Chapter 4

Jnana Karma Sanyasa Yoga

The fourth chapter of the Bhagavad Gita is "Jnana Karma Sanyasa Yoga". In this chapter, Krishna glorifies the Karma Yoga and imparts the Transcendental Knowledge (the knowledge of the soul and the Ultimate Truth) to Arjuna. He reveals the reason behind his appearance in this material world. He reveals that even though he is eternal, he reincarnates time after time to re-establish dharma and peace on this Earth. His births and activities are eternal and are never contaminated by material flaws. Those persons who know and understand this Truth engage in his devotion with full faith and eventually attain Him. They do not have to take birth in this world again.

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Verse 1 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

श्री भगवानुवाच इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्। विवस्वान् मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्

English

The Blessed Lord said, "I taught this imperishable Yoga to Vivasvan; he then told it to Manu; Manu proclaimed it to Ikshvaku.

Hindi

श्रीभगवान् ने कहा ---  मैंने इस अविनाशी योग को विवस्वान् (सूर्य देवता) से कहा (सिखाया);  विवस्वान् ने मनु से कहा;  मनु ने इक्ष्वाकु से कहा।।

Nepali

श्रीभगवान्ले भने — मैले यो अविनाशी योग सूर्य (विवस्वान्)लाई बताएको थिएँ; उनले मनुलाई बताए, अनि मनुले इक्ष्वाकुलाई।

Verse 2 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः। स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप

English

This, handed down in regular succession by the royal sages, was known. This Yoga, however, has been lost here over time, O Parantapa (burner of the foes).

Hindi

इस प्रकार परम्परा से प्राप्त हुये इस योग को राजर्षियों ने जाना, (परन्तु) हे परन्तप ! वह योग बहुत काल (के अन्तराल) से यहाँ (इस लोक में) नष्टप्राय हो गया।।

Nepali

यसरी परम्परागत रूपमा राजर्षिहरूले यो योग जानेका थिए; तर हे परन्तप! कालक्रममा यो लोकमा लोप भयो।

Verse 3 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः। भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम्

English

That same ancient yoga has been today taught to you by me, for you are my devotee and my friend; it is the supreme secret.

Hindi

वह ही यह पुरातन योग आज मैंने तुम्हें कहा (सिखाया) क्योंकि तुम मेरे भक्त और मित्र हो। यह उत्तम रहस्य है।।

Nepali

त्यही पुरातन योग मैले आज तिमीलाई भनेको हुँ, किनकि तिमी मेरा भक्त र मित्र हौ; यो परम रहस्य हो।

Verse 4 अर्जुन उवाच · Arjuna speaks
Sanskrit

अर्जुन उवाच अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः। कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति

English

Arjuna said, "Later was Thy birth, and prior to it was the birth of Vivasvan (the Sun); how am I to understand that Thou hast taught this Yoga from the beginning?"

Hindi

अर्जुन ने कहा -- आपका जन्म अपर अर्थात् पश्चात का है और विवस्वान् का जन्म (आपके) पूर्व का है, इसलिये यह मैं कैसे जानूँ कि (सृष्टि के) आदि में आपने (इस योग को) कहा था?

Nepali

अर्जुनले भने — तपाईंको जन्म त पछिको हो, सूर्यको जन्म अघिको हो; तपाईंले नै पहिले यो उपदेश दिनुभएको थियो भन्ने कुरा म कसरी बुझूँ?

Verse 5 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

श्री भगवानुवाच बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन। तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप

English

The Blessed Lord said, "Many births of Mine have passed, as well as of thine, O Arjuna; I know them all, but thou knowest not, O Parantapa (scorcher of foes)."

Hindi

श्रीभगवान् ने कहा -- हे अर्जुन ! मेरे और तुम्हारे बहुत से जन्म हो चुके हैं, (परन्तु) हे परन्तप ! उन सबको मैं जानता हूँ और तुम नहीं जानते।।

Nepali

श्रीभगवान्ले भने — हे अर्जुन! मेरा र तिम्रा धेरै जन्म भइसकेका छन्; ती सबै म जान्दछु, तर हे परन्तप! तिमीले जान्दैनौ।

Verse 6 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्। प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय संभवाम्यात्ममायया

English

Though I am unborn and of imperishable nature, and though I am the Lord of all beings, yet, governing my own nature, I am born by my own Maya.

Hindi

यद्यपि मैं अजन्मा और अविनाशी स्वरूप हूँ और भूतमात्र का ईश्वर हूँ (तथापि) अपनी प्रकृति को अपने अधीन रखकर (अधिष्ठाय) मैं अपनी माया से जन्म लेता हूँ।।

Nepali

म अजन्मा र अव्यय स्वभावको हुँ, सम्पूर्ण प्राणीको ईश्वर हुँ; तरै पनि आफ्नो प्रकृतिलाई आधिन गरेर आफ्नै योगमायाद्वारा प्रकट हुन्छु।

Verse 7 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदाऽऽत्मानं सृजाम्यहम्

English

Whenever there is a decline of righteousness and an increase of unrighteousness, O Arjuna, then I manifest Myself.

Hindi

हे भारत ! जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है,  तब-तब मैं स्वयं को प्रकट करता हूँ।।

Nepali

हे भारत! जब-जब धर्मको ह्रास र अधर्मको अभ्युत्थान हुन्छ, तब-तब म आफूलाई प्रकट गर्छु।

Verse 8 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे

English

For the protection of the good, for the destruction of the wicked, and for the establishment of righteousness, I am born in every age.

Hindi

साधु पुरुषों के रक्षण,  दुष्कृत्य करने वालों के नाश,  तथा धर्म संस्थापना के लिये,  मैं प्रत्येक युग में प्रगट होता हूँ।।

Nepali

साधुहरूको रक्षा गर्न, दुष्टहरूको विनाश गर्न र धर्मको स्थापना गर्न म युग-युगमा अवतरित हुन्छु।

Verse 9 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः। त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन

English

He who thus knows, in their true light, My divine birth and actions, having abandoned the body, is not born again; he comes to Me, O Arjuna.

Hindi

हे अर्जुन ! मेरा जन्म और कर्म दिव्य है,  इस प्रकार जो पुरुष तत्त्वत:  जानता है, वह शरीर को त्यागकर फिर जन्म को नहीं प्राप्त होता;  वह मुझे ही प्राप्त होता है।।

Nepali

हे अर्जुन! जसले मेरो यो दिव्य जन्म र कर्मलाई यथार्थ रूपमा जान्दछ, त्यो शरीर त्यागेपछि पुनः जन्म लिँदैन — मलाई नै प्राप्त गर्छ।

Verse 10 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः। बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः

English

Freed from attachment, fear, and anger, absorbed in Me, taking refuge in Me, purified by the fire of knowledge, many have attained My Being.

Hindi

राग भय और क्रोध से रहित मनमय मेरे शरण हुए बहुत से पुरुष ज्ञान रुप तप से पवित्र‌ हुए मेरे स्वरुप को प्राप्त हुए हैं।।

Nepali

राग, भय र क्रोधबाट मुक्त, ममा अनुरक्त, ममा शरण लिएका, ज्ञानरूपी तपस्याले शुद्ध भएका धेरैले मेरो स्वरूप प्राप्त गरेका छन्।

Verse 11 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्। मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः

English

In whatever way men approach Me, even so do I reward them; My path do men tread in all ways, O Arjuna.

Hindi

जो मुझे जैसे भजते हैं,  मैं उन पर वैसे ही अनुग्रह करता हूँ;  हे पार्थ सभी मनुष्य सब प्रकार से, मेरे ही मार्ग का अनुवर्तन करते हैं।।

Nepali

जुन प्रकारले मानिसहरू मलाई भज्छन्, त्यही प्रकारले म तिनलाई आश्रय दिन्छु; हे पार्थ! मानिसहरूले सबै प्रकारले मेरै मार्ग अनुसरण गर्छन्।

Verse 12 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः। क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा

English

Those who long for success in action in this world sacrifice to the gods; for success is quickly attained by men through action.

Hindi

(सामान्य मनुष्य) यहाँ (इस लोक में) कर्मों के फल को चाहते हुये देवताओं को पूजते हैं;  क्योंकि मनुष्य लोक में कर्मों के फल शीघ्र ही प्राप्त होते हैं।।

Nepali

यस लोकमा कर्मसिद्धि चाहने मानिसहरू देवताहरूलाई पूज्छन्; किनकि मानवलोकमा कर्मफल चाँडै नै प्राप्त हुन्छ।

Verse 13 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः। तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम्

English

The fourfold caste has been created by Me according to the differentiation of Guna and Karma; though I am the author of it, know Me as non-doer and immutable.

Hindi

गुण और कर्मों के विभाग से चातुर्वण्य मेरे द्वारा रचा गया है। यद्यपि मैं उसका कर्ता हूँ, तथापि तुम मुझे अकर्ता और अविनाशी जानो।।

Nepali

गुण र कर्म अनुसार चार वर्णको रचना मैले गरेको हुँ; यसको कर्ता भए पनि मलाई अकर्ता र अव्यय जान।

Verse 14 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा। इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते

English

Actions do not taint Me, nor do I have a desire for the fruit of actions. He who knows Me thus is not bound by actions.

Hindi

कर्म मुझे लिप्त नहीं करते;  न मुझे कर्मफल में स्पृहा है। इस प्रकार मुझे जो जानता है, वह भी कर्मों से नहीं बन्धता है।।

Nepali

मलाई कर्मले लिप्त गर्दैन, र मलाई कर्मफलको स्पृहा छैन; जसले मलाई यसरी जान्छ, त्यो कर्मले बाँधिँदैन।

Verse 15 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः। कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम्

English

Having known this, the ancient seekers of freedom also performed action; therefore, do thou also perform action, as the ancients did in days of yore.

Hindi

पूर्व के मुमुक्ष पुरुषों द्वारा भी इस प्रकार जानकर ही कर्म किया गया है;  इसलिये तुम भी पूर्वजों द्वारा सदा से किये हुए कर्मों को ही करो।।

Nepali

यही जानेर पूर्वकालका मुमुक्षुहरूले पनि कर्म गरेका थिए; त्यसैले तिमीले पनि पूर्वजहरूले गरे जस्तै कर्म गर।

Verse 16 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः। तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्

English

What is action? What is inaction? Even the wise are confused about this. Therefore, I shall teach you the nature of action and inaction, by knowing which you will be liberated from the evil of Samsara, the wheel of birth and death.

Hindi

कर्म क्या है और अकर्म क्या है? इस विषय में बुद्धिमान पुरुष भी भ्रमित हो जाते हैं। इसलिये मैं तुम्हें कर्म कहूँगा,  (अर्थात् कर्म और अकर्म का स्वरूप समझाऊँगा) जिसको जानकर तुम अशुभ (संसार बन्धन) से मुक्त हो जाओगे।।

Nepali

कर्म के हो र अकर्म के हो — यसमा विद्वान्हरू पनि मोहित छन्; त्यसैले म तिमीलाई कर्मको त्यो स्वरूप बताउँछु जुन जानेर तिमी अशुभबाट मुक्त हुनेछौ।

Verse 17 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः। अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः

English

For verily, the true nature of action enjoined by the scriptures should be known, as well as that of forbidden or unlawful action, and of inaction; the nature of action is hard to understand.

Hindi

कर्म का (स्वरूप) जानना चाहिये और विकर्म का (स्वरूप) भी जानना चाहिये ; (बोद्धव्यम्) तथा अकर्म का भी (स्वरूप) जानना चाहिये (क्योंकि) कर्म की गति गहन है।।

Nepali

कर्मको स्वरूप जान्नुपर्छ; विकर्म (निषिद्ध कर्म) र अकर्म (निष्क्रियता) को पनि स्वरूप जान्नुपर्छ — कर्मको गति गहन छ।

Verse 18 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः। स बुद्धिमान् मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत्

English

He who sees inaction in action and action in inaction, he is wise among men; he is a yogi and performer of all actions.

Hindi

जो पुरुष कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म देखता है,  वह मनुष्यों में बुद्धिमान है,  वह योगी सम्पूर्ण कर्मों को करने वाला है।।

Nepali

जसले कर्ममा अकर्म र अकर्ममा कर्म देख्छ, त्यो मानिसहरूमा बुद्धिमान् हो; त्यो योगयुक्त सबै कर्मको कर्ता हो।

Verse 19 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

यस्य सर्वे समारम्भाः कामसङ्कल्पवर्जिताः। ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः

English

He whose undertakings are all devoid of desires and selfish purposes, and whose actions have been burned by the fire of knowledge, the wise call him a sage.

Hindi

जिसके समस्त कार्य कामना और संकल्प से रहित हैं,  ऐसे उस ज्ञानरूप अग्नि के द्वारा भस्म हुये कर्मों वाले पुरुष को ज्ञानीजन पण्डित कहते हैं।।

Nepali

जसका सबै कार्यारम्भ कामना र सङ्कल्पबाट रहित छन् र जसका कर्म ज्ञानको आगोले भस्म भएका छन्, उसैलाई पण्डितहरूले विद्वान् भन्छन्।

Verse 20 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः। कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित्करोति सः

English

Having abandoned attachment to the fruits of the action, ever content, depending on nothing, he does not do anything even while being engaged in activity.

Hindi

जो पुरुष,  कर्मफलासक्ति को त्यागकर,  नित्यतृप्त और सब आश्रयों से रहित है वह कर्म में प्रवृत्त होते हुए भी (वास्तव में) कुछ भी नहीं करता है।।

Nepali

कर्मफलमा आसक्ति त्यागेर सदा सन्तुष्ट, कुनै कुरामा निर्भर नभएको पुरुष कर्ममा प्रवृत्त भए पनि केही गर्दैन।

Verse 21 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः। शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्

English

Without hope, controlling the mind and the self, having abandoned all covetousness, and performing only bodily actions, one incurs no sin.

Hindi

जो आशा रहित है तथा जिसने चित्त और आत्मा (शरीर) को संयमित किया है,  जिसने सब परिग्रहों का त्याग किया है,  ऐसा पुरुष शारीरिक कर्म करते हुए भी पाप को नहीं प्राप्त होता है।।

Nepali

आशारहित, चित्तसंयमी, सर्वस्वत्यागी पुरुषले शरीरमात्रको कर्म गर्दा कुनै पाप लाग्दैन।

Verse 22 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः। समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते

English

Content with what comes to him without effort, free from the pairs of opposites and envy, even-minded in success and failure, he acts yet is not bound.

Hindi

यदृच्छया (अपने आप) जो कुछ प्राप्त हो उसमें ही सन्तुष्ट रहने वाला,  द्वन्द्वों से अतीत तथा मत्सर से रहित,  सिद्धि व असिद्धि में समभाव वाला पुरुष कर्म करके भी नहीं बन्धता है।।

Nepali

स्वाभाविक रूपले प्राप्त भएकोमा सन्तुष्ट, द्वन्द्वातीत, मात्सर्यरहित, सिद्धि-असिद्धिमा समान — त्यो कर्म गरेर पनि बाँधिँदैन।

Verse 23 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः। यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते

English

To one who is devoid of attachment, who is liberated, whose mind is established in knowledge, and who works for the sake of sacrifice (for the sake of God), the whole action is dissolved.

Hindi

जो आसक्तिरहित और मुक्त है,  जिसका चित्त ज्ञान में स्थित है,  यज्ञ के लिये आचरण करने वाले ऐसे पुरुष के समस्त कर्म लीन हो जाते हैं।।

Nepali

जो आसक्तिरहित, मुक्त, ज्ञानमा स्थित चित्तले यज्ञको भावना राखेर कर्म गर्छ, उसको सम्पूर्ण कर्म विलीन हुन्छ।

Verse 24 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

ब्रह्मार्पणं ब्रह्महविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्। ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना

English

Brahman is the oblation; Brahman is the melted butter (ghee); by Brahman is the oblation poured into the fire of Brahman; Brahman indeed shall be attained by one who always sees Brahman in action.

Hindi

अर्पण (अर्थात् अर्पण करने का साधन श्रुवा) ब्रह्म है और हवि (शाकल्य अथवा हवन करने योग्य द्रव्य) भी ब्रह्म है;  ब्रह्मरूप अग्नि में ब्रह्मरूप कर्ता के द्वारा जो हवन किया गया है,  वह भी ब्रह्म ही है। इस प्रकार ब्रह्मरूप कर्म में समाधिस्थ पुरुष का गन्तव्य भी ब्रह्म ही है।।

Nepali

अर्पण ब्रह्म, हवन ब्रह्म, ब्रह्मरूपी आगोमा ब्रह्मद्वारा ब्रह्म नै हवन गरिएको हुन्छ; ब्रह्ममा एकाग्र कर्मवाला त्यो पुरुषले ब्रह्म नै प्राप्त गर्छ।

Verse 25 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते। ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति

English

Some yogis perform sacrifice to the gods alone; while others, who have realized the Self, offer the Self as sacrifice in the fire of Brahman alone.

Hindi

कोई योगीजन देवताओं के पूजनरूप यज्ञ को ही करते हैं ; और दूसरे (ज्ञानीजन) ब्रह्मरूप अग्नि में यज्ञ के द्वारा यज्ञ को हवन करते हैं।।

Nepali

कोही योगीहरूले दैव-यज्ञ मात्र गर्छन्; अरूले ब्रह्मरूपी अग्निमा यज्ञद्वारा यज्ञ नै हवन गर्छन्।

Verse 26 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति। शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति

English

Some again offer the organ of hearing and other senses as a sacrifice in the fire of restraint; others offer sound and other objects of the senses as a sacrifice in the fire of the senses.

Hindi

अन्य (योगीजन) श्रोत्रादिक सब इन्द्रियों को संयमरूप अग्नि में हवन करते हैं,  और अन्य (लोग) शब्दादिक विषयों को इन्द्रियरूप अग्नि में हवन करते हैं।।

Nepali

केहीले श्रोत्रादि इन्द्रियलाई संयमको आगोमा हवन गर्छन्; अरूले शब्दादि विषयलाई इन्द्रियरूपी आगोमा हवन गर्छन्।

Verse 27 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे। आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते

English

Others again sacrifice all the functions of the senses and those of the breath (vital energy, or Prana) in the fire of the Yoga of self-restraint, kindled by knowledge.

Hindi

दूसरे (योगीजन) सम्पूर्ण इन्द्रियों के तथा प्राणों के कर्मों को ज्ञान से प्रकाशित आत्मसंयमयोगरूप अग्नि में हवन करते हैं।।

Nepali

केहीले इन्द्रिय र प्राणका सम्पूर्ण क्रियालाई ज्ञानप्रदीप्त आत्मसंयम-योगरूपी आगोमा हवन गर्छन्।

Verse 28 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे। स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः संशितव्रताः

English

Others again offer wealth, austerity, and Yoga as sacrifice, while ascetics of self-restraint and rigid vows offer the study of scriptures and knowledge as sacrifice.

Hindi

कुछ (साधक) द्रव्ययज्ञ, तपयज्ञ और योगयज्ञ करने वाले होते हैं;  और दूसरे कठिन व्रत करने वाले स्वाध्याय और ज्ञानयज्ञ करने वाले योगीजन होते हैं।।

Nepali

केही धन-यज्ञ, तप-यज्ञ र योग-यज्ञ गर्छन्; अरू तीव्र व्रत धारणकर्ता यतिहरू स्वाध्याय र ज्ञान-यज्ञ गर्छन्।

Verse 29 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

अपाने जुह्वति प्राण प्राणेऽपानं तथाऽपरे। प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः

English

Others offer as sacrifice the outgoing breath into the incoming, and the incoming into the outgoing, restraining the flow of the outgoing and the incoming breaths, solely absorbed in the restraint of the breath.

Hindi

अन्य (योगीजन) अपानवायु में प्राणवायु को हवन करते हैं,  तथा प्राण में अपान की आहुति देते हैं,  प्राण और अपान की गति को रोककर,  वे प्राणायाम के ही समलक्ष्य समझने वाले होते हैं।।

Nepali

अरू प्राणायामपरायण भएर अपानमा प्राण र प्राणमा अपानको हवन गर्छन्, प्राण-अपानको गति रोक्छन्।

Verse 30 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

अपरे नियताहाराः प्राणान्प्राणेषु जुह्वति। सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः

English

Others who regulate their diet offer life-breaths in each life-breath. All these are knowers of sacrifice, whose sins are destroyed through sacrifice.

Hindi

दूसरे नियमित आहार करने वाले (साधक जन) प्राणों को प्राणों में हवन करते हैं। ये सभी यज्ञ को जानने वाले हैं, जिनके पाप यज्ञ के द्वारा नष्ट हो चुके हैं।।

Nepali

कोही आहार नियन्त्रण गरेर प्राणहरूको हवन प्राणहरूमा गर्छन्; यी सबै यज्ञवेत्ता हुन्, यज्ञद्वारा क्षीणपाप हुन्छन्।

Verse 31 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम्। नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतो़ऽन्यः कुरुसत्तम

English

Those who eat the remnants of the sacrifice, which are like nectar, go to the eternal Brahman. This world is not for the one who does not perform sacrifice; how then can they have the other, O Arjuna?

Hindi

हे कुरुश्रेष्ठ ! यज्ञ के अवशिष्ट अमृत को भोगने वाले पुरुष सनातन ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। यज्ञ रहित पुरुष को यह लोक भी नहीं मिलता,  फिर परलोक कैसे मिलेगा?

Nepali

यज्ञशेषरूपी अमृत खाने पुरुषहरू सनातन ब्रह्मलाई प्राप्त हुन्छन्; यज्ञ नगर्नेलाई न यो लोक छ न परलोक — हे कुरुश्रेष्ठ!

Verse 32 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे। कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे

English

Thus, manifold sacrifices are spread out before Brahman at the face of Brahman. Know them all to be born of action, and thus knowing, you shall be liberated.

Hindi

ऐसे अनेक प्रकार के यज्ञों का ब्रह्मा के मुख अर्थात् वेदों में प्रसार है अर्थात् वर्णित हैं। उन सब को कर्मों से उत्पन्न हुए जानो;  इस प्रकार जानकर तुम मुक्त हो जाओगे।।

Nepali

यसरी ब्रह्मको मुखमा अनेक प्रकारका यज्ञ फैलिएका छन्; ती सबै कर्मबाट उत्पन्न हुन् भनी जानेर तिमी मुक्त हुनेछौ।

Verse 33 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप। सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते

English

Superior is wisdom-sacrifice to the sacrifice with objects, O Parantapa (scorcher of the foes). All actions in their entirety, O Arjuna, culminate in knowledge.

Hindi

हे परन्तप ! द्रव्यों से सम्पन्न होने वाले यज्ञ की अपेक्षा ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठ है। हे पार्थ ! सम्पूर्ण अखिल कर्म ज्ञान में समाप्त होते हैं,  अर्थात् ज्ञान उनकी पराकाष्ठा है।।

Nepali

हे परन्तप! द्रव्यमय यज्ञभन्दा ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठ छ; हे पार्थ! सम्पूर्ण कर्म ज्ञानमा पर्यवसित हुन्छ।

Verse 34 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया। उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः

English

Know that the wise who have realized the truth will instruct thee in that knowledge through long prostration, supplication, and service.

Hindi

उस (ज्ञान) को (गुरु के समीप जाकर) साष्टांग प्रणिपात,  प्रश्न तथा सेवा करके जानो;  ये तत्त्वदर्शी ज्ञानी पुरुष तुम्हें ज्ञान का उपदेश करेंगे।।

Nepali

त्यो ज्ञान तत्त्वदर्शी ज्ञानीहरूको शरणमा गएर प्रणाम, प्रश्न र सेवाद्वारा जान — उहाँहरूले तिमीलाई ज्ञान दिनेछन्।

Verse 35 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव। येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि

English

Knowing that thou shalt not, O Arjuna, again be deluded like this; and by that thou shalt see all beings in thyself and also in me.

Hindi

जिसको जानकर तुम पुन इस प्रकार मोह को नहीं प्राप्त होगे,  और हे पाण्डव ! जिसके द्वारा तुम भूतमात्र को अपने आत्मस्वरूप में तथा मुझमें भी देखोगे।।

Nepali

त्यो ज्ञान पाएपछि हे पाण्डव! तिमी पुनः यस्तो मोहमा पर्ने छैनौ; अनि सबै प्राणीलाई आफूमा र मलाई आफूमा देख्नेछौ।

Verse 36 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः। सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि

English

Even if thou art the most sinful of all sinners, yet thou shalt surely cross over all sins by the raft of knowledge.

Hindi

यदि तुम सब पापियों से भी अधिक पाप करने वाले हो,  तो भी ज्ञानरूपी नौका द्वारा,  निश्चय ही सम्पूर्ण पापों का तुम संतरण कर जाओगे।।

Nepali

यदि तिमी सबै पापीहरूमा सबभन्दा पापी पनि होऊ भने पनि ज्ञानरूपी डुङ्गाले सम्पूर्ण पापसमुद्र तरिने छौ।

Verse 37 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन। ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा

English

As the blazing fire reduces fuel to ashes, O Arjuna, so does the fire of knowledge reduce all actions to ash.

Hindi

जैसे प्रज्जवलित अग्नि ईन्धन को भस्मसात् कर देती है,  वैसे ही,  हे अर्जुन ! ज्ञानरूपी अग्नि सम्पूर्ण कर्मों को भस्मसात् कर देती है।।

Nepali

हे अर्जुन! जसरी प्रज्वलित आगोले काठलाई खरानी बनाउँछ, त्यसरी नै ज्ञानरूपी आगोले सम्पूर्ण कर्मलाई खरानी बनाउँछ।

Verse 38 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते। तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति

English

Verily, there is no purifier in this world like knowledge. He who is perfected in Yoga finds it within the Self in due time.

Hindi

इस लोक में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला,  निसंदेह,  कुछ भी नहीं है। योग में संसिद्ध पुरुष स्वयं ही उसे (उचित) काल में आत्मा में प्राप्त करता है।।

Nepali

यस संसारमा ज्ञानजस्तो पवित्र अरू केही छैन; योगमा सिद्ध भएको पुरुषले समयक्रममा आफै आफ्नो अन्तरमा यो ज्ञान पाउँछ।

Verse 39 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः। ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति

English

The one who is full of faith, devoted to it, and has subdued their senses obtains this knowledge; and upon obtaining the knowledge, they attain the supreme peace immediately.

Hindi

श्रद्धावान्,  तत्पर और जितेन्द्रिय पुरुष ज्ञान प्राप्त करता है। ज्ञान को प्राप्त करके शीघ्र ही वह परम शान्ति को प्राप्त होता है।।

Nepali

श्रद्धालु, तत्पर, जितेन्द्रिय पुरुषले ज्ञान प्राप्त गर्छ; ज्ञान पाएर तुरुन्तै परम शान्ति लाभ गर्छ।

Verse 40 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति। नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः

English

The ignorant, the faithless, and the doubting self go to destruction; there is neither this world nor the other, nor happiness for the doubting one.

Hindi

अज्ञानी तथा श्रद्धारहित और संशययुक्त पुरुष नष्ट हो जाता है,  (उनमें भी) संशयी पुरुष के लिये न यह लोक है,  न परलोक और न सुख।।

Nepali

अज्ञानी, श्रद्धाहीन र संशयी मानिस नष्ट हुन्छ; संशयी पुरुषलाई न यो लोक, न परलोक, न सुख प्राप्त हुन्छ।

Verse 41 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

योगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसंछिन्नसंशयम्। आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय

English

He who has renounced actions through Yoga, whose doubts have been dispelled by knowledge, and who is self-possessed—such a one is not bound by actions, O Arjuna.

Hindi

जिसने योगद्वारा कर्मों का संन्यास किया है,  ज्ञानद्वारा जिसके संशय नष्ट हो गये हैं,  ऐसे आत्मवान् पुरुष को,  हे धनंजय ! कर्म नहीं बांधते हैं।।

Nepali

हे धनञ्जय! योगद्वारा कर्म त्याग गरेर ज्ञानद्वारा संशय छिनालेका आत्मवान् पुरुषलाई कर्मले बाँध्न सक्दैन।

Verse 42 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

तस्मादज्ञानसंभूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनाऽऽत्मनः। छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत

English

Therefore, with the sword of knowledge (of the Self), cut asunder the doubt of the self, born of ignorance, residing in your heart, and take refuge in Yoga. Arise, O Arjuna!

Hindi

इसलिये अपने हृदय में स्थित अज्ञान से उत्पन्न आत्मविषयक संशय को ज्ञान खड्ग से काटकर,  हे भारत ! योग का आश्रय लेकर खड़े हो जाओ।।

Nepali

त्यसैले हे भारत! अज्ञानले उत्पन्न तिम्रो हृदयमा रहेको यो संशयलाई आत्मज्ञानरूपी तरबारले काट; योगमा स्थित भएर उठ हे अर्जुन!