म और कीर्ति को खोकर पाप को प्राप्त करोगे।।

Nepali

यदि तिमीले यो धर्मयुद्ध गर्दैनौ भने स्वधर्म र किर्ति दुवै त्यागेर पाप ग्रहण गर्नेछौ।

Verse 34 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम्। संभावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते

English

People will also recount your everlasting dishonor; and for one who has been honored, dishonor is worse than death.

Hindi

और सब लोग तुम्हारी बहुत काल तक रहने वाली अपकीर्ति को भी कहते रहेंगे;  और सम्मानित पुरुष के लिए अपकीर्ति मरण से भी अधिक होती है।।

Nepali

र मानिसहरूले तिम्रो अपकीर्ति युगौँसम्म गाउनेछन्; सम्मानित पुरुषका लागि अपकीर्ति मृत्युभन्दा बढी पीडादायी हुन्छ।

Verse 35 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः। येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम्

English

The great chariot-warriors will think that you have withdrawn from the battle out of fear, and you will be held in low esteem by those who have held you in high regard.

Hindi

और जिनके लिए तुम बहुत माननीय हो उनके लिए अब तुम तुच्छता को प्राप्त होओगे,  वे महारथी लोग तुम्हें भय के कारण युद्ध से निवृत्त हुआ मानेंगे।।

Nepali

तिमीले डरले युद्धबाट हट्यौ भनेर महारथीहरूले सम्झनेछन्; जसका दृष्टिमा तिमी आदरणीय थियौ, उनैको दृष्टिमा तिमी तुच्छ ठहरिनेछौ।

Verse 36 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

अवाच्यवादांश्च बहून् वदिष्यन्ति तवाहिताः। निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम्

English

Your enemies, scoffing at your power, will speak many abusive words—what could be more painful than this?

Hindi

तुम्हारे शत्रु तुम्हारे सार्मथ्य की निन्दा करते हुए बहुत से अकथनीय वचनों को कहेंगे,  फिर उससे अधिक दु:ख क्या होगा ?

Nepali

तिम्रा शत्रुहरूले तिम्रो सामर्थ्यको खिल्ली उडाउँदै धेरै अनुचित कुरा भन्नेछन्; त्योभन्दा बढी पीडा अर्को के हुन सक्छ?

Verse 37 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्। तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः

English

Slain, you will obtain heaven; victorious, you will enjoy the earth; therefore, stand up, O son of Kunti, resolved to fight.

Hindi

युद्ध में मरकर तुम स्वर्ग प्राप्त करोगे या जीतकर पृथ्वी को भोगोगे;  इसलिय, हे कौन्तेय ! युद्ध का निश्चय कर तुम खड़े हो जाओ।।

Nepali

मारिए स्वर्ग पाउनेछौ, जिते पृथ्वीको भोग गर्नेछौ; त्यसैले हे कौन्तेय! युद्धका लागि कटिबद्ध भएर खडा होऊ।

Verse 38 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ। ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि

English

Having made pleasure and pain, gain and loss, victory and defeat equal, engage in battle for the sake of battle; thus, you shall not incur sin.

Hindi

सुख-दु:ख,  लाभ-हानि और जय-पराजय को समान करके युद्ध के लिये तैयार हो जाओ;  इस प्रकार तुमको पाप नहीं होगा।।

Nepali

सुख-दुःख, लाभ-हानि र जय-पराजयलाई समान ठानेर युद्धका लागि युद्धमा लाग; यसरी तिमीलाई पाप लाग्ने छैन।

Verse 39 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

एषा तेऽभिहिता सांख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां श्रृणु। बुद्ध्यायुक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि

English

This, which has been taught to you, is wisdom concerning Sankhya. Now listen to wisdom concerning Yoga, endowed with which, O Arjuna, you shall cast off the bonds of action.

Hindi

हे पार्थ ! तुम्हें सांख्य विषयक ज्ञान कहा गया और अब इस (कर्म) योग से सम्बन्धित ज्ञान को सुनो जिस ज्ञान से युक्त होकर तुम कर्मबन्ध का नाश कर सकोगे।।

Nepali

यो बुद्धि साङ्ख्यसम्बन्धी हो; अब योगसम्बन्धी बुद्धि सुन — जुन प्राप्त गरेपछि हे पार्थ! तिमी कर्मका बन्धनलाई त्याग्न सक्नेछौ।

Verse 40 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते। स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्

English

In this, there is no loss of effort, nor is there any harm produced, nor any transgression. Even a little of this knowledge protects one from great fear.

Hindi

इसमें क्रमनाश और प्रत्यवाय दोष नहीं है। इस धर्म (योग) का अल्प अभ्यास भी महान् भय से रक्षण करता है।।

Nepali

यसमा प्रयासको कुनै नाश हुँदैन, कुनै दोष पनि लाग्दैन; यो धर्मको थोरै आचरणले पनि ठूलो भयबाट रक्षा गर्छ।

Verse 41 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन। बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम्

English

Here, O joy of the Kurus, there is only one single-pointed determination; many-branched and endless are the thoughts of the indecisive.

Hindi

हे कुरुनन्दन ! इस (विषय) में निश्चयात्मक बुद्धि एक ही है, अज्ञानी पुरुषों की बुद्धियां (संकल्प) बहुत भेदों वाली और अनन्त होती हैं।।

Nepali

हे कुरुनन्दन! यस मार्गमा निश्चयात्मक बुद्धि एउटै हुन्छ; अनिश्चित मानिसहरूको बुद्धि बहुशाखी र अनन्त हुन्छ।

Verse 42 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः। वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः

English

The unwise, taking pleasure in the eulogizing words of the Vedas, utter flowery speech, saying, "There is nothing else," O Arjuna.

Hindi

हे पार्थ अविवेकी पुरुष वेदवाद में रमते हुये जो यह पुष्पिता (दिखावटी शोभा की) वाणी बोलते हैं? इससे (स्वर्ग से) बढ़कर और कुछ नहीं है।।।

Nepali

हे पार्थ! वेदका सुन्दर वचनहरूमा रमाउने अल्पबुद्धिहरूले 'यसभन्दा अरू केही छैन' भन्ने पुष्पित वाणी बोल्छन्।

Verse 43 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम्। क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति

English

Full of desires, with heaven as their goal, (they speak words that are directed to ends) leading to new births as the result of their works, and prescribe various methods abounding in specific actions, for the attainment of pleasure and power.

Hindi

कामनाओं से युक्त? स्वर्ग को ही श्रेष्ठ मानने वाले लोग भोग और ऐश्वर्य को प्राप्त कराने वाली अनेक क्रियाओं को बताते हैं जो (वास्तव में) जन्मरूप कर्मफल को देने वाली होती हैं।।

Nepali

ती कामनायुक्त, स्वर्गलक्ष्यी हुन्छन्; जन्म, कर्म र फलमा रमाएर भोग र ऐश्वर्यका लागि नाना प्रकारका क्रियाहरू बताउँछन्।

Verse 44 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम्। व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते

English

For those who are attached to pleasure and power, whose minds are drawn away by such teachings, their determinate reason is not formed which is steadily bent on meditation and Samadhi (superconscious state).

Hindi

उससे जिनका चित्त हर लिया गया है ऐसे भोग और एश्र्वर्य‌ मॆ आसक्ति रखने वाले पुरुषों के अन्तकरण मे निश्चयात्मक् बुद्धि नही हॊती अर्थात वे ध्यान का अभ्यास करने योग्य‌ नही होते।

Nepali

भोग र ऐश्वर्यमा आसक्त, तिनै वचनले हरिएको चित्तका मानिसहरूको समाधिमा स्थिर हुने निश्चयात्मक बुद्धि बन्दैन।

Verse 45 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन। निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्

English

The Vedas deal with the three attributes; be thou above these three attributes. O Arjuna, free yourself from the pairs of opposites and ever remain in the quality of Sattva, freed from acquisition and preservation, and be established in the Self.

Hindi

हे अर्जुन वेदों का विषय तीन गुणों से सम्बन्धित (संसार से) है तुम त्रिगुणातीत? निर्द्वन्द्व? नित्य सत्त्व (शुद्धता) में स्थित? योगक्षेम से रहित और आत्मवान् बनो।।

Nepali

वेदहरू त्रिगुणात्मक विषयका हुन्। हे अर्जुन! तिमी त्रिगुणातीत होऊ, द्वन्द्वबाट मुक्त होऊ, नित्य सत्त्वमा स्थित होऊ, योगक्षेमको चिन्ता नगरी आत्मामा प्रतिष्ठित होऊ।

Verse 46 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

यावानर्थ उदपाने सर्वतः संप्लुतोदके। तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः

English

To the Brahmana who has known the Self, all the Vedas are of as much use as a reservoir of water would be in a place where there is a flood.

Hindi

सब ओर से परिपूर्ण जलराशि के होने पर मनुष्य का छोटे जलाशय में जितना प्रयोजन रहता है? आत्मज्ञानी ब्राह्मण का सभी वेदों में उतना ही प्रयोजन रहता है।।

Nepali

जलप्लावन भएको ठाउँमा सानो कुवाको जति प्रयोजन हुन्छ, ब्रह्म-जान्ने ब्राह्मणका लागि सम्पूर्ण वेदको त्यति नै प्रयोजन हुन्छ।

Verse 47 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि

English

Your right is only to work, but not to its results; do not let the results of action be your motive, nor let your attachment be to inaction.

Hindi

कर्म करने मात्र में तुम्हारा अधिकार है? फल में कभी नहीं। तुम कर्मफल के हेतु वाले मत होना और अकर्म में भी तुम्हारी आसक्ति न हो।।

Nepali

तिम्रो अधिकार कर्म गर्नेमा मात्र छ, त्यसको फलमा होइन। कर्मफलको कारण नबन, र अकर्मणतामा पनि आसक्ति नराख।

Verse 48 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय। सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते

English

Perform action, O Arjuna, being steadfast in Yoga, abandoning attachment and balanced in success and failure; evenness of mind is called Yoga.

Hindi

हे धनंजय आसक्ति को त्याग कर तथा सिद्धि और असिद्धि में समभाव होकर योग में स्थित हुये तुम कर्म करो। यह समभाव ही योग कहलाता है।।

Nepali

हे धनञ्जय! आसक्तिलाई त्यागेर, सिद्धि र असिद्धिमा समान भएर योगमा स्थित रहेर कर्म गर; यो समत्व नै योग कहलिन्छ।

Verse 49 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनञ्जय। बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः

English

Far lower than the Yoga of wisdom is action, O Arjuna. Seek thou refuge in wisdom; wretched are those whose motive is the fruit.

Hindi

इस बुद्धियोग की तुलना में(सकाम) कर्म अत्यन्त निकृष्ट हैं? इसलिये हे धनंजय तुम बद्धि की शरण लो फल की इच्छा करनेवाले कृपण (दीन) हैं।।

Nepali

हे धनञ्जय! बुद्धियोगभन्दा सकाम कर्म धेरै कनिष्ठ छ; बुद्धिमा शरण लेऊ; फलको कामना गर्नेहरू कृपण हुन्।

Verse 50 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते। तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्

English

Endowed with wisdom and evenness of mind, one casts off in this life both good and evil deeds; therefore, devote yourself to Yoga; Yoga is skill in action.

Hindi

समत्वबुद्धि युक्त पुरुष यहां (इस जीवन में) पुण्य और पाप इन दोनों कर्मों को त्याग देता है? इसलिये तुम योग से युक्त हो जाओ। कर्मों में कुशलता योग है।।

Nepali

बुद्धियुक्त पुरुषले यहीँ नै सुकर्म र दुष्कर्म दुवैलाई त्याग्छ; त्यसैले योगमा लाग; योग कर्ममा कुशलता हो।

Verse 51 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः। जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम्

English

The wise, possessing knowledge, having abandoned the fruits of their actions, and being freed from the bonds of birth, go to the place which is beyond all evil.

Hindi

बुद्धियोग युक्त मनीषी लोग कर्मजन्य फलों को त्यागकर जन्मरूप बन्धन से मुक्त हुये अनामय अर्थात् निर्दोष पद को प्राप्त होते हैं।।

Nepali

बुद्धियुक्त ज्ञानीहरू कर्मफलको त्याग गरेर जन्मरूपी बन्धनबाट मुक्त भएर निर्विकार पदमा पुग्छन्।

Verse 52 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति। तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च

English

When your intellect passes beyond the mire of delusion, then you will attain indifference to what has been heard and what has yet to be heard.

Hindi

जब तुम्हारी बुद्धि मोहरूप दलदल (कलिल) को तर जायेगी तब तुम उन सब वस्तुओं से निर्वेद (वैराग्य) को प्राप्त हो जाओगे? जो सुनने योग्य और सुनी हुई हैं।।

Nepali

जब तिम्रो बुद्धि मोहरूपी दलदलबाट पार हुनेछ, तब सुनेका र सुन्नेबाँकी सबै विषयमा तिमीलाई वैराग्य उत्पन्न हुनेछ।

Verse 53 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला। समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि

English

When your intellect, which is perplexed by the Vedic texts you have read, stands immovable and steady in the Self, then you will attain Self-realization.

Hindi

जब अनेक प्रकार के विषयों को सुनने से विचलित हुई तुम्हारी बुद्धि आत्मस्वरूप में अचल और स्थिर हो जायेगी तब तुम (परमार्थ) योग को प्राप्त करोगे।।

Nepali

नानाविध श्रुतिले विचलित तिम्रो बुद्धि समाधिमा अचल र स्थिर भएपछि तिमी योग प्राप्त गर्नेछौ।

Verse 54 अर्जुन उवाच · Arjuna speaks
Sanskrit

अर्जुन उवाच स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव। स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम्

English

Arjuna said, "O Krishna, what is the description of one who has steady wisdom and is merged in the superconscious state? How does one of steady wisdom speak, how do they sit, and how do they walk?"

Hindi

अर्जुन ने कहा -- हे केशव समाधि में स्थित स्थिर बुद्धि वाले पुरुष का क्या लक्षण है स्थिर बुद्धि पुरुष कैसे बोलता है कैसे बैठता है कैसे चलता है

Nepali

अर्जुनले भने — हे केशव! समाधिस्थ स्थितप्रज्ञ पुरुषको लक्षण के हो? त्यो स्थितप्रज्ञ कसरी बोल्छ, कसरी बस्छ र कसरी हिँड्छ?

Verse 55 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

श्री भगवानुवाच प्रजहाति यदा कामान् सर्वान् पार्थ मनोगतान्। आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते

English

The Blessed Lord said, "When a man completely casts off, O Arjuna, all the desires of the mind and is satisfied in the Self by the Self, then he is said to be one of steady wisdom."

Hindi

श्री भगवान् ने कहा -- हे पार्थ? जिस समय पुरुष मन में स्थित सब कामनाओं को त्याग देता है और आत्मा से ही आत्मा में सन्तुष्ट रहता है? उस समय वह स्थितप्रज्ञ कहलाता है।।

Nepali

श्रीभगवान्ले भने — हे पार्थ! जब मानिसले मनमा रहेका सम्पूर्ण कामनालाई त्याग्छ र आत्मामा नै आत्मासँग सन्तुष्ट हुन्छ, तब त्यो स्थितप्रज्ञ कहलिन्छ।

Verse 56 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः। वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते

English

He whose mind is not shaken by adversity, who does not long for pleasures, and is free from attachment, fear, and anger, is called a sage of steady wisdom.

Hindi

दुख में जिसका मन उद्विग्न नहीं होता सुख में जिसकी स्पृहा निवृत्त हो गयी है? जिसके मन से राग? भय और क्रोध नष्ट हो गये हैं? वह मुनि स्थितप्रज्ञ कहलाता है।।

Nepali

दुःखमा अनुद्विग्न, सुखमा निःस्पृह, रागद्वेष र क्रोधबाट मुक्त मुनिलाई स्थितप्रज्ञ भनिन्छ।

Verse 57 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम्। नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता

English

He who is everywhere without attachment, upon encountering anything good or bad, neither rejoices nor hastens; his wisdom is firm.

Hindi

जो सर्वत्र अति स्नेह से रहित हुआ उन शुभ तथा अशुभ वस्तुओं को प्राप्त कर न प्रसन्न होता है और न द्वेष करता है? उसकी प्रज्ञा प्रतिष्ठित (स्थिर) है।।

Nepali

जो सबै ठाउँमा अनासक्त छ, शुभ-अशुभ पाएर न हर्षित हुन्छ न द्वेष गर्छ — त्यसको प्रज्ञा स्थिर हुन्छ।

Verse 58 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः। इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता

English

When, like the tortoise which withdraws all its limbs on all sides, he withdraws his senses from the sense-objects, then his wisdom becomes steady.

Hindi

कछुवा अपने अंगों को जैसे समेट लेता है वैसे ही यह पुरुष जब सब ओर से अपनी इन्द्रियों को इन्द्रियों के विषयों से परावृत्त कर लेता है? तब उसकी बुद्धि स्थिर होती है।।

Nepali

जसरी कछुवाले आफ्ना सबै अङ्ग समेट्छ, त्यसरी नै इन्द्रियहरूलाई विषयबाट समेटेर राख्ने पुरुषको प्रज्ञा स्थिर हुन्छ।

Verse 59 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः। रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते

English

The objects of the senses turn away from the abstinent man, leaving the longing behind; but his longing also turns away upon seeing the Supreme.

Hindi

निराहारी देही पुरुष से विषय तो निवृत्त (दूर) हो जाते हैं? परन्तु (उनके प्रति) राग नहीं परम तत्व को देखने पर इस (पुरुष) का राग भी निवृत्त हो जाता है।।

Nepali

इन्द्रिय-निग्रही पुरुषका विषयहरू त मात्र फर्किन्छन्, स्वाद बाँकी रहन्छ; तर परम तत्त्व देखेपछि त्यो स्वाद पनि निवृत्त हुन्छ।

Verse 60 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः। इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः

English

The turbulent senses, O Arjuna, can violently carry away the mind of a wise person, even though they are striving to control them.

Hindi

हे कौन्तेय (संयम का) प्रयत्न करते हुए बुद्धिमान (विपश्चित) पुरुष के भी मन को ये इन्द्रियां बलपूर्वक हर लेती हैं।।

Nepali

हे कौन्तेय! साधना गरिरहेका विवेकी पुरुषको मनलाई पनि यी क्षोभकारी इन्द्रियहरू बलजफ्ती हरिलैजान्छन्।

Verse 61 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः। वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता

English

Having restrained them all, he should sit steadfast, intent on Me; his wisdom is steady whose senses are under control.

Hindi

उन सब इन्द्रियों को संयमित कर युक्त और मत्पर होवे। जिस पुरुष की इन्द्रियां वश में होती हैं? उसकी प्रज्ञा प्रतिष्ठित होती है।।

Nepali

ती सबै इन्द्रियहरूलाई संयममा राखेर मलाई परम लक्ष्य मानेर एकाग्र भएर बस्नुपर्छ; जसले इन्द्रिय वशमा राख्छ, त्यसकै प्रज्ञा स्थिर हुन्छ।

Verse 62 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते। सङ्गात् संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते

English

When one thinks of objects, attachment to them arises; from attachment, desire is born; from desire, anger arises.

Hindi

विषयों का चिन्तन करने वाले पुरुष की उसमें आसक्ति हो जाती है? आसक्ति से इच्छा और इच्छा से क्रोध उत्पन्न होता है।।

Nepali

विषय-चिन्तन गर्ने पुरुषलाई तिनमा आसक्ति उत्पन्न हुन्छ, आसक्तिबाट कामना, कामनाबाट क्रोध उत्पन्न हुन्छ।

Verse 63 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः। स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति

English

Anger leads to delusion, which causes loss of memory; this, in turn, leads to the destruction of discrimination, resulting in destruction.

Hindi

क्रोध से उत्पन्न होता है मोह और मोह से स्मृति विभ्रम। स्मृति के भ्रमित होने पर बुद्धि का नाश होता है और बुद्धि के नाश होने से वह मनुष्य नष्ट हो जाता है।।

Nepali

क्रोधबाट मोह, मोहबाट स्मृति-भ्रंश, स्मृति-भ्रंशबाट बुद्धिनाश हुन्छ; बुद्धिनाश भएपछि मानिस सर्वनाश हुन्छ।

Verse 64 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन्। आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति

English

But the self-controlled man, moving among objects with the senses restrained and free from attraction and repulsion, attains peace.

Hindi

आत्मसंयमी (विधेयात्मा) पुरुष रागद्वेष से रहित अपने वश में की हुई (आत्मवश्यै) इन्द्रियों द्वारा विषयों को भोगता हुआ प्रसन्नता (प्रस्ेााद) प्राप्त करता है।।

Nepali

तर रागद्वेषबाट मुक्त, इन्द्रियलाई आत्मवश्यतामा राखेर विषयमा विचरण गर्ने जितेन्द्रिय पुरुष शान्ति प्राप्त गर्छ।

Verse 65 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते। प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते

English

In that peace, all pains are destroyed; for the intellect of the tranquil-minded soon becomes steady.

Hindi

प्रसाद के होने पर सम्पूर्ण दुखों का अन्त हो जाता है और प्रसन्नचित्त पुरुष की बुद्धि ही शीघ्र ही स्थिर हो जाती है।।

Nepali

शान्ति प्राप्त भएपछि सम्पूर्ण दुःख नाश हुन्छन्; प्रसन्नचित्त मानिसको बुद्धि चाँडै नै स्थिर हुन्छ।

Verse 66 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना। न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम्

English

There is no knowledge of the Self for the unsteady, and no meditation is possible for the unsteady, and no peace for the unmeditative, and how can there be happiness for one who has no peace?

Hindi

(संयमरहित) अयुक्त पुरुष को (आत्म) ज्ञान नहीं होता और अयुक्त को भावना और ध्यान की क्षमता नहीं होती भावना रहित पुरुष को शान्ति नहीं मिलती अशान्त पुरुष को सुख कहाँ

Nepali

अयुक्त पुरुषलाई न बुद्धि हुन्छ न भावना; भावनारहितलाई शान्ति हुँदैन, र अशान्तलाई सुख कसरी हुन्छ?

Verse 67 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते। तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि

English

For the mind, which follows in the wake of the wandering senses, carries away his discrimination, as the wind carries away a boat on the waters.

Hindi

जल में वायु जैसे नाव को हर लेता है वैसे ही विषयों में विरचती हुई इन्द्रियों के बीच में जिस इन्द्रिय का अनुकरण मन करता है? वह एक ही इन्द्रिय इसकी प्रज्ञा को हर लेती है।।

Nepali

भट्किरहेका इन्द्रियमध्ये कुनै एउटाले पनि मनलाई आफूतिर तानेमा त्यसले प्रज्ञा हरिलैजान्छ — जसरी पानीमा हावाले डुङ्गालाई बगाइदिन्छ।

Verse 68 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः। इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता

English

Therefore, O mighty-armed Arjuna, his knowledge is steady whose senses are completely restrained from sense objects.

Hindi

इसलिये? हे महाबाहो जिस पुरुष की इन्द्रियाँ सब प्रकार इन्द्रियों के विषयों के वश में की हुई होती हैं? उसकी बुद्धि स्थिर होती है।।

Nepali

त्यसैले हे महाबाहु! जसका इन्द्रियहरू पूर्ण रूपले विषयबाट समेटिएका छन्, त्यसैको प्रज्ञा स्थिर हुन्छ।

Verse 69 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी। यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः

English

That which is night to all beings, in that the self-controlled man is awake; when all beings are awake, that is night for the sage who sees.

Hindi

सब प्रणियों के लिए जो रात्रि है? उसमें संयमी पुरुष जागता है और जहाँ सब प्राणी जागते हैं? वह (तत्त्व को) देखने वाले मुनि के लिए रात्रि है।।

Nepali

जो सबै प्राणीका लागि रात हो, त्यसमा संयमी जागिरहन्छ; जसमा सबै प्राणी जागृत हुन्छन्, त्यो मुनिको आँखामा रात हो।

Verse 70 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्। तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी

English

He attains peace into whom all desires enter, just as waters enter the ocean which, filled from all sides, remains unmoved; but not the man who is full of desires.

Hindi

जैसे सब ओर से परिपूर्ण अचल प्रतिष्ठा वाले समुद्र में (अनेक नदियों के) जल (उसे विचलित किये बिना) समा जाते हैं? वैसे ही जिस पुरुष के प्रति कामनाओं के विषय उसमें (विकार उत्पन्न किये बिना) समा जाते हैं? वह पुरुष शान्ति प्राप्त करता है? न कि भोगों की कामना करने वाला पुरुष।।

Nepali

जसरी सबैतिरबाट भरिए पनि समुद्र स्थिर रहन्छ, त्यसरी सम्पूर्ण कामना भित्र प्रवेश भए पनि स्थिर रहने पुरुषले शान्ति प्राप्त गर्छ — कामनाहीन त्यो शान्ति कामीले पाउँदैन।

Verse 71 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः। निर्ममो निरहंकारः स शांतिमधिगच्छति

English

That person attains peace who, abandoning all desires, moves about without longing, without the sense of ownership, and without egoism.

Hindi

जो पुरुष सब कामनाओं को त्यागकर स्पृहारहित? ममभाव रहित और निरहंकार हुआ विचरण करता है? वह शान्ति प्राप्त करता है।।

Nepali

जो सबै कामना त्यागेर ममता, अहङ्कार र स्पृहारहित भएर विचरण गर्छ, त्यसैले शान्ति प्राप्त गर्छ।

Verse 72 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति। स्थित्वाऽस्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति

English

O son of Pritha, this is the eternal state, the Brahmic seat. Attaining this, one is not deluded. Being established in it, one attains oneness with Brahman even at the end of life.

Hindi

हे पार्थ यह ब्राह्मी स्थिति है। इसे प्राप्त कर पुरुष मोहित नहीं होता। अन्तकाल में भी इस निष्ठा में स्थित होकर ब्रह्मनिर्वाण (ब्रह्म के साथ एकत्व) को प्राप्त होता है।।

Nepali

हे पार्थ! यो ब्राह्मी स्थिति हो; यसलाई पाएपछि मानिस मोहित हुँदैन। अन्तकालमा पनि यसमा स्थित भए ब्रह्मनिर्वाण प्राप्त गर्छ।