Chapter 90

Sambhava Parva — History of Yayati

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Verse 1
Sanskrit

अष्टक उवाच यदावसो नन्दने कामरूपी संवत्सराणामयुतं शतानाम्। किं कारणं कार्तयुगप्रधान हित्वा च त्वं वसुधामन्वपद्यः॥

English

Ashtaka said: O foremost man of the Krita Yuga, you having been able to assume any form at will, passed millions of years in the garden of Nandana. For what reason have you been compelled to leave that happy region and come here today?

Hindi

अष्टक ने कहा — हे कृतयुग के श्रेष्ठ पुरुष, इच्छानुसार कोई भी रूप धारण करने में समर्थ आपने नन्दन उद्यान में कोटि-कोटि वर्ष बिताए। किस कारण से आपको वह सुखमय लोक छोड़कर आज यहाँ आना पड़ा?

Nepali

अष्टकले भने — हे कृतयुगका श्रेष्ठ पुरुष, इच्छाअनुसार कुनै पनि रूप धारण गर्न समर्थ तपाईंले नन्दन उद्यानमा करोडौँ वर्ष बिताउनुभयो। कुन कारणले तपाईंलाई त्यो सुखमय लोक छाडेर आज यहाँ आउनुपर्‍यो?

indra
Verse 2
Sanskrit

ययातिरुवाच ज्ञातिः सुहृत् स्वजनो वा यथेह क्षीणे वित्ते त्यज्यते मानवैहि। तथा तत्र क्षीणपुण्यं मनुष्यं त्यजन्ति सद्यः सेश्वरा देवसङ्घाः॥

English

Yayati said : As relatives and kinsmen forsake in this world a man who has lost his wealth, so in the other world Indra and the celestials forsake one who loses his righteousness.

Hindi

ययाति ने कहा — जैसे इस लोक में धन खो देने वाले पुरुष को उसके सम्बन्धी और बन्धु-बान्धव छोड़ देते हैं, वैसे ही परलोक में इन्द्र और देवता उसे छोड़ देते हैं जो अपना धर्म खो देता है।

Nepali

ययातिले भने — जसरी यस लोकमा धन गुमाएको पुरुषलाई उसका आफन्त र बन्धुबान्धवले छाडिदिन्छन्, त्यसरी नै परलोकमा इन्द्र र देवताहरूले उसलाई छाडिदिन्छन् जसले आफ्नो धर्म गुमाउँछ।

Verse 3
Sanskrit

अष्टक उवाच तस्मिन् कथं क्षीणपुण्या भवन्ति सम्मुह्यते मेऽत्र मनोऽतिमात्रम्। किं वा विशिष्टाः कस्य धामोपयान्ति तदे वै ब्रूहि क्षेत्रवित् त्वं मतो मे॥

English

Ashtaka said: O king, I am very curious to learn how men can lose their righteousness in the other world. Tell me also what regions are attained by what means. I know you are acquainted with all the doings and the sayings.

Hindi

अष्टक ने कहा — हे राजन्, मुझे यह जानने की बड़ी उत्कण्ठा है कि परलोक में मनुष्य अपना धर्म कैसे खो सकते हैं। यह भी बताइए कि किन उपायों से कौन-से लोक प्राप्त होते हैं। मैं जानता हूँ कि आप समस्त कर्मों और वचनों के ज्ञाता हैं।

Nepali

अष्टकले भने — हे राजन्, मलाई यो जान्ने ठूलो उत्कण्ठा छ कि परलोकमा मानिसले आफ्नो धर्म कसरी गुमाउन सक्छन्। यो पनि भन्नुहोस् कि कुन उपायले कुन-कुन लोक प्राप्त हुन्छन्। म जान्दछु कि तपाईं सम्पूर्ण कर्म र वचनका ज्ञाता हुनुहुन्छ।

Verse 4
Sanskrit

ययातिरुवाच इमं भौमं नरकं ते पतन्ति लालप्यमाना नरदेव सर्वे। ते कङ्कगोमायुबलाशनार्थे क्षीणा विवृद्धिं बहुधा व्रजन्ति॥

English

Yayati said : O God-like man, they that speak of their own merits are doomed to the painful hell called Bhauma, (earth). Though really lean, they appear to grow (fat on earth) to become the food for vultures, dogs and jackals.

Hindi

ययाति ने कहा — हे देवतुल्य पुरुष, जो अपने ही गुणों का बखान करते हैं, वे भौम (पृथ्वी) नामक कष्टदायी नरक के भागी होते हैं। यद्यपि वस्तुतः वे दुर्बल हैं, तथापि वे (पृथ्वी पर) पुष्ट होते दिखाई देते हैं और गिद्धों, कुत्तों तथा गीदड़ों का भोजन बन जाते हैं।

Nepali

ययातिले भने — हे देवतुल्य पुरुष, जसले आफ्नै गुणको बखान गर्छन्, तिनीहरू भौम (पृथ्वी) नामक कष्टदायी नरकका भागी हुन्छन्। यद्यपि वास्तवमा तिनीहरू दुर्बल छन्, तापनि तिनीहरू (पृथ्वीमा) पुष्ट भएझैँ देखिन्छन् र गिद्ध, कुकुर तथा स्यालको भोजन बन्छन्।

Verse 5
Sanskrit

तस्मादेतद् वर्जनीयं नरेन्द्र दुष्टं लोके गर्हणीयं च कर्म। आख्यातं ते पार्थिव सर्वमेव भूयश्चेदानीं वद किं ते वदामि॥

English

Therefore, O king, this censurable and wicked vice should be cast off in this world. O king, I have now told you all. Tell me what more I shall speak.

Hindi

इसलिए हे राजन्, इस निन्दनीय और दुष्ट दोष को इस लोक में ही त्याग देना चाहिए। हे राजन्, मैंने अब आपको सब कुछ बता दिया। बताइए, मैं और क्या कहूँ?

Nepali

त्यसैले हे राजन्, यस निन्दनीय र दुष्ट दोषलाई यसै लोकमा त्याग्नुपर्छ। हे राजन्, मैले अब तपाईंलाई सबै कुरा भनिसकेँ। भन्नुहोस्, म अरू के भनूँ?

Verse 6
Sanskrit

अष्टक उवाच यदा तु तान् वितुदन्ते वयांसि तथा गृध्राः शितिकण्ठाः पतङ्गाः। कथं भवन्ति कथमाभवन्ति न भौममन्यं नरकं शृणोमि॥

English

Ashtaka said: When life is destroyed by age, vultures, Shitikantha, insects and worms eat up the human body, where does man then live? How does he come to life again? I have never heard of any hell called Bhauma.

Hindi

अष्टक ने कहा — जब वृद्धावस्था से जीवन नष्ट हो जाता है और गिद्ध, शितिकण्ठ, कीट तथा कृमि मनुष्य के शरीर को खा जाते हैं, तब मनुष्य कहाँ रहता है? वह पुनः जीवित कैसे होता है? मैंने भौम नामक किसी नरक के विषय में कभी नहीं सुना।

Nepali

अष्टकले भने — जब वृद्धावस्थाले जीवन नष्ट हुन्छ र गिद्ध, शितिकण्ठ, कीट तथा किराहरूले मानिसको शरीर खान्छन्, तब मानिस कहाँ रहन्छ? ऊ पुनः जीवित कसरी हुन्छ? मैले भौम नामक कुनै नरकका विषयमा कहिल्यै सुनेको छैन।

Verse 7
Sanskrit

ययातिरुवाच ऊर्ध्वं देहात् कर्मणा जृम्भमाणाद् व्यक्तं पृथिव्यामनुसंचरन्ति। इमं भौमं नरकं ते पतन्ति नावेक्षन्ते वर्षपूगाननेकान्॥

English

Yayati said : When the body is destroyed (by death), man, according to the effects of his acts, is born again in the womb of his mother. He stays there in an indistinct form and he then gradually assumes distinct and visible form. He then reappears and walks on the earth. Thus he falls into the hell Bhauma (earth) and does not see the end of his existence.

Hindi

ययाति ने कहा — जब (मृत्यु से) शरीर नष्ट हो जाता है, तब मनुष्य अपने कर्मों के फल के अनुसार पुनः अपनी माता के गर्भ में जन्म लेता है। वहाँ वह अव्यक्त रूप में रहता है और फिर धीरे-धीरे व्यक्त और दृश्य रूप धारण करता है। तब वह पुनः प्रकट होकर पृथ्वी पर विचरता है। इस प्रकार वह भौम (पृथ्वी) नरक में गिरता है और अपने अस्तित्व का अन्त नहीं देख पाता।

Nepali

ययातिले भने — जब (मृत्युले) शरीर नष्ट हुन्छ, तब मानिस आफ्ना कर्मको फलअनुसार पुनः आफ्नी आमाको गर्भमा जन्म लिन्छ। त्यहाँ ऊ अव्यक्त रूपमा रहन्छ र त्यसपछि बिस्तारै व्यक्त र दृश्य रूप धारण गर्छ। तब ऊ पुनः प्रकट भई पृथ्वीमा विचरण गर्छ। यसरी ऊ भौम (पृथ्वी) नरकमा खस्छ र आफ्नो अस्तित्वको अन्त्य देख्न पाउँदैन।

Verse 8
Sanskrit

षष्टिं सहस्राणि पतन्ति व्योम्नि तथा अशीतिं परिवत्सराणि तान् वै तुदन्ति पततः प्रपातं भीमा भौमा राक्षसास्तीक्ष्णदंष्ट्राः॥

English

Some thus falling live for sixty thousand years in the firmament; some again for eighty thousand years. They then fall (on this earth) and they are attacked by fearful Bhauma Rakshasas of sharp teeth.

Hindi

इस प्रकार गिरने वाले कुछ प्राणी साठ सहस्र वर्ष तक आकाश में रहते हैं; कुछ अस्सी सहस्र वर्ष तक। तब वे (इस पृथ्वी पर) गिरते हैं और तीखे दाँतों वाले भयंकर भौम राक्षस उन पर आक्रमण करते हैं।

Nepali

यसरी खस्ने केही प्राणी साठी हजार वर्षसम्म आकाशमा रहन्छन्; केही असी हजार वर्षसम्म। तब तिनीहरू (यस पृथ्वीमा) खस्छन् र धारिला दाँत भएका भयंकर भौम राक्षसहरूले तिनीमाथि आक्रमण गर्छन्।

Verse 9
Sanskrit

अष्टक उवाच यदेनसस्ते पततस्तुदन्ति भीमा भौमा राक्षसास्तीक्ष्णदंष्ट्राः। कथं भवन्ति कथमाभवन्ति कथंभूता गर्भभूता भवन्ति॥

English

Ashtaka said : Why are men, when thus falling from heaven, attacked by these fearful and sharpteethed Rakshasas? Why are they not annihilated? How do they again enter the womb?

Hindi

अष्टक ने कहा — स्वर्ग से इस प्रकार गिरते समय मनुष्यों पर ये भयंकर और तीखे दाँतों वाले राक्षस आक्रमण क्यों करते हैं? वे नष्ट क्यों नहीं हो जाते? वे पुनः गर्भ में कैसे प्रवेश करते हैं?

Nepali

अष्टकले भने — स्वर्गबाट यसरी खस्दा मानिसमाथि यी भयंकर र धारिला दाँत भएका राक्षसहरूले किन आक्रमण गर्छन्? तिनीहरू नष्ट किन हुँदैनन्? तिनीहरू पुनः गर्भमा कसरी प्रवेश गर्छन्?

Verse 10
Sanskrit

ययातिरुवाच मन्वेति तद् वै पुरुषेण सृष्टम्। स वै तस्या रज आपद्यते वै स गर्भभूतः समुपैति तत्र॥ वनस्पतीनोषधीश्चाविशन्ति अपो वायुं पृथिवीं चान्तरिक्षम्। मेवम्भूता गर्भभूता भवन्ति॥

English

Yayati said : All beings, thus fallen from heaven, become subtle substance, living in water. This water subsequently becomes the semen from which life is created. It then enters the womb of a woman in her season and develops into the embryo. It then becomes visible life like the fruit from the flower. Entering into trees, plants, vegetables, water, air, earth and space, the watery seed of life becomes quadrupeds of bipeds. This is the case with all creatures.

Hindi

ययाति ने कहा — इस प्रकार स्वर्ग से गिरे हुए समस्त प्राणी सूक्ष्म पदार्थ बन जाते हैं और जल में निवास करते हैं। यह जल आगे चलकर वह वीर्य बनता है जिससे जीवन उत्पन्न होता है। तब वह ऋतुकाल में स्त्री के गर्भ में प्रवेश करता है और भ्रूण के रूप में विकसित होता है। फिर वह पुष्प से फल के समान प्रत्यक्ष जीवन बन जाता है। वृक्षों, पौधों, वनस्पतियों, जल, वायु, पृथ्वी और आकाश में प्रवेश करके जीवन का वह जलीय बीज चतुष्पद अथवा द्विपद बन जाता है। समस्त प्राणियों के साथ यही होता है।

Nepali

ययातिले भने — यसरी स्वर्गबाट खसेका सम्पूर्ण प्राणी सूक्ष्म पदार्थ बन्छन् र जलमा बस्छन्। यो जल पछि गएर त्यो वीर्य बन्छ जसबाट जीवन उत्पन्न हुन्छ। तब त्यो ऋतुकालमा स्त्रीको गर्भमा प्रवेश गर्छ र भ्रूणका रूपमा विकसित हुन्छ। त्यसपछि त्यो पुष्पबाट फलझैँ प्रत्यक्ष जीवन बन्छ। वृक्ष, बिरुवा, वनस्पति, जल, वायु, पृथ्वी र आकाशमा प्रवेश गरेर जीवनको त्यो जलीय बीज चतुष्पद अथवा द्विपद बन्छ। सम्पूर्ण प्राणीका हकमा यही हुन्छ।

Verse 11
Sanskrit

अष्टक उवाच मुताहोस्वित् स्वेन कायेन याति। माचक्ष्व मे संशयात् प्रब्रवीमि॥ शरीरभेदाभिसमुच्छ्रयं च चक्षुःश्रोत्रे लभते केन संज्ञाम्। एतत् तत्त्वं सर्वमाचक्ष्व पृष्टः क्षेत्रज्ञं त्वां तात मन्याम सर्वे॥

English

Ashtaka said: Does a being who has got a human form enter the womb in its own shape or in some other? How does it acquire its distinct and visible shape, its eyes, ears and consciousness? Tell me all this, I ask you, because I have my doubts.

Hindi

अष्टक ने कहा — जिस प्राणी ने मनुष्य का रूप पाया है, वह गर्भ में अपने ही रूप में प्रवेश करता है अथवा किसी अन्य रूप में? वह अपना व्यक्त और दृश्य रूप, अपने नेत्र, कान और चेतना कैसे प्राप्त करता है? मुझे यह सब बताइए; मैं आपसे पूछता हूँ, क्योंकि मुझे सन्देह है।

Nepali

अष्टकले भने — जुन प्राणीले मानिसको रूप पाएको छ, ऊ गर्भमा आफ्नै रूपमा प्रवेश गर्छ कि कुनै अर्को रूपमा? उसले आफ्नो व्यक्त र दृश्य रूप, आफ्ना आँखा, कान र चेतना कसरी प्राप्त गर्छ? मलाई यो सबै भन्नुहोस्; म तपाईंसँग सोध्छु, किनकि मलाई सन्देह छ।

Verse 12
Sanskrit

ययातिरुवाच वायुः समुत्कर्षति गर्भयोनिमृतौ रेत: पुष्परसानुपृक्तम्। स तत्र तन्मात्रकृताधिकारः। क्रमेण संवर्धयतीह गर्भम्॥

English

Yayati said: The being that remains in a subtle form in the seed, when dropped into the womb, is attracted by atmospheric force for purposes of rebirth, according to the merits of one's acts.

Hindi

ययाति ने कहा — जो प्राणी बीज में सूक्ष्म रूप से रहता है, वह गर्भ में गिराए जाने पर अपने कर्मों के फल के अनुसार पुनर्जन्म के लिए वायव्य शक्ति द्वारा आकृष्ट होता है।

Nepali

ययातिले भने — जुन प्राणी बीजमा सूक्ष्म रूपले रहन्छ, ऊ गर्भमा खसालिँदा आफ्ना कर्मको फलअनुसार पुनर्जन्मका लागि वायव्य शक्तिद्वारा आकर्षित हुन्छ।

Verse 13
Sanskrit

स जायमानो विगृहीतमात्रः संज्ञामधिष्ठाय ततो मनुष्यः। स श्रोत्राभ्यां वेदयतीह शब्दं स वै रूपं पश्यति चक्षुषा च॥ घ्राणेन गन्धं जिह्वयाथो रसं च त्वचा स्पर्श मनसा वेद भावम्। इत्यष्टकेहोपहितं हि विद्धि महात्मनां प्राणभृतां शरीरे॥

English

He then develops in course of time into the embryo. He is then furnished with the visible organisation. Coming out of the womb in course of time, he becomes conscious of his existence. He then becomes sensible of sound by his ears, of colour and form by his eyes, of scent by his nose, of taste by his tongue, of touch by his whole body and of ideas by his mind. O Ashtaka, it is thus that the gross and visible body develops from the subtle essence.

Hindi

तब वह समय के साथ भ्रूण के रूप में विकसित होता है। फिर उसे दृश्य अवयव प्राप्त होते हैं। समय आने पर गर्भ से बाहर आकर वह अपने अस्तित्व के प्रति सचेत होता है। तब वह कानों से शब्द, नेत्रों से रूप और वर्ण, नासिका से गन्ध, जिह्वा से रस, समस्त शरीर से स्पर्श और मन से विचारों का अनुभव करने लगता है। हे अष्टक, इसी प्रकार सूक्ष्म तत्त्व से स्थूल और दृश्य शरीर विकसित होता है।

Nepali

तब ऊ समयसँगै भ्रूणका रूपमा विकसित हुन्छ। त्यसपछि उसलाई दृश्य अवयव प्राप्त हुन्छन्। समय आएपछि गर्भबाट बाहिर आएर ऊ आफ्नो अस्तित्वप्रति सचेत हुन्छ। तब ऊ कानले शब्द, आँखाले रूप र वर्ण, नाकले गन्ध, जिब्रोले रस, सम्पूर्ण शरीरले स्पर्श र मनले विचारको अनुभव गर्न थाल्छ। हे अष्टक, यसै प्रकारले सूक्ष्म तत्त्वबाट स्थूल र दृश्य शरीर विकसित हुन्छ।

Verse 14
Sanskrit

अष्टक उवाच यः संस्थितः पुरुषो दह्यते वा निखन्यते वापि निकृष्यते वा। अभावभूतः स विनाशमेत्य केनात्मना चेतयते परस्तात्॥

English

Ashtaka said: The body is burnt, buried of otherwise destroyed after death. Reduced to nothing on one's death, by what principle is one again revived.

Hindi

अष्टक ने कहा — मृत्यु के पश्चात् शरीर जला दिया जाता है, गाड़ दिया जाता है अथवा किसी अन्य प्रकार से नष्ट कर दिया जाता है। मृत्यु के साथ शून्य में मिल जाने पर मनुष्य किस तत्त्व से पुनः जीवित होता है?

Nepali

अष्टकले भने — मृत्युपछि शरीर जलाइन्छ, गाडिन्छ अथवा कुनै अर्को प्रकारले नष्ट पारिन्छ। मृत्युसँगै शून्यमा विलीन भएपछि मानिस कुन तत्त्वले पुनः जीवित हुन्छ?

Verse 15
Sanskrit

भवन्ति पापा ययातिरुवाच हित्वा सोऽसून् सुप्तवन्निष्टनित्वा पुरोधाय सुकृतं दुष्कृतं वा। अन्यां योनि पवनाग्रानुसारी हित्वा देहं भजते राजसिंह॥

English

Yayati said : O lion of kings, the man who dies, assumes a subtle form, but he retains the consciousness of all his acts as if in a dream. He then assumes some other form with a quicker speed than that of air.

Hindi

ययाति ने कहा — हे राजसिंह, जो मनुष्य मरता है वह सूक्ष्म रूप धारण करता है, किन्तु स्वप्न के समान अपने समस्त कर्मों की चेतना बनाए रखता है। तब वह वायु से भी अधिक वेग से कोई अन्य रूप धारण कर लेता है।

Nepali

ययातिले भने — हे राजसिंह, जुन मानिस मर्छ ऊ सूक्ष्म रूप धारण गर्छ, तर सपनाजस्तै आफ्ना सम्पूर्ण कर्मको चेतना कायमै राख्छ। तब ऊ वायुभन्दा पनि छिटो वेगले कुनै अर्को रूप धारण गर्छ।

Verse 16
Sanskrit

पुण्यां योनि पुण्यकृतो व्रजन्ति पापां योनि पापकृतो व्रजन्ति। कीटाः पतङ्गाश्च न मे विवक्षास्ति महानुभाव॥ चतुष्पदा द्विपदाः षट्पदाश्च तथाभूता गर्भभूता भवन्ति। आख्यातमेतन्निखिलेन सर्वं भूयस्तु किं पृच्छसि राजसिंह॥

English

The virtuous attain to a superior and the vicious to an inferior form of existence. The vicious becomes worms and insects. O illustrious one, I have nothing more to say. I have told you, how beings are born by the development of their embryonic formas quadrupeds, bipeds and six-footed creatures. What more will you ask me?

Hindi

धर्मात्मा श्रेष्ठ योनि प्राप्त करते हैं और पापी हीन योनि। पापी कीट और कृमि बन जाते हैं। हे यशस्वी, मुझे और कुछ नहीं कहना है। मैंने आपको बता दिया कि प्राणी अपने भ्रूणरूप के विकास से चतुष्पद, द्विपद और षट्पद जीवों के रूप में कैसे जन्म लेते हैं। अब आप मुझसे और क्या पूछेंगे?

Nepali

धर्मात्माले श्रेष्ठ योनि प्राप्त गर्छन् र पापीले हीन योनि। पापीहरू कीट र किरा बन्छन्। हे यशस्वी, मलाई अरू केही भन्नु छैन। मैले तपाईंलाई भनिसकेँ कि प्राणीहरू आफ्नो भ्रूणरूपको विकासबाट चतुष्पद, द्विपद र षट्पद जीवका रूपमा कसरी जन्म लिन्छन्। अब तपाईं मसँग अरू के सोध्नुहुन्छ?

Verse 17
Sanskrit

अष्टक उवाच किंस्वित् कृत्वा लभते तात लोकान् मर्त्यः श्रेष्ठांस्तपसा विद्यया वा। च्छुभाँल्लोकान् येन गच्छेत् क्रमेण॥

English

Ashtaka said: O sire, how does a man attain to those higher regions whence there is no return to earthly life again? Is it by asceticism or knowledge? How does a man attain to the region of the highest bliss? As I ask you, tell me all.

Hindi

अष्टक ने कहा — हे तात, मनुष्य उन उच्च लोकों को कैसे प्राप्त करता है जहाँ से पुनः पार्थिव जीवन में लौटना नहीं होता? क्या यह तप से होता है अथवा ज्ञान से? मनुष्य परम आनन्द के लोक को कैसे प्राप्त करता है? मैं आपसे पूछता हूँ, मुझे सब बताइए।

Nepali

अष्टकले भने — हे तात, मानिसले ती उच्च लोक कसरी प्राप्त गर्छ जहाँबाट पुनः पार्थिव जीवनमा फर्कनु पर्दैन? के यो तपले हुन्छ कि ज्ञानले? मानिसले परम आनन्दको लोक कसरी प्राप्त गर्छ? म तपाईंसँग सोध्छु, मलाई सबै भन्नुहोस्।

Verse 18
Sanskrit

ययातिरुवाच तपश्च दानं च शमो दमश्च हीरार्जवं सर्वभूतानुकम्पा। स्वर्गस्य लोकस्य वदन्ति सन्तो द्वाराणि सप्तैव महान्ति पुंसाम्। नश्यन्ति मानेन तमोऽभिभूताः पुंसः सदैवेति वदन्ति सन्तः॥

English

Yayati said ; The wise say that there are seven gates through which admission might be gained to heaven. These are asceticism, gift, tranquility of mind, self-command, modesty, simplicity and kindness. A person loses all this in consequence of vanity.

Hindi

ययाति ने कहा — बुद्धिमान् कहते हैं कि स्वर्ग में प्रवेश के सात द्वार हैं — तप, दान, मन की शान्ति, आत्मसंयम, लज्जा, सरलता और दया। किन्तु अभिमान के कारण मनुष्य इन सबको खो देता है।

Nepali

ययातिले भने — बुद्धिमान्हरू भन्छन् कि स्वर्गमा प्रवेशका सात ढोका छन् — तप, दान, मनको शान्ति, आत्मसंयम, लाज, सरलता र दया। तर अभिमानका कारण मानिसले यी सबै गुमाउँछ।

brahma
Verse 19
Sanskrit

अधीयानः पण्डितं मन्यमानो यो विद्यया हन्ति यशः परेषाम्। तस्यान्तवन्तश्च भवन्ति लोका न चास्य तद् ब्रह्म फलं ददाति॥

English

The man who, having acquired knowledge, regards himself as learned and destroys, the reputation of others by his learning, never goes to the region of the highest bliss. It does not also give him the power of attaining to Brahma.

Hindi

जो पुरुष ज्ञान प्राप्त करके अपने-आपको विद्वान् मानता है और अपनी विद्या से दूसरों की कीर्ति नष्ट करता है, वह कभी परम आनन्द के लोक को नहीं जाता। वह विद्या उसे ब्रह्म की प्राप्ति की शक्ति भी नहीं देती।

Nepali

जुन पुरुषले ज्ञान प्राप्त गरेर आफूलाई विद्वान् ठान्छ र आफ्नो विद्याले अरूको कीर्ति नष्ट पार्छ, ऊ कहिल्यै परम आनन्दको लोकमा जाँदैन। त्यो विद्याले उसलाई ब्रह्मप्राप्तिको शक्ति पनि दिँदैन।

Verse 20
Sanskrit

चत्वारि कर्माण्यभयंकराणि भयं प्रयच्छन्त्ययथाकृतानि। मानाग्निहोत्रमुत मानमौनं मानेनाधीतमुत पानयज्ञः॥

English

Study, taciturnity, worship before fire and sacrifices, these are the four means through which fear is removed. But when these four are mixed with vanity, they cause fear instead of removing it.

Hindi

अध्ययन, मौन, अग्निपूजा और यज्ञ — ये चार भय दूर करने के साधन हैं। किन्तु जब ये चारों अभिमान से मिश्रित हो जाते हैं, तब वे भय दूर करने के बदले भय उत्पन्न करते हैं।

Nepali

अध्ययन, मौन, अग्निपूजा र यज्ञ — यी चार भय हटाउने साधन हुन्। तर जब यी चारै अभिमानसँग मिसिन्छन्, तब तिनले भय हटाउनुको सट्टा भय उत्पन्न गर्छन्।

Verse 21
Sanskrit

न मानमान्यो मुदमाददीत न संतापं प्राप्नुयाचावमानात्। सन्तः सतः पूजयन्तीह लोके नासाधवः साधुबुद्धिं लभन्ते॥ इति दद्यामित यज इत्यधीय इति व्रतम्। इत्येतानि भयान्याहुस्तानि वानि सर्वशः॥

English

The wise should never feel pride in receiving honours, nor should they be sorry if insulted. For it is the wise alone that honour the wise; the wicked and vicious can never act like the virtuous. I have given so much, I have performed so many sacrifices, I have studied so much, I have observed so many vows, such vanity and pride are the roots of all fear. Therefore, it must be abandoned by all means.

Hindi

बुद्धिमान् को सम्मान पाकर कभी गर्व नहीं करना चाहिए और अपमानित होने पर शोक भी नहीं करना चाहिए; क्योंकि बुद्धिमान् ही बुद्धिमान् का आदर करते हैं — दुर्जन और पापी कभी सज्जनों के समान आचरण नहीं कर सकते। "मैंने इतना दान किया, मैंने इतने यज्ञ किए, मैंने इतना अध्ययन किया, मैंने इतने व्रत किए" — ऐसा अभिमान और गर्व समस्त भय की जड़ है। इसलिए इसे सब प्रकार से त्याग देना चाहिए।

Nepali

बुद्धिमान्ले सम्मान पाएर कहिल्यै गर्व गर्नु हुँदैन र अपमानित हुँदा शोक पनि गर्नु हुँदैन; किनकि बुद्धिमान्ले नै बुद्धिमान्को आदर गर्छन् — दुर्जन र पापीले कहिल्यै सज्जनजस्तो आचरण गर्न सक्दैनन्। "मैले यति दान गरेँ, मैले यति यज्ञ गरेँ, मैले यति अध्ययन गरेँ, मैले यति व्रत गरेँ" — यस्तो अभिमान र गर्व सम्पूर्ण भयको जरा हो। त्यसैले यसलाई सबै प्रकारले त्याग्नुपर्छ।

brahma
Verse 22
Sanskrit

ये चाश्रयं वेदयन्ते पुराणं मनीषिणो मानसमार्गरुद्धम्। तद्वः श्रेयस्तेन संयोगमेत्य परां शान्तिं प्राप्नुयुः प्रेत्य चेह॥

English

Those learned men who accept as their only support the unchangeable and inconceivable Brahma, Brahma that showers blessings on persons virtuous as you are, enjoy perfect peace here in this world and hereafter in heaven.

Hindi

जो विद्वान् पुरुष अपरिवर्तनीय और अचिन्त्य ब्रह्म को ही अपना एकमात्र आश्रय स्वीकार करते हैं — वह ब्रह्म जो आप जैसे धर्मात्माओं पर कृपा की वर्षा करता है — वे इस लोक में और आगे स्वर्ग में भी पूर्ण शान्ति भोगते हैं।

Nepali

जुन विद्वान् पुरुषले अपरिवर्तनीय र अचिन्त्य ब्रह्मलाई नै आफ्नो एकमात्र आश्रय स्वीकार गर्छन् — त्यो ब्रह्म जसले तपाईंजस्ता धर्मात्मामाथि कृपाको वर्षा गर्छ — तिनीहरूले यस लोकमा र पछि स्वर्गमा पनि पूर्ण शान्ति भोग्छन्।