अध्याय 6

ध्यानयोग

भगवद गीता का छठा अध्याय ध्यान योग है। इस अध्याय में कृष्ण बताते हैं कि हम किस प्रकार ध्यान योग का अभ्यास कर सकते हैं। वे ध्यान की तैयारी में कर्म की भूमिका पर चर्चा करते हैं अथवा बताते हैं कि किस प्रकार भक्ति में किया गए कर्म मनुष्ये के मन को शुद्ध करते हैं और उसकी आध्यात्मिक चेतना की वृद्धि में सहायता करते हैं। वे उन बाधाओं का विस्तारपूर्वक वर्णन करते हैं जो कि मनुष्य को अपने दिमाग को नियंत्रित करते समय झेलनी पड़ती हैं अथवा उन सटीक तरीकों का वर्णन करते हैं जिनसे एक मनुष्य अपने दिमाग को जीत सकता है। उन्होंने प्रकट किया की हम किस प्रकार परमात्मा पर अपना ध्यान केंद्रित करके भगवान के साथ एक हो सकते हैं।

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श्लोक 1 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

श्री भगवानुवाच अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः। स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः

अंग्रेज़ी

The Blessed Lord said: He who performs his bounden duty without depending on the fruits of his actions—he is a sannyasi and a yogi, not he who is without fire and without action.

हिन्दी

श्रीभगवान् ने कहा -- जो पुरुष कर्मफल पर आश्रित न होकर कर्तव्य कर्म करता है, वह संन्यासी और योगी है, न कि वह जिसने केवल अग्नि का और क्रियायों का त्याग किया है।।

नेपाली

श्रीभगवान्ले भने — कर्मफलमा निर्भर नभई कर्तव्य-कर्म गर्ने पुरुष नै सन्न्यासी हो र योगी हो; अग्नि र क्रिया त्याग गर्ने मात्र होइन।

श्लोक 2 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव। न ह्यसंन्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन

अंग्रेज़ी

Do you, O Arjuna, know that Yoga is what they call renunciation; no one indeed becomes a Yogi who has not renounced their thoughts.

हिन्दी

हे पाण्डव ! जिसको (शास्त्रवित्) संन्यास कहते हैं, उसी को तुम योग समझो; क्योंकि संकल्पों को न त्यागने वाला कोई भी पुरुष योगी नहीं होता।।

नेपाली

हे पाण्डव! जसलाई सन्न्यास भनिन्छ, त्यसैलाई योग पनि भनिन्छ; सङ्कल्प नत्यागी कोही पनि योगी हुँदैन।

श्लोक 3 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते। योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते

अंग्रेज़ी

For a sage who wishes to attain to Yoga, action is said to be the means; for the same sage who has attained Yoga, inaction is said to be the means.

हिन्दी

योग में आरूढ़ होने की इच्छा वाले मुनि के लिए कर्म करना ही हेतु (साधन) कहा है और योगारूढ़ हो जाने पर उसी पुरुष के लिए शम को (शांति, संकल्पसंन्यास) साधन कहा गया है।।

नेपाली

योगारुढ हुन चाहने मुनिका लागि कर्म साधन भनिएको छ; योगारुढ भइसकेका लागि शम (निष्क्रियता) साधन भनिएको छ।

श्लोक 4 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते। सर्वसङ्कल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते

अंग्रेज़ी

When a person is not attached to the sense-objects or to actions, having renounced all thoughts, then they are said to have attained Yoga.

हिन्दी

जब (साधक) न इन्द्रियों के विषयों में और न कर्मों में आसक्त होता है तब सर्व संकल्पों के संन्यासी को योगारूढ़ कहा जाता है।।

नेपाली

जब मानिस इन्द्रिय-विषयमा र कर्ममा आसक्त हुँदैन र सम्पूर्ण सङ्कल्प त्याग्छ, त्यतिबेला उसलाई योगारुढ भनिन्छ।

श्लोक 5 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्। आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः

अंग्रेज़ी

One should raise oneself by one's own self alone; let not one lower oneself; for the self alone is one's own friend, and the self alone is one's own enemy.

हिन्दी

मनुष्य को अपने द्वारा अपना उद्धार करना चाहिये और अपना अध: पतन नहीं करना चाहिये; क्योंकि आत्मा ही आत्मा का मित्र है और आत्मा (मनुष्य स्वयं) ही आत्मा का (अपना) शत्रु है।।

नेपाली

आफूले आफूलाई उद्धार गर्नुपर्छ, आफूले आफूलाई अधोगति नदिनू; किनकि आफै आफ्नो मित्र हो र आफै आफ्नो शत्रु पनि।

श्लोक 6 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

बन्धुरात्माऽऽत्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः। अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत्

अंग्रेज़ी

The Self is the friend of the self of him by whom the Self has been conquered; but to the unconquered self, this Self stands in the position of an enemy, like an external foe.

हिन्दी

जिसने आत्मा (इंद्रियों,आदि) को आत्मा के द्वारा जीत लिया है, उस पुरुष का आत्मा उसका मित्र होता है, परन्तु अजितेन्द्रिय के लिए आत्मा शत्रु के समान स्थित होता है।।

नेपाली

जसले आत्मालाई आफै जितेको छ, उसको आत्मा उसको मित्र हो; तर जसले आत्मालाई जितेको छैन, उसको आत्मा शत्रुझैँ व्यवहार गर्छ।

श्लोक 7 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः। शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः

अंग्रेज़ी

The Supreme Self of him who is self-controlled and peaceful remains balanced in cold and heat, pleasure and pain, as well as in honor and dishonor.

हिन्दी

शीत-उष्ण, सुख-दु:ख तथा मान-अपमान में जो प्रशान्त रहता है, ऐसे जितात्मा पुरुष के लिये परमात्मा सम्यक् प्रकार से स्थित है, अर्थात्, आत्मरूप से विद्यमान है।।

नेपाली

जितात्मा र प्रशान्त पुरुषमा शीत-उष्ण, सुख-दुःख, मान-अपमानमा परमात्मा समान रूपले प्रतिष्ठित रहन्छ।

श्लोक 8 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः। युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चनः

अंग्रेज़ी

The Yogi who is satisfied with the knowledge and wisdom of the Self, who has conquered the senses, and to whom a clod of earth, a piece of stone, and gold are all the same, is said to have attained Nirvikalpa Samadhi.

हिन्दी

जो योगी ज्ञान और विज्ञान से तृप्त है, जो विकार रहित (कूटस्थ) और जितेन्द्रिय है, जिसको मिट्टी, पाषाण और कंचन समान है, वह (परमात्मा से) युक्त कहलाता है।।

नेपाली

ज्ञान-विज्ञानले सन्तुष्ट, कूटस्थ, जितेन्द्रिय योगीलाई ढुङ्गा, माटोको ढिक्का र सुन समान देखिन्छ — त्यसैलाई युक्त भनिन्छ।

श्लोक 9 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु। साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते

अंग्रेज़ी

He who is of the same mind towards the good-hearted, friends, enemies, the indifferent, the neutral, the hateful, the relatives, the righteous, and the unrighteous, excels.

हिन्दी

जो पुरुष सुहृद्, मित्र, शत्रु, उदासीन, मध्यस्थ, द्वेषी और बान्धवों में तथा धर्मात्माओं में और पापियों में भी समान भाव वाला है, वह श्रेष्ठ है।।

नेपाली

सुहृद्, मित्र, शत्रु, उदासीन, मध्यस्थ, द्वेष्य, बन्धु, साधु र दुष्ट — सबैमा समबुद्धि राख्ने पुरुष श्रेष्ठ हो।

श्लोक 10 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः। एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः

अंग्रेज़ी

Let the yogi constantly strive to keep the mind steady, remaining in solitude, alone, with the body and mind controlled, and free from hope and greed.

हिन्दी

शरीर और मन को संयमित किया हुआ योगी एकान्त स्थान पर अकेला रहता हुआ आशा और परिग्रह से मुक्त होकर निरन्तर मन को आत्मा में स्थिर करे।।

नेपाली

योगीले सदा एकान्तमा एक्लै बस्दै शरीर-चित्तलाई संयममा राख्दै, आशा-परिग्रहरहित भएर निरन्तर आत्मामा चित्त लगाउनुपर्छ।

श्लोक 11 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः। नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम्

अंग्रेज़ी

In a clean spot, having established a firm seat of his own, neither too high nor too low, made of cloth, skin, and kusha grass layered one over the other.

हिन्दी

शुद्ध (स्वच्छ) भूमि में कुश, मृगशाला और उस पर वस्त्र रखा हो ऐसे अपने आसन को न अति ऊँचा और न अति नीचा स्थिर स्थापित करके....৷৷.।।

नेपाली

पवित्र भूमिमा कुश, मृगचर्म र वस्त्र क्रमशः ओछ्याएर न अति अग्लो न अति होचो आफ्नो स्थिर आसन बनाउनुपर्छ।

श्लोक 12 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः। उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये

अंग्रेज़ी

There, having made the mind one-pointed, with the actions of the mind and senses controlled, let him, seated on the seat, practice Yoga for the purification of the self.

हिन्दी

वहाँ (आसन में बैठकर) मन को एकाग्र करके, चित्त और इन्द्रियों की क्रियाओं को वश में किये हुये आत्मशुद्धि के लिए योग का अभ्यास करे।।

नेपाली

त्यहीँ बसेर मनलाई एकाग्र पारी, चित्त र इन्द्रियका क्रियाहरूलाई नियन्त्रण गर्दै आत्म-शुद्धिको लागि योग अभ्यास गर्नुपर्छ।

श्लोक 13 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः। संप्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन्

अंग्रेज़ी

Let him firmly hold his body, head, and neck erect and still, gazing at the tip of his nose without looking around.

हिन्दी

काया, सिर और ग्रीवा को समान और अचल धारण किये हुए स्थिर होकर अपनी नासिका के अग्र भाग को देखकर अन्य दिशाओं को न देखता हुआ।।

नेपाली

शरीर, टाउको र घाँटी सिधा र स्थिर राखेर, चारैतिर नहेरी आफ्नो नाकको टुप्पोमा दृष्टि स्थिर गर्नुपर्छ।

श्लोक 14 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः। मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः

अंग्रेज़ी

Serene-minded, fearless, firm in the vow of a Brahmachari, having controlled their mind, thinking of Me and balanced in mind, let them sit, having Me as their supreme goal.

हिन्दी

(साधक को) प्रशान्त अन्त:करण, निर्भय और ब्रह्मचर्य ब्रत में स्थित होकर, मन को संयमित करके चित्त को मुझमें लगाकर मुझे ही परम लक्ष्य समझकर बैठना चाहिए।।

नेपाली

प्रसन्न-चित्त, निर्भय, ब्रह्मचर्य-व्रतमा दृढ, मनलाई संयममा राखेर मलाई परम लक्ष्य ठानेर ममा चित्त लगाएर बस्नुपर्छ।

श्लोक 15 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

युञ्जन्नेवं सदाऽऽत्मानं योगी नियतमानसः। शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति

अंग्रेज़ी

Thus, always keeping the mind balanced, the yogi, with the mind controlled, attains the peace abiding in Me, culminating in liberation.

हिन्दी

इस प्रकार सदा मन को स्थिर करने का प्रयास करता हुआ संयमित मन का योगी मुझमें स्थित परम निर्वाण (मोक्ष) स्वरूप शांति को प्राप्त होता है।।

नेपाली

यसरी सदा आत्मा-नियन्त्रित योगीले संयतचित्त भएर ममा रहेको परम शान्ति र निर्वाणको पद प्राप्त गर्छ।

श्लोक 16 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः। न चातिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन

अंग्रेज़ी

Verily, Yoga is not possible for him who eats too much, nor for him who does not eat at all, nor for him who sleeps too much, nor for him who is always awake, O Arjuna.

हिन्दी

परन्तु, हे अर्जुन ! यह योग उस पुरुष के लिए सम्भव नहीं होता, जो अधिक खाने वाला है या बिल्कुल न खाने वाला है तथा जो अधिक सोने वाला है या सदा जागने वाला है।।

नेपाली

हे अर्जुन! योग न त धेरै खानेलाई सम्भव छ, न बिल्कुलै नखानेलाई, न त धेरै सुत्नेलाई, न त सधैँ जागिरहनेलाई।

श्लोक 17 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु। युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा

अंग्रेज़ी

Yoga becomes the destroyer of pain for him who is moderate in eating and recreation (such as walking, etc.), who exercises moderation in action, and who is moderate in sleep and wakefulness.

हिन्दी

उस पुरुष के लिए योग दु:खनाशक होता है, जो युक्त आहार और विहार करने वाला है, यथायोग्य चेष्टा करने वाला है और परिमित शयन और जागरण करने वाला है।।

नेपाली

जसले आहार-विहार, कर्म, निद्रा र जागरणलाई संयमित गर्छ, उसकै लागि योग दुःखनाशक बन्छ।

श्लोक 18 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते। निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा

अंग्रेज़ी

When the perfectly controlled mind rests in the Self alone, free from longing for any of the objects of desire, then it is said, 'He is united'.

हिन्दी

वश में किया हुआ चित्त जिस कालमें अपने स्वरुपमें ही स्थित हो जाता है और स्वयं सम्पूर्ण पदार्थों नि: स्पृह हो जाता है, उस कालमें वह योगी कहा जाता है।

नेपाली

जब पूर्णतः नियन्त्रित चित्त सबै कामनाहरूबाट मुक्त भएर आत्मामा नै स्थिर हुन्छ, तब त्यो पुरुष 'योगयुक्त' कहलिन्छ।

श्लोक 19 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता। योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः

अंग्रेज़ी

As a lamp placed in a windless spot does not flicker, so is the Yogi of a controlled mind, who practices Yoga in the Self, compared.

हिन्दी

जैसे स्पन्दनरहित वायुके स्थानमें स्थित दीपककी लौ चेष्टारहित हो जाती है, योगका अभ्यास करते हुए यतचित्तवाले योगीके चित्तकी वैसी ही उपमा कही गयी है।।

नेपाली

वायुरहित ठाउँमा राखिएको दीप जसरी हल्लिँदैन, त्यसरी नै आत्म-योग अभ्यास गर्ने योगीको संयतचित्तको उपमा दिइन्छ।

श्लोक 20 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया। यत्र चैवात्मनाऽऽत्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति

अंग्रेज़ी

When the mind, restrained by the practice of yoga, attains quietude, and when one sees the Self by the Self, they are satisfied in their own Self.

हिन्दी

योगका सेवन करनेसे जिस अवस्थामें निरुध्द चित्त उपराम हो जाता है तथा जिस अवस्थामें स्वयं अपने-आपमें अपने-आपको देखता हुआ अपने-आपमें सन्तुष्ट हो जाता है।।

नेपाली

योगाभ्यासले नियन्त्रित चित्त शान्त हुन्छ; जब आत्माद्वारा आत्मा देख्छ, त्यतिबेला आफूमा नै सन्तुष्ट हुन्छ।

श्लोक 21 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

सुखमात्यन्तिकं यत्तद्बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम्। वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः

अंग्रेज़ी

When he (the Yogi) feels that infinite bliss which can be grasped by the pure intellect and which transcends the senses, and is established therein, never moving away from the reality.

हिन्दी

जो सुख आत्यन्तिक, अतीन्द्रिय और बुध्दिग्राह्म है, उस सुखका जिस अवस्थामें अनुभव करता है और जिस सुखमें स्थित हुआ यह ध्यानयोगी फिर कभी तत्वसे विचलित नहीं होता है।।

नेपाली

बुद्धिले ग्रहण गर्न सकिने, इन्द्रियातीत, अनन्त सुख जब उसले अनुभव गर्छ र त्यसमा स्थिर भएर तत्त्वबाट विचलित हुँदैन,

श्लोक 22 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः। यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते

अंग्रेज़ी

Having obtained it, he thinks there is no other gain superior to it; established in it, he is not moved even by heavy sorrow.

हिन्दी

जिस लाभकी प्राप्ति होनेपर उससे अधिक कोई दूसरा लाभ उसके माननेमें भी नहीं आता और जिसमें स्थित होनेपर वह बड़े भारी दु:ख से भी विचलित नहीं होता है।।

नेपाली

त्यो प्राप्तपछि उसले अरू कुनै पनि लाभलाई त्योभन्दा श्रेष्ठ ठान्दैन; त्यसमा स्थित भएपछि ठूलो दुःखले पनि उसलाई विचलित गर्न सक्दैन।

श्लोक 23 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम्। स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा

अंग्रेज़ी

Let this be known by the name of Yoga, the severance from union with pain. This Yoga should be practiced with determination and with an undespairing mind.

हिन्दी

दु:ख के संयोग से वियोग है, उसीको 'योग' नामसे जानना चाहिये । (वह योग जिस ध्यानयोग लक्ष्य है,) उस ध्यानयोका अभ्यास न उकताये हुए चित्तसे   निश्चयपूर्वक करना चाहिये।।

नेपाली

दुःखको संयोगबाट छुटाउने नै योग हो भनी जान; यो योग दृढ निश्चय र अनुद्विग्न चित्तले अभ्यास गर्नुपर्छ।

श्लोक 24 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

सङ्कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः। मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः

अंग्रेज़ी

Abandoning unreservedly all desires born of Sankalpa (thought and imagination) and completely restraining the whole group of senses by the mind from all sides.

हिन्दी

संकल्प से उत्पन्न समस्त कामनाओं को नि:शेष रूप से परित्याग कर मन के द्वारा इन्द्रिय समुदाय को सब ओर से सम्यक् प्रकार वश में करके।।

नेपाली

सङ्कल्पबाट उत्पन्न सबै कामनालाई बिना अवशेष त्यागेर मनद्वारा सम्पूर्ण इन्द्रियलाई सबैतिरबाट संयममा राख्नुपर्छ।

श्लोक 25 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

शनैः शनैरुपरमेद् बुद्ध्या धृतिगृहीतया। आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत्

अंग्रेज़ी

Little by little, let him attain steadiness of the intellect by holding it firmly; having made the mind establish itself in the Self, let him not think of anything else.

हिन्दी

शनै: शनै: धैर्ययुक्त बुद्धि के द्वारा (योगी) उपरामता (शांति) को प्राप्त होवे;  मन को आत्मा में स्थित करके फिर अन्य कुछ भी चिन्तन न करे।।

नेपाली

धैर्ययुक्त बुद्धिले बिस्तारै बिस्तारै शान्त हुनुपर्छ; मनलाई आत्मामा स्थिर गरेर अरू केही पनि चिन्तन गर्नु हुँदैन।

श्लोक 26 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्। ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्

अंग्रेज़ी

From whatever cause the restless and unsteady mind wanders away, let him restrain it from that and bring it under the control of the Self alone.

हिन्दी

यह चंचल और अस्थिर मन जिन कारणों से (विषयों में) विचरण करता है, उनसे संयमित करके उसे आत्मा के ही वश में लावे अर्थात् आत्मा में स्थिर करे।।

नेपाली

चञ्चल र अस्थिर मन जहाँ-जहाँ बाहिर जान्छ, त्यहाँ-त्यहाँबाट उसलाई फर्काएर आत्मामा वशमा ल्याउनुपर्छ।

श्लोक 27 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम्। उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम्

अंग्रेज़ी

Supreme Bliss indeed comes to this Yogi whose mind is made peaceful, whose passion is quelled, who has become Brahman, and who is free from sin.

हिन्दी

जिसका मन प्रशान्त है, जो पापरहित (अकल्मषम्) है और जिसका रजोगुण (विक्षेप) शांत हुआ है, ऐसे ब्रह्मरूप हुए इस योगी को उत्तम सुख प्राप्त होता है।।

नेपाली

रजोगुण शान्त भएको, ब्रह्मरूप बनेको, निष्पाप, प्रशान्त-मनको योगीलाई परम सुख प्राप्त हुन्छ।

श्लोक 28 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

युञ्जन्नेवं सदाऽऽत्मानं योगी विगतकल्मषः। सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते

अंग्रेज़ी

The yogi, always engaging the mind thus (in the practice of yoga), is freed from sins and easily enjoys the infinite bliss of contact with Brahman (the Eternal).

हिन्दी

इस प्रकार मन को सदा आत्मा में स्थिर करने का योग करने वाला पापरहित योगी सुखपूर्वक ब्रह्मसंस्पर्श का परम सुख प्राप्त करता है।।

नेपाली

मललाई सदा यसरी आफूलाई योगमा लगाउने पापरहित योगी सहजै ब्रह्म-स्पर्शजन्य अनन्त सुख भोग्छ।

श्लोक 29 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि। ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः

अंग्रेज़ी

With the mind harmonized by Yoga, he sees the Self abiding in all beings and all beings in the Self; he sees the same everywhere.

हिन्दी

योगयुक्त अन्त:करण वाला और सर्वत्र समदर्शी योगी आत्मा को सब भूतों में और भूतमात्र को आत्मा में देखता है।।

नेपाली

योगयुक्त, समदर्शी पुरुष सबै प्राणीमा आत्मा र आत्मामा सबै प्राणी देख्छ; उसले सबैतिर समान देख्छ।

श्लोक 30 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति। तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति

अंग्रेज़ी

He who sees Me everywhere and sees everything in Me, never becomes separated from Me, nor do I from him.

हिन्दी

जो पुरुष मुझे सर्वत्र देखता है और सबको मुझमें देखता है, उसके लिए मैं नष्ट नहीं होता (अर्थात् उसके लिए मैं दूर नहीं होता) और वह मुझसे वियुक्त नहीं होता।।

नेपाली

जसले मलाई सर्वत्र देख्छ र सबै कुरालाई ममा देख्छ, त्यसका लागि म लोप हुन्नँ, र म पनि उसका लागि लोप हुन्नँ।

श्लोक 31 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः। सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते

अंग्रेज़ी

He who, being established in unity, worships Me, who dwells in all beings, that yogi abides in Me, whatever their mode of living may be.

हिन्दी

जो पुरुष एकत्वभाव मंे स्थित हुआ सम्पूर्ण भूतों में स्थित मुझे भजता है, वह योगी सब प्रकार से वर्तता हुआ (रहता हुआ) मुझमें स्थित रहता है।।

नेपाली

एकत्वमा स्थित भएर सबै प्राणीमा रहेको मलाई जुन योगी भज्छ, त्यो योगी जुनसुकै अवस्थामा बाँचे पनि ममा नै बस्छ।

श्लोक 32 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन। सुखं वा यदि वा दुःखं सः योगी परमो मतः

अंग्रेज़ी

He who, through the likeness of the Self, O Arjuna, sees reality everywhere, be it pleasure or pain, is regarded as the highest Yogi.

हिन्दी

हे अर्जुन ! जो पुरुष अपने समान सर्वत्र सम देखता है, चाहे वह सुख हो या दु:ख, वह परम योगी माना गया है।।

नेपाली

हे अर्जुन! जसले आत्मौपम्यले सबै ठाउँमा समानता देख्छ — सुखमा होस् वा दुःखमा — त्यसैलाई परम योगी मानिन्छ।

श्लोक 33 अर्जुन उवाच · अर्जुन कहते हैं
संस्कृत

अर्जुन उवाच योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन। एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात् स्थितिं स्थिराम्

अंग्रेज़ी

Arjuna said, "O Krishna, I do not see how this Yoga of equanimity, which you have taught me, can be maintained steadily, due to the restlessness of the mind."

हिन्दी

अर्जुन ने कहा --  हे मधुसूदन ! जो यह साम्य योग आपने कहा, मैं मन के चंचल होने से इसकी चिरस्थायी स्थिति को नहीं देखता हूं।।

नेपाली

अर्जुनले भने — हे मधुसूदन! तपाईंले बताउनुभएको यो समत्वरूपी योग मनको चञ्चलताका कारण मलाई स्थिर रहने जस्तो लाग्दैन।

श्लोक 34 अर्जुन उवाच · अर्जुन कहते हैं
संस्कृत

चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम्। तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्

अंग्रेज़ी

The mind is indeed restless, turbulent, strong, and unyielding, O Krishna; I consider it as difficult to control as controlling the wind.

हिन्दी

क्योंकि हे कृष्ण ! यह मन चंचल और प्रमथन स्वभाव का तथा बलवान् और दृढ़ है; उसका निग्रह करना मैं वायु के समान अति दुष्कर मानता हूँ ।।

नेपाली

हे कृष्ण! मन त चञ्चल, क्षोभकारी, बलवान् र दृढ छ; यसलाई वशमा राख्नु हावा वशमा राख्न जत्तिकै कठिन देखिन्छ।

श्लोक 35 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

श्री भगवानुवाच असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलं। अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते

अंग्रेज़ी

The Blessed Lord said, "Undoubtedly, O mighty-armed Arjuna, the mind is difficult to control and restless; but with practice and dispassion, it can be restrained."

हिन्दी

श्रीभगवान् कहते हैं --  हे महबाहो ! नि:सन्देह मन चंचल और कठिनता से वश में होने वाला है; परन्तु, हे कुन्तीपुत्र ! उसे अभ्यास और वैराग्य के द्वारा वश में किया जा सकता है।।

नेपाली

श्रीभगवान्ले भने — हे महाबाहु! निःसन्देह मन चञ्चल र अनुग्रहणीय छ; तर अभ्यास र वैराग्यले यसलाई वशमा राख्न सकिन्छ।

श्लोक 36 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः। वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः

अंग्रेज़ी

I think Yoga is hard to be attained by one with an uncontrolled self, but the self-controlled and striving one can attain it by the appropriate means.

हिन्दी

असंयत मन के पुरुष द्वारा योग प्राप्त होना कठिन है, परन्तु स्वाधीन मन वाले प्रयत्नशील पुरुष द्वारा उपाय से योग प्राप्त होना संभव है, यह मेरा मत है।।

नेपाली

असंयतात्माका लागि योग दुर्लभ छ; तर जसले आत्म-संयम साधनासाथ प्रयत्न गर्छ, त्यसले उपायपूर्वक योग प्राप्त गर्न सक्छ।

श्लोक 37 अर्जुन उवाच · अर्जुन कहते हैं
संस्कृत

अर्जुन उवाच अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः। अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति

अंग्रेज़ी

Arjuna said, "He who is unable to control himself, even though he has faith, and whose mind wanders away from Yoga, what end does he meet, having failed to attain perfection in Yoga, O Krishna?"

हिन्दी

अर्जुन ने कहा -- हे कृष्ण ! जिसका मन योग से चलायमान हो गया है, ऐसा अपूर्ण प्रयत्न वाला (अयति) श्रद्धायुक्त पुरुष योग की सिद्धि को न प्राप्त होकर किस गति को प्राप्त होता है?

नेपाली

अर्जुनले भने — हे कृष्ण! श्रद्धावान् भए पनि असंयतचित्त भएर योगबाट विचलित भएको पुरुष — योगसिद्धि नपाई कुन गति प्राप्त गर्छ?

श्लोक 38 अर्जुन उवाच · अर्जुन कहते हैं
संस्कृत

कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति। अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि

अंग्रेज़ी

Fallen from both, does he not perish like a rent cloud, supportless, O mighty-armed one, deluded on the path of Brahman?

हिन्दी

हे महबाहो ! क्या वह ब्रह्म के मार्ग में मोहित तथा आश्रयरहित पुरुष छिन्न-भिन्न मेघ के समान दोनों ओर से भ्रष्ट हुआ नष्ट तो नहीं हो जाता है?

नेपाली

हे महाबाहु! दुवैतर्फबाट चुकेको, अनाश्रित, ब्रह्म-मार्गमा मोहित त्यो पुरुष फाटेको बादलजस्तै नष्ट हुने त होइन?

श्लोक 39 अर्जुन उवाच · अर्जुन कहते हैं
संस्कृत

एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः। त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते

अंग्रेज़ी

O Krishna, please completely dispel this doubt of mine, for it is not possible for anyone but You to do so.

हिन्दी

हे कृष्ण ! मेरे इस संशय को नि:शेष रूप से छेदन (निराकरण) करने के लिए आप ही योग्य है; क्योंकि आपके अतिरिक्त अन्य कोई इस संशय का छेदन करन वाला (छेत्ता) मिलना संभव नहीं है।।

नेपाली

हे कृष्ण! मेरो यो संशय पूर्ण रूपमा हटाइदिनुहोस्; तपाईंबाहेक यो संशय हटाउन सक्ने अरू कोही छैन।

श्लोक 40 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

श्री भगवानुवाच पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते। नहि कल्याणकृत्कश्िचद्दुर्गतिं तात गच्छति

अंग्रेज़ी

The Blessed Lord said, "O Arjuna, neither in this world nor in the next will there be destruction for him; none, indeed, who does good, O my son, ever comes to grief."

हिन्दी

श्रीभगवान् ने कहा -- हे पार्थ ! उस पुरुष का, न तो इस लोक में और न ही परलोक में ही नाश होता है; हे तात ! कोई भी शुभ कर्म करने वाला दुर्गति को नहीं प्राप्त होता है।।

नेपाली

श्रीभगवान्ले भने — हे पार्थ! त्यो पुरुषको न यो लोकमा न परलोकमा विनाश हुन्छ; हे तात! कल्याण गर्ने मानिस कहिल्यै दुर्गति पाउँदैन।

श्लोक 41 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः। शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते

अंग्रेज़ी

Having attained to the worlds of the righteous and having dwelt there for everlasting years, he who fell from Yoga is born in a house of the pure and wealthy.

हिन्दी

योगभ्रष्ट पुरुष पुण्यवानों के लोकों को प्राप्त होकर वहाँ दीर्घकाल तक वास करके शुद्ध आचरण वाले श्रीमन्त (धनवान) पुरुषों के घर में जन्म लेता है।।

नेपाली

योगभ्रष्ट पुरुष पुण्यवान्हरूको लोक प्राप्त गरी त्यहाँ दीर्घकालसम्म रहेर पवित्र र समृद्ध घरमा जन्मिन्छ।

श्लोक 42 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम्। एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम्

अंग्रेज़ी

Or he is born in a family of even the wisest of yogis; verily, such a birth is very difficult to obtain in this world.

हिन्दी

अथवा, (साधक) ज्ञानवान् योगियों के ही कुल में जन्म लेता है, परन्तु इस प्रकार का जन्म इस लोक में नि:संदेह अति दुर्लभ है।।

नेपाली

अथवा त्यो ज्ञानी योगीहरूकै कुलमा जन्मिन्छ; तर त्यस्तो जन्म यस संसारमा प्राप्त गर्न अति दुर्लभ हुन्छ।

श्लोक 43 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम्। यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन

अंग्रेज़ी

Then he comes into contact with the knowledge acquired in his former body and strives even more for perfection, O Arjuna.

हिन्दी

हे कुरुनन्दन ! वह पुरुष वहाँ पूर्व देह में प्राप्त किये गये ज्ञान से सम्पन्न होकर योगसंसिद्धि के लिए उससे भी अधिक प्रयत्न करता है।।

नेपाली

हे कुरुनन्दन! त्यहाँ पूर्वजन्मको त्यो बुद्धि-संयोगलाई पुनः प्राप्त गरेर सिद्धिका लागि झन् बढी प्रयत्न गर्छ।

श्लोक 44 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः। जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते

अंग्रेज़ी

By that same former practice, he is borne on in spite of himself. Even he who merely wishes to know Yoga goes beyond the Brahmanic word.

हिन्दी

उसी पूर्वाभ्यास के कारण वह अवश हुआ योग की ओर आकर्षित होता है। योग का जो केवल जिज्ञासु है वह शब्दब्रह्म का अतिक्रमण करता है।।

नेपाली

पूर्वाभ्यासकै बलले उसलाई इच्छाविरुद्ध पनि योगमा खिच्छ; योगको जिज्ञासा गर्ने मात्रले पनि शब्द-ब्रह्मलाई पार गर्छ।

श्लोक 45 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः। अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम्

अंग्रेज़ी

But the Yogi who strives assiduously, purified of sins and perfected gradually over many births, reaches the highest goal.

हिन्दी

परन्तु प्रयत्नपूर्वक अभ्यास करने वाला योगी सम्पूर्ण पापों से शुद्ध होकर अनेक जन्मों से (शनै: शनै:) सिद्ध होता हुआ, तब परम गति को प्राप्त होता है।।

नेपाली

तर जुन योगीले प्रयत्नशील भएर साधना गरिरहन्छ, ऊ अनेक जन्ममा शुद्ध भएर सिद्ध भएर परम गति प्राप्त गर्छ।

श्लोक 46 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः। कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन

अंग्रेज़ी

The yogi is thought to be superior to the ascetics, even superior to those who have knowledge obtained through the study of scriptures; he is also superior to men of action; therefore, be thou a yogi, O Arjuna.

हिन्दी

क्योंकि योगी तपस्वियों से श्रेष्ठ है और (केवल शास्त्र के) ज्ञान वालों से भी श्रेष्ठ माना गया है तथा कर्म करने वालों से भी योगी श्रेष्ठ है, इसलिए हे अर्जुन तुम योगी बनो।।

नेपाली

तपस्वीहरूभन्दा योगी श्रेष्ठ हो, ज्ञानीहरूभन्दा पनि श्रेष्ठ हो, सकाम कर्मकाण्डीहरूभन्दा पनि श्रेष्ठ हो; त्यसैले हे अर्जुन! तिमी योगी होऊ।

श्लोक 47 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना। श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः

अंग्रेज़ी

And among all the Yogis, he who, full of faith and with his inner self merged in Me, worships Me is deemed by Me to be the most devoted.

हिन्दी

समस्त योगियों में जो भी श्रद्धावान् योगी मुझ में युक्त हुये अन्तरात्मा से (अर्थात् एकत्व भाव से मुझे भजता है, वह मुझे युक्ततम (सर्वश्रेष्ठ) मान्य है।।

नेपाली

सबै योगीहरूमा जसले श्रद्धापूर्वक भित्री आत्मा ममा लीन गरेर मलाई भज्छ, त्यो नै मेरो दृष्टिमा सर्वश्रेष्ठ योगी हो।