अध्याय 3

कर्मयोग

भगवद गीता का तीसरा अध्याय कर्मयोग या निःस्वार्थ सेवा का मार्ग है। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण जीवन में कर्म के महत्व पर जोर देते हैं। वे बताते हैं कि इस भौतिक संसार में हर मनुष्य का किसी न किसी प्रकार की क्रिया में सम्मिलित होना अनिवार्य है। इसके अलावा, वह उन कार्यों के बारे में बताते हैं जो मनुष्य को बांधते हैं अथवा वे जो मनुष्य को मुक्ति दिलाते हैं। वे मनुष्य जो अपने कर्तव्यों को भगवन की ख़ुशी के लिए एवं बिना फल की अपेक्षा किये हुए निरंतर करते रहते हैं, वे अंत में मुक्ति प्राप्त करते हैं।

दिखाएँ:
दृश्य:
श्लोक 1 अर्जुन उवाच · अर्जुन कहते हैं
संस्कृत

अर्जुन उवाच ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन। तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव

अंग्रेज़ी

Arjuna said: If Thou thinkest that knowledge is superior to action, O Krishna, why then, O Kesava, doest Thou ask me to engage in this terrible action?

हिन्दी

हे जनार्दन यदि आपको यह मान्य है कि कर्म से ज्ञान श्रेष्ठ है तो फिर हे केशव आप मुझे इस भयंकर कर्म में क्यों प्रवृत्त करते हैं

नेपाली

अर्जुनले भने — हे जनार्दन! यदि कर्मभन्दा ज्ञान श्रेष्ठ छ भन्ने तपाईंलाई लाग्छ भने हे केशव! मलाई किन यो भयानक कर्ममा लगाउँदै हुनुहुन्छ?

श्लोक 2 अर्जुन उवाच · अर्जुन कहते हैं
संस्कृत

व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे। तदेकं वद निश्िचत्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम्

अंग्रेज़ी

With this seemingly perplexing speech, you seem to be confusing my understanding; therefore, tell me one certain way by which I may attain bliss.

हिन्दी

आप इस मिश्रित वाक्य से मेरी बुद्धि को मोहितसा करते हैं अत आप उस एक (मार्ग) को निश्चित रूप से कहिये जिससे मैं परम श्रेय को प्राप्त कर सकूँ।।

नेपाली

तपाईंका मिश्रित जस्ता वचनहरूले मेरो बुद्धि भ्रमित बनाउँदै छन्; त्यसैले एउटा निश्चित मार्ग बताइदिनुहोस् जसले म कल्याण पाऊँ।

श्लोक 3 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

श्री भगवानुवाच लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ। ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम्

अंग्रेज़ी

The Blessed Lord said, "In this world, there is a twofold path, as I said before, O sinless one: the path of knowledge of the Sankhyas and the path of action of the Yogins."

हिन्दी

श्री भगवान् ने कहा हे निष्पाप (अनघ) अर्जुन इस श्लोक में दो प्रकार की निष्ठा मेरे द्वारा पहले कही गयी है ज्ञानियों की (सांख्यानां) ज्ञानयोग से और योगियों की कर्मयोग से।।

नेपाली

श्रीभगवान्ले भने — हे निष्पाप! यस लोकमा मैले पहिले नै दुई प्रकारका निष्ठा भनेको छु — साङ्ख्ययोगीहरूको ज्ञानयोग र कर्मयोगीहरूको कर्मयोग।

श्लोक 4 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते। न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति

अंग्रेज़ी

Man does not reach actionlessness by not performing actions; nor does he attain perfection by mere renunciation.

हिन्दी

कर्मों के न करने से मनुष्य नैर्ष्कम्य को प्राप्त नहीं होता और न कर्मों के संन्यास से ही वह सिद्धि (पूर्णत्व) प्राप्त करता है।।

नेपाली

कर्म नगरेर मानिस निष्कर्मतालाई प्राप्त गर्दैन; र कर्मको त्यागले मात्रै सिद्धि पाउँदैन।

श्लोक 5 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

न हि कश्िचत्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्। कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः

अंग्रेज़ी

Verily, no one can remain for even a moment without performing action; for everyone is made to act helplessly, indeed, by the qualities born of Nature.

हिन्दी

कोई भी पुरुष कभी क्षणमात्र भी बिना कर्म किए नहीं रह सकता क्योंकि प्रकृति से उत्पन्न गुणों के द्वारा अवश हुए सब (पुरुषों) से कर्म करवा लिया जाता है।।

नेपाली

वास्तवमा कुनै पनि मानिस एक क्षण पनि कर्म नगरी बस्न सक्दैन; प्रकृतिजात गुणहरूले सबैलाई परवश गराएर कर्म गराउँछन्।

श्लोक 6 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्। इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते

अंग्रेज़ी

He who, restraining the organs of action, sits thinking of the sense-objects in his mind, he of deluded understanding is called a hypocrite.

हिन्दी

जो मूढ बुद्धि पुरुष कर्मेन्द्रियों का निग्रह कर इन्द्रियों के भोगों का मन से स्मरण (चिन्तन) करता रहता है वह मिथ्याचारी (दम्भी) कहा जाता है।।

नेपाली

जो कर्मेन्द्रियलाई बाह्यतः रोकेर मनमा इन्द्रिय-विषयको चिन्तन गरिरहन्छ, त्यो मूढ-बुद्धि मानिस मिथ्याचारी (पाखण्डी) कहलिन्छ।

श्लोक 7 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन। कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते

अंग्रेज़ी

But whoever, controlling the senses by the mind, O Arjuna, engages himself in Karma Yoga with the organs of action, without attachment, he excels.

हिन्दी

परन्तु हे अर्जुन जो पुरुष मन से इन्द्रियों को वश में करके अनासक्त हुआ कर्मेंन्द्रियों से कर्मयोग का आचरण करता है वह श्रेष्ठ है।।

नेपाली

तर हे अर्जुन! जसले मनद्वारा इन्द्रियलाई वश गरेर अनासक्तरूपले कर्मेन्द्रियद्वारा कर्मयोगको आचरण गर्छ, त्यो श्रेष्ठ हो।

श्लोक 8 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः। शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः

अंग्रेज़ी

Perform your bounden duty, for action is superior to inaction, and even the maintenance of the body would not be possible for you through inaction.

हिन्दी

तुम (अपने) नियत (कर्तव्य) कर्म करो क्योंकि अकर्म से श्रेष्ठ कर्म है। तुम्हारे अकर्म होने से (तुम्हारा) शरीर निर्वाह भी नहीं सिद्ध होगा।।

नेपाली

तिमीले विहित कर्म गर — अकर्मभन्दा कर्म श्रेष्ठ हो; कर्म नगरी त शरीर निर्वाह पनि सम्भव छैन।

श्लोक 9 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः। तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसंगः समाचर

अंग्रेज़ी

The world is bound by actions other than those performed for the sake of sacrifice; do thou, therefore, O son of Kunti (Arjuna), perform actions for that sake alone, free from attachment.

हिन्दी

यज्ञ के लिये किये हुए कर्म के अतिरिक्त अन्य कर्म में प्रवृत्त हुआ यह पुरुष कर्मों द्वारा बंधता है इसलिए हे कौन्तेय आसक्ति को त्यागकर यज्ञ के निमित्त ही कर्म का सम्यक् आचरण करो।।

नेपाली

यज्ञका लागि गरिएको कर्मबाहेक अन्य कर्मले लोक बाँधिएको हुन्छ; हे कौन्तेय! त्यसैले आसक्तिरहित भएर यज्ञार्थ कर्म गर।

श्लोक 10 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः। अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक्

अंग्रेज़ी

The Creator, having in the beginning created mankind together with sacrifice, said, "By this shall you propagate; let this be the milch cow of your desires—the cow that yields all the desired objects."

हिन्दी

प्रजापति (सृष्टिकर्त्ता) ने (सृष्टि के) आदि में यज्ञ सहित प्रजा का निर्माण कर कहा इस यज्ञ द्वारा तुम वृद्धि को प्राप्त हो और यह यज्ञ तुम्हारे लिये इच्छित कामनाओं को पूर्ण करने वाला (इष्टकामधुक्) होवे।।

नेपाली

सृष्टिको प्रारम्भमा प्रजापतिले प्रजासँगै यज्ञ रचेर भने — यसैद्वारा तिमीहरू वृद्धि गर्ने छौ; यो तिम्रो इच्छित कुरा दिने कामधेनु होस्।

श्लोक 11 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः। परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ

अंग्रेज़ी

With this, nourish the gods, and may the gods nourish you; thus, nourishing each other, you shall attain the highest good.

हिन्दी

तुम लोग इस यज्ञ द्वारा देवताओं की उन्नति करो और वे देवतागण तुम्हारी उन्नति करें। इस प्रकार परस्पर उन्नति करते हुये परम श्रेय को तुम प्राप्त होगे।।

नेपाली

यसले देवताहरूलाई पाल; देवताहरूले तिमीलाई पालुन्; यसरी एक अर्कालाई पालेर परम कल्याण प्राप्त गर।

श्लोक 12 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः। तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः

अंग्रेज़ी

The gods, nourished by the sacrifice, will give you the desired objects. So, he who enjoys the objects given by the gods without offering anything in return is indeed a thief.

हिन्दी

यज्ञ द्वारा पोषित देवतागण तुम्हें इष्ट भोग प्रदान करेंगे। उनके द्वारा दिये हुये भोगों को जो पुरुष उनको दिये बिना ही भोगता है वह निश्चय ही चोर है।।

नेपाली

यज्ञद्वारा तृप्त भएका देवताहरूले तिमीहरूलाई इच्छित भोग दिनेछन्; देवताहरूले दिएको भोग नदिईकनै भोग्ने मानिस वस्तुतः चोर हो।

श्लोक 13 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः। भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्

अंग्रेज़ी

The righteous who eat the remnants of the sacrifice are freed from all sins; but those sinful ones who cook food solely for their own sake indeed consume sin.

हिन्दी

यज्ञ के अवशिष्ट अन्न को खाने वाले श्रेष्ठ पुरुष सब पापों से मुक्त हो जाते हैं किन्तु जो लोग केवल स्वयं के लिये ही पकाते हैं वे तो पापों को ही खाते हैं।।

नेपाली

यज्ञशेष भोजन गर्ने सत्पुरुषहरू सबै पापबाट मुक्त हुन्छन्; तर आफ्नै लागि मात्र पकाएर खाने पापीहरूले पाप नै भोजन गर्छन्।

श्लोक 14 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः। यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः

अंग्रेज़ी

From food come forth beings; from rain, food is produced; from sacrifice arises rain, and sacrifice is born of action.

हिन्दी

समस्त प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं अन्न की उत्पत्ति पर्जन्य से। पर्जन्य की उत्पत्ति यज्ञ से और यज्ञ कर्मों से उत्पन्न होता है।।

नेपाली

अन्नबाट प्राणी हुन्छन्, वर्षाबाट अन्न हुन्छ, यज्ञबाट वर्षा हुन्छ र यज्ञ कर्मबाट उत्पन्न हुन्छ।

श्लोक 15 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम्। तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम्

अंग्रेज़ी

Know that action comes from Brahma, and Brahma comes from the Imperishable. Therefore, the all-pervasive Brahma ever rests in sacrifice.

हिन्दी

कर्म की उत्पत्ति ब्रह्माजी से होती है और ब्रह्माजी अक्षर तत्त्व से व्यक्त होते हैं। इसलिये सर्व व्यापी ब्रह्म सदा ही यज्ञ में प्रतिष्ठित है।।

नेपाली

कर्म ब्रह्मबाट उत्पन्न हुन्छ र ब्रह्म अक्षरबाट; त्यसैले सर्वव्यापी ब्रह्म सदा यज्ञमा प्रतिष्ठित छ भनी जान।

श्लोक 16 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः। अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति

अंग्रेज़ी

He who does not follow the wheel thus set in motion, who is of sinful life, rejoicing in the senses, lives in vain, O Arjuna.

हिन्दी

जो पुरुष यहाँ इस प्रकार प्रवर्तित हुए चक्र का अनुवर्तन नहीं करता हे पार्थ इंन्द्रियों में रमने वाला वह पाप आयु पुरुष व्यर्थ ही जीता है।।

नेपाली

हे अर्जुन! यसरी चलाइएको चक्रको पालना नगर्ने, इन्द्रियरूपी विषयमा रमाउने पापायु मानिस वृथा बाँच्छ।

श्लोक 17 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः। आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते

अंग्रेज़ी

But for that man who rejoices only in the Self, who is satisfied with the Self and is content in the Self alone, indeed there is nothing to do.

हिन्दी

परन्तु जो मनुष्य आत्मा में ही रमने वाला आत्मा में ही तृप्त तथा आत्मा में ही सन्तुष्ट हो उसके लिये कोई कर्तव्य नहीं रहता।।

नेपाली

तर जो आत्मामा नै रमाउँछ, आत्मामा नै तृप्त हुन्छ, आत्मामा नै सन्तुष्ट हुन्छ — त्यसका लागि गर्नुपर्ने केही छैन।

श्लोक 18 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन। न चास्य सर्वभूतेषु कश्िचदर्थव्यपाश्रयः

अंग्रेज़ी

For him, there is no interest whatsoever in what is done or not done; nor does he depend on any being for any purpose.

हिन्दी

इस जगत् में उस पुरुष का कृत और अकृत से कोई प्रयोजन नहीं है और न वह किसी वस्तु के लिये भूतमात्र पर आश्रित होता है।।

नेपाली

त्यसका लागि न त गरेका कर्मको प्रयोजन छ, न नगरेका कर्मको; र कुनै प्राणीमा त्यो कुनै प्रयोजनको लागि निर्भर हुँदैन।

श्लोक 19 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर। असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः

अंग्रेज़ी

Therefore, without attachment, always perform the actions that should be done; for by performing actions without attachment, one reaches the Supreme.

हिन्दी

इसलिए,  तुम अनासक्त होकर सदैव कर्तव्य कर्म का सम्यक् आचरण करो;  क्योकि,  अनासक्त पुरुष कर्म करता हुआ परमात्मा को प्राप्त होता है।।

नेपाली

त्यसैले आसक्तिरहित भएर सदा कर्तव्य कर्म गर्दै जाऊ; अनासक्त भएर कर्म गर्ने मानिसले परम पद प्राप्त गर्छ।

श्लोक 20 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः। लोकसंग्रहमेवापि संपश्यन्कर्तुमर्हसि

अंग्रेज़ी

Janaka and others attained perfection indeed through action alone; even with the intention of protecting the masses, you should perform action.

हिन्दी

जनकादि (ज्ञानी जन) भी कर्म द्वारा ही संसिद्धि को प्राप्त हुये लोक संग्रह (लोक रक्षण) को भी देखते हुये;  तुम कर्म करने योग्य हो।।

नेपाली

जनकजस्ता राजर्षिहरूले कर्मद्वारा नै सिद्धि प्राप्त गरे; लोकसङ्ग्रहका लागि पनि तिमीले कर्म गर्नु पर्छ।

श्लोक 21 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः। स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते

अंग्रेज़ी

Whatever a great man does, others also do; whatever he establishes as the standard, the world follows.

हिन्दी

श्रेष्ठ पुरुष जैसा आचरण करता है, अन्य लोग भी वैसा ही अनुकरण करते हैं; वह पुरुष जो कुछ प्रमाण कर देता है, लोग भी उसका अनुसरण करते हैं।।

नेपाली

श्रेष्ठ पुरुषले जे आचरण गर्छ, अरूले पनि त्यही गर्छन्; उसले जे प्रमाण मान्छ, संसारले पनि त्यही पछ्याउँछ।

श्लोक 22 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किञ्चन। नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि

अंग्रेज़ी

There is nothing in the three worlds, O Arjuna, that needs to be done by Me, nor is there anything unattained that needs to be attained; yet I engage Myself in action.

हिन्दी

यद्यपि मुझे त्रैलोक्य में कुछ भी कर्तव्य नहीं हैं तथा किंचित भी प्राप्त होने योग्य (अवाप्तव्यम्) वस्तु अप्राप्त नहीं है, तो भी मैं कर्म में ही बर्तता हूँ।।

नेपाली

हे पार्थ! त्रिलोकमा मेरा लागि कुनै कर्तव्य छैन, न पाउनुपर्ने कुनै कुरा अप्राप्त छ; तरै पनि म कर्ममा प्रवृत्त छु।

श्लोक 23 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः। मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः

अंग्रेज़ी

For, should I not ever engage myself in action, unwearied, people would in every way follow my path, O Arjuna.

हिन्दी

यदि मैं सावधान हुआ (अतन्द्रित:) कदाचित कर्म में न लगा रहूँ तो, हे पार्थ ! सब प्रकार से मनुष्य मेरे मार्ग (र्वत्म) का अनुसरण करेंगे।।

नेपाली

किनकि यदि म आलस्यरहित भएर कर्ममा प्रवृत्त नहुने हो भने मानिसहरू सबैतिर मेरै पथ अनुसरण गर्नेछन्।

श्लोक 24 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम्। सङ्करस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः

अंग्रेज़ी

These worlds would perish if I did not perform action; I would be the author of confusion of castes and destruction of these beings.

हिन्दी

यदि मैं कर्म न करूँ, तो ये समस्त लोक नष्ट हो जायेंगे; और मैं वर्णसंकर का कर्ता तथा इस प्रजा का हनन करने वाला होऊँगा।।

नेपाली

मैले कर्म नगरे यी लोकहरू नष्ट हुने थिए; म वर्णसङ्करताको कारण बन्नेथिएँ र यी प्रजाहरूको नाशको कारण।

श्लोक 25 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत। कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्िचकीर्षुर्लोकसंग्रहम्

अंग्रेज़ी

As the ignorant act out of attachment to action, O Bharata, so should the wise act without attachment, wishing for the welfare of the world.

हिन्दी

हे भारत ! कर्म में आसक्त हुए अज्ञानीजन जैसे कर्म करते हैं वैसे ही विद्वान् पुरुष अनासक्त होकर, लोकसंग्रह (लोक कल्याण) की इच्छा से कर्म करे।।

नेपाली

हे भारत! जसरी अज्ञानीहरू कर्ममा आसक्त भएर कर्म गर्छन्, त्यसैगरी विद्वान्ले लोकसङ्ग्रहको कामना गरेर अनासक्त भएर कर्म गर्नुपर्छ।

श्लोक 26 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम्। जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान् युक्तः समाचरन्

अंग्रेज़ी

Let no wise man unsettle the minds of ignorant people who are attached to action; he should engage them in all actions, himself fulfilling them with devotion.

हिन्दी

ज्ञानी पुरुष, कर्मों में आसक्त अज्ञानियों की बुद्धि में भ्रम उत्पन्न न करे, स्वयं (भक्ति से) युक्त होकर कर्मों का सम्यक् आचरण कर, उनसे भी वैसा ही कराये।।

नेपाली

कर्ममा आसक्त अज्ञानीहरूको बुद्धिलाई विचलित नगरोस्; ज्ञानी पुरुषले स्वयं कर्म गर्दै तिनलाई पनि कर्ममा प्रवृत्त गराओस्।

श्लोक 27 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः। अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताऽहमिति मन्यते

अंग्रेज़ी

All actions are wrought in all cases by the qualities of Nature alone. He whose mind is deluded by egoism thinks, "I am the doer."

हिन्दी

सम्पूर्ण कर्म प्रकृति के गुणों द्वारा किये जाते हैं, अहंकार से मोहित हुआ पुरुष,  "मैं कर्ता हूँ"  ऐसा मान लेता है।।

नेपाली

सम्पूर्ण कर्म प्रकृतिका गुणहरूद्वारा गराइन्छ; अहङ्कारले मोहित भएको मानिस 'म कर्ता हुँ' भन्ने ठान्छ।

श्लोक 28 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः। गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते

अंग्रेज़ी

But he who knows the Truth, O mighty-armed Arjuna, about the divisions of the qualities and their functions, knowing that the Gunas, as senses, move amidst the Gunas, as the sense-objects, is not attached.

हिन्दी

परन्तु हे महाबाहो ! गुण और कर्म के विभाग के सत्य (तत्त्व)को जानने वाला ज्ञानी पुरुष यह जानकर कि "गुण गुणों में बर्तते हैं" (कर्म में) आसक्त नहीं होता।।

नेपाली

हे महाबाहु! गुण-कर्म-विभागको तत्त्व जान्ने पुरुषले गुणहरू गुणहरूमा मात्र वर्तिरहेका छन् भनेर बुझेर त्यसमा आसक्त हुँदैन।

श्लोक 29 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

प्रकृतेर्गुणसम्मूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु। तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचालयेत्

अंग्रेज़ी

Those deluded by the qualities of Nature are attached to the functions of the qualities. The man of perfect knowledge should not unsettle the foolish one who is of imperfect knowledge.

हिन्दी

प्रकृति के गुणों से मोहित हुए पुरुष गुण और कर्म में आसक्त होते हैं, उन अपूर्ण ज्ञान वाले (अकृत्स्नविद:) मंदबुद्धि पुरुषों को पूर्ण ज्ञान प्राप्त पुरुष विचलित न करे।।

नेपाली

प्रकृतिका गुणले मोहित भएकाहरू गुण र कर्ममा आसक्त हुन्छन्; पूर्ण ज्ञानी मानिसले अल्पज्ञ मूढहरूलाई विचलित गर्नु हुँदैन।

श्लोक 30 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा। निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः

अंग्रेज़ी

Renouncing all actions in Me, with the mind centered on the Self, free from hope and egoism, and from mental fever, fight thou.

हिन्दी

सम्पूर्ण कर्मों का मुझ में संन्यास करके,  आशा और ममता से रहित होकर,  संतापरहित हुए तुम युद्ध करो।।

नेपाली

सम्पूर्ण कर्म मलाई समर्पण गरेर, आत्मामा चित्त राखेर, आशा र ममतारहित भएर र मानसिक उत्तापबाट मुक्त भएर युद्ध गर।

श्लोक 31 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः। श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः

अंग्रेज़ी

Those who constantly practice this teaching of Mine with faith and without caviling, they too are freed from actions.

हिन्दी

जो मनुष्य दोष बुद्धि से रहित (अनसूयन्त:) और श्रद्धा से युक्त हुए सदा मेरे इस मत (उपदेश) का अनुष्ठानपूर्वक पालन करते हैं, वे कर्मों से (बन्धन से) मुक्त हो जाते हैं।।

नेपाली

जो मेरो यस उपदेशलाई श्रद्धापूर्वक र दोषदृष्टिरहित भएर सधैँ अनुसरण गर्छन्, ती पनि कर्मबाट मुक्त हुन्छन्।

श्लोक 32 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम्। सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः

अंग्रेज़ी

But those who criticize My teaching and do not practice it, deprived of all knowledge and lacking discernment, know them to be doomed to destruction.

हिन्दी

परन्तु जो दोष दृष्टि वाले मूढ़ लोग इस मेरे मत का पालन नहीं करते, उन सब ज्ञानों में मोहित चित्तवालों को नष्ट हुये ही तुम समझो।।

नेपाली

तर मेरो यस उपदेशको दोष देखाएर पालना नगर्ने मूढहरूलाई सर्वज्ञानशून्य र अविवेकी जान — तिनको विनाश हुन्छ।

श्लोक 33 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि। प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति

अंग्रेज़ी

Even a wise man acts in accordance with his own nature; beings will follow their nature; what can restraint do?

हिन्दी

ज्ञानवान् पुरुष भी अपनी प्रकृति के अनुसार चेष्टा करता है। सभी प्राणी अपनी प्रकृति पर ही जाते हैं, फिर इनमें (किसी का) निग्रह क्या करेगा।।

नेपाली

ज्ञानी पुरुषले पनि आफ्नो प्रकृति अनुसार आचरण गर्छ; प्राणीहरू आफ्नो प्रकृति पछ्याउँछन्; निग्रहले मात्र के गर्न सक्छ?

श्लोक 34 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ। तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ

अंग्रेज़ी

Attachment and aversion for the objects of the senses abide in the senses; let no one come under their sway; for, they are his enemies.

हिन्दी

इन्द्रियइन्द्रिय (अर्थात् प्रत्येक इन्द्रिय) के विषय के प्रति (मन में) रागद्वेष रहते हैं;  मनुष्य को चाहिये कि वह उन दोनों के वश में न हो;  क्योंकि वे इसके (मनुष्य के) शत्रु हैं।।

नेपाली

इन्द्रिय-विषयमा राग र द्वेष इन्द्रियमा नै बस्छन्; ती दुवै शत्रु हुन् — तीसँग वशमा परिनु हुँदैन।

श्लोक 35 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्। स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः

अंग्रेज़ी

Better is one's own duty, though devoid of merit, than the duty of another well discharged. Better is death in one's own duty; the duty of another is fraught with fear.

हिन्दी

सम्यक् प्रकार से अनुष्ठित परधर्म की अपेक्षा गुणरहित स्वधर्म का पालन श्रेयष्कर है;  स्वधर्म में मरण कल्याणकारक है (किन्तु) परधर्म भय को देने वाला है।।

नेपाली

गुणरहित स्वधर्म पनि अरूको सुधर्मभन्दा श्रेयस्कर छ; स्वधर्ममा मर्नु राम्रो हो; पराधर्म भयङ्कर हुन्छ।

श्लोक 36 अर्जुन उवाच · अर्जुन कहते हैं
संस्कृत

अर्जुन उवाच अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः। अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः

अंग्रेज़ी

Arjuna said, "But what compels man to commit sin, even against his wishes, O Varshneya (Krishna), as if constrained by force?"

हिन्दी

अर्जुन ने कहा -- हे वार्ष्णेय ! फिर यह पुरुष बलपूर्वक बाध्य किये हुये के समान अनिच्छा होते हुये भी किसके द्वारा प्रेरित होकर पाप का आचरण करता है?

नेपाली

अर्जुनले भने — हे वार्ष्णेय! मानिसले इच्छा नहुँदा पनि कसले प्रेरित गरेझैँ बलजफ्ती पाप गर्न लागिपर्छ?

श्लोक 37 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

श्री भगवानुवाच काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः। महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम्

अंग्रेज़ी

The Blessed Lord said, "It is desire and it is anger, both of the quality of Rajas, all-devouring and all-sinful; know this as the foe here in this world."

हिन्दी

श्रीभगवान् ने कहा -- रजोगुण में उत्पन्न हुई यह 'कामना' है,  यही क्रोध है; यह महाशना (जिसकी भूख बड़ी हो) और महापापी है, इसे ही तुम यहाँ (इस जगत् में) शत्रु जानो।।

नेपाली

श्रीभगवान्ले भने — रजोगुणबाट उत्पन्न यो काम नै हो, अनि क्रोध नै हो — महाभोगी र महापापी; यसैलाई वैरी जान।

श्लोक 38 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

धूमेनाव्रियते वह्निर्यथाऽऽदर्शो मलेन च। यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम्

अंग्रेज़ी

As fire is enveloped by smoke, as a mirror is covered by dust, and as an embryo is surrounded by the amniotic sac, so is this enveloped by that.

हिन्दी

जैसे धुयें से अग्नि और धूलि से दर्पण ढक जाता है तथा जैसे भ्रूण गर्भाशय से ढका रहता है, वैसे उस (काम) के द्वारा यह (ज्ञान) आवृत होता है।।

नेपाली

जसरी आगो धूवाँले, ऐना धूलोले र भ्रूण गर्भले ढाकिएको हुन्छ, त्यसरी नै यो ज्ञान कामले ढाकिएको हुन्छ।

श्लोक 39 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा। कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च

अंग्रेज़ी

O Arjuna, wisdom is enveloped by this constant enemy of the wise, in the form of desire, which is insatiable like fire.

हिन्दी

हे कौन्तेय ! अग्नि के समान जिसको तृप्त करना कठिन है ऐसे कामरूप,  ज्ञानी के इस नित्य शत्रु द्वारा ज्ञान आवृत है।।

नेपाली

हे कौन्तेय! आगोझैँ अतृप्त रहने यस ज्ञानीहरूको शाश्वत शत्रु — कामले विवेकी पुरुषको ज्ञान ढाकिएको हुन्छ।

श्लोक 40 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते। एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम्

अंग्रेज़ी

The senses, the mind, and the intellect are said to be its seat; through these, it deludes the embodied one, veiling their wisdom.

हिन्दी

इन्द्रियाँ,  मन और बुद्धि इसके निवास स्थान कहे जाते हैं;  यह काम इनके द्वारा ही ज्ञान को आच्छादित करके देही पुरुष को मोहित करता है।।

नेपाली

इन्द्रिय, मन र बुद्धि यसका वासस्थान भनिएका छन्; यिनैद्वारा यो कामले ज्ञानलाई ढाकेर देहधारीलाई मोहित गर्छ।

श्लोक 41 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ। पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम्

अंग्रेज़ी

Therefore, O best of the Bharatas, control your senses first and then kill this sinful thing, which destroys knowledge and realization.

हिन्दी

इसलिये, हे अर्जुन ! तुम पहले इन्द्रियों को वश में करके, ज्ञान और विज्ञान के नाशक इस कामरूप पापी को नष्ट करो।।

नेपाली

हे भरतर्षभ! त्यसैले पहिले इन्द्रियलाई नियन्त्रणमा राख्दै ज्ञान र विज्ञान दुवैको नाशक यस पापीलाई संहार गर।

श्लोक 42 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः। मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः

अंग्रेज़ी

They say that the senses are superior to the body; the mind is superior to the senses; the intellect is superior to the mind; and He (the Self) is superior even to the intellect.

हिन्दी

(शरीर से) परे (श्रेष्ठ) इन्द्रियाँ कही जाती हैं;  इन्द्रियों से परे मन है और मन से परे बुद्धि है, और जो बुद्धि से भी परे है, वह है आत्मा।।

नेपाली

इन्द्रियहरूलाई शरीरभन्दा श्रेष्ठ भनिएको छ, इन्द्रियभन्दा मन, मनभन्दा बुद्धि, र बुद्धिभन्दा पनि श्रेष्ठ आत्मा हो।

श्लोक 43 श्रीभगवानुवाच · कृष्ण कहते हैं
संस्कृत

एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना। जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम्

अंग्रेज़ी

Thus, knowing Him who is superior to the intellect and restraining the self by the Self, slay thou, O mighty-armed Arjuna, the enemy in the form of desire, hard to conquer.

हिन्दी

इस प्रकार बुद्धि से परे (शुद्ध) आत्मा को जानकर आत्मा (बुद्धि) के द्वारा आत्मा (मन) को वश में करके, हे महाबाहो ! तुम इस दुर्जेय (दुरासदम्) कामरूप शत्रु को मारो।।

नेपाली

यसरी आत्मालाई बुद्धिभन्दा पनि श्रेष्ठ जानेर, आफ्नो आत्मालाई आत्माद्वारा वश गरी, हे महाबाहु! कामरूपी दुर्जय शत्रुलाई मार।