Chapter 13

Kshetra Kshetrajna Vibhaga Yoga

The thirteenth chapter of the Bhagavad Gita is "Ksetra Ksetrajna Vibhaaga Yoga". The word "kshetra" means "the field", and the "kshetrajna" means "the knower of the field". We can think of our material body as the field and our immortal soul as the knower of the field. In this chapter, Krishna discriminates between the physical body and the immortal soul. He explains that the physical body is temporary and perishable whereas the soul is permanent and eternal. The physical body can be destroyed but the soul can never be destroyed. The chapter then describes God, who is the Supreme Soul. All the individual souls have originated from the Supreme Soul. One who clearly understands the difference between the body, the Soul and the Supreme Soul attains the realization of Brahman.

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Verse 1 अर्जुन उवाच · Arjuna speaks
Sanskrit

अर्जुन उवाच प्रकृतिं पुरुषं चैव क्षेत्रं क्षेत्रज्ञमेव च। एतद्वेदितुमिच्छामि ज्ञानं ज्ञेयं च केशव

English

Arjuna said, "I wish to learn about Nature and the Spirit, the field and the knower of the field, knowledge and that which ought to be known, O Kesava."

Hindi

अर्जुन ने कहा -- हे केशव ! मैं, प्रकृति और पुरुष, क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ तथा ज्ञान और ज्ञेय को जानना चाहता हूँ।।

Nepali

अर्जुनले भने — हे केशव! म प्रकृति र पुरुष, क्षेत्र र क्षेत्रज्ञ, ज्ञान र ज्ञेय जान्न चाहन्छु।

Verse 2 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

श्री भगवानुवाचइदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते।एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः

English

The Blessed Lord said, "O Arjuna, this body is called the field; he who knows it is called the knower of the field by those who know them."

Hindi

श्रीभगवान् ने कहा -- हे कौन्तेय ! यह शरीर क्षेत्र कहा जाता है और इसको जो जानता है, उसे तत्त्वज्ञ जन, क्षेत्रज्ञ कहते हैं।।

Nepali

श्रीभगवान्ले भने — हे कौन्तेय! यो शरीर 'क्षेत्र' कहलिन्छ; यसलाई जान्ने पुरुषलाई तत्त्ववेत्ताहरूले 'क्षेत्रज्ञ' भन्छन्।

Verse 3 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत। क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम

English

Do thou also know Me as the knower of the field in all fields, O Arjuna. Knowledge of both the field and the knower of the field is considered by Me to be the knowledge.

Hindi

हे भारत ! तुम समस्त क्षेत्रों में क्षेत्रज्ञ मुझे ही जानो। क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का जो ज्ञान है, वही (वास्तव में) ज्ञान है , ऐसा मेरा मत है।।

Nepali

हे भारत! सम्पूर्ण क्षेत्रहरूमा मलाई पनि क्षेत्रज्ञ जान; क्षेत्र र क्षेत्रज्ञको ज्ञान नै वास्तविक ज्ञान हो भन्ने मेरो मत हो।

Verse 4 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

तत्क्षेत्रं यच्च यादृक् च यद्विकारि यतश्च यत्।स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे श्रृणु

English

Hear from Me in brief what the field is, of what nature it is, what its modifications are, whence it is, who He is, and what His powers are.

Hindi

इसलिये, वह क्षेत्र जो है और जैसा है तथा जिन विकारों वाला है, और जिस (कारण) से जो (कार्य) हुआ है तथा वह (क्षेत्रज्ञ) भी जो है और जिस प्रभाव वाला है, वह संक्षेप में मुझसे सुनो।।

Nepali

क्षेत्र के हो, कस्तो स्वभावको हो, कस्ता विकार छन्, कहाँबाट आउँछ, र क्षेत्रज्ञ को हो, उसको प्रभाव कस्तो — सङ्क्षेपमा मसँग सुन।

Verse 5 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक्।ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्िचतैः

English

Sages have sung in many ways, with various distinctive chants and also with suggestive words indicative of the Absolute, full of reasoning and decisive.

Hindi

(क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ के विषय में) ऋषियों द्वारा विभिन्न और विविध छन्दों में बहुत प्रकार से गाया गया है, तथा सम्यक् प्रकार से निश्चित किये हुये युक्तियुक्त ब्रह्मसूत्र के पदों द्वारा (अर्थात् ब्रह्म के सूचक शब्दों द्वारा) भी (वैसे ही कहा गया है)।।

Nepali

ऋषिहरूले विविध रूपले र छुट्टा-छुट्टै छन्दहरूले गाएका छन्, हेतुसहित विनिश्चित ब्रह्म-सूत्रहरूमा पनि भनिएको छ।

Verse 6 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

महाभूतान्यहङ्कारो बुद्धिरव्यक्तमेव च।इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः

English

The great elements, egoism, intellect, and also the Unmanifested Nature, the ten senses, and one mind, and the five objects of the senses.

Hindi

पंच महाभूत, अहंकार, बुद्धि, अव्यक्त (प्रकृति), दस इन्द्रियाँ, एक मन, इन्द्रियों के पाँच विषय।।

Nepali

पञ्चमहाभूत, अहङ्कार, बुद्धि, अव्यक्त प्रकृति, दश इन्द्रिय, एक मन र पाँच विषय —

Verse 7 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्घातश्चेतनाधृतिः।एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम्

English

Desire, hatred, pleasure, pain, the aggregate (body), intelligence, and fortitude—the field has thus been briefly described with its modifications.

Hindi

इच्छा, द्वेष, सुख, दुख, संघात (स्थूलदेह), चेतना (अन्त:करण की चेतन वृत्ति) तथा धृति -  इस प्रकार यह क्षेत्र विकारों के सहित संक्षेप में कहा गया है।।

Nepali

इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, सङ्घात (शरीर), चेतना, धैर्य — यो विकारसहित क्षेत्र सङ्क्षेपमा बताइयो।

Verse 8 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम्।आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः

English

Humility, unpretentiousness, non-injury, forgiveness, uprightness, service to the teacher, purity, steadfastness, and self-control.

Hindi

अमानित्व, अदम्भित्व, अहिंसा, क्षमा, आर्जव, आचार्य की सेवा, शुद्धि, स्थिरता और आत्मसंयम।।

Nepali

अमानित्व, अदम्भित्व, अहिंसा, क्षमा, सरलता, गुरुसेवा, शौच, स्थिरता र आत्मसंयम —

Verse 9 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहङ्कार एव च।जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम्

English

Indifference to the objects of the senses and also absence of egoism; perceiving the evil in birth, death, old age, sickness, and pain.

Hindi

इन्द्रियों के विषय के प्रति वैराग्य, अहंकार का अभाव, जन्म, मृत्यु, वृद्धवस्था, व्याधि और दुख में दोष दर्शन...৷৷.।।

Nepali

इन्द्रिय-विषयमा वैराग्य, अहङ्कारको अभाव, जन्म-मरण-जरा-व्याधि-दुःखमा दोषदर्शन —

Verse 10 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

असक्ितरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु।नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु

English

Non-attachment, non-identification of the Self with son, wife, home, and the rest, and constant even-mindedness in the face of the attainment of both desirable and undesirable.

Hindi

आसक्ति तथा पुत्र, पत्नी, गृह आदि में अनभिष्वङ्ग (तादात्म्य का अभाव); और इष्ट और अनिष्ट की प्राप्ति में समचित्तता।।

Nepali

पुत्र, पत्नी, गृह आदिमा आसक्ति र ममताको अभाव, प्रिय-अप्रियको प्राप्तिमा नित्य समचित्तता —

Verse 11 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

मयि चानन्ययोगेन भक्ितरव्यभिचारिणी।विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि

English

Unswerving devotion to Me through the Yoga of non-separation, resorting to solitary places, and a distaste for the company of people.

Hindi

अनन्ययोग के द्वारा मुझमें अव्यभिचारिणी भक्ति; एकान्त स्थान में रहने का स्वभाव और (असंस्कृत) जनों के समुदाय में अरुचि।।

Nepali

ममा अव्यभिचारिणी अनन्ययोगले भक्ति, एकान्तप्रिय वास, जनसमूहमा अरुचि —

Verse 12 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम्।एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोन्यथा

English

Constancy in Self-knowledge, the perception of the end of true knowledge—this is declared to be knowledge, and what is opposed to it is ignorance.

Hindi

अध्यात्मज्ञान में नित्यत्व अर्थात् स्थिरता तथा तत्त्वज्ञान के अर्थ रूप परमात्मा का दर्शन, यह सब तो ज्ञान कहा गया है, और जो इससे विपरीत है, वह अज्ञान है।।

Nepali

अध्यात्म-ज्ञानमा नित्यता, तत्त्व-ज्ञानको अर्थको प्रत्यक्ष-दर्शन — यो सबै ज्ञान भनिन्छ; यसको विपरीत अज्ञान हो।

Verse 13 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वाऽमृतमश्नुते।अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते

English

I will declare that which is to be known, knowing which one attains immortality; the beginningless Supreme Brahman, which is neither being nor non-being.

Hindi

मैं उस ज्ञेय वस्तु को स्पष्ट कहूंगा जिसे जानकर मनुष्य अमृतत्व को प्राप्त करता है। वह ज्ञेय है - अनादि, परम ब्रह्म, जो न सत् और न असत् ही कहा जा सकता है।।

Nepali

ज्ञेय अर्थात् जान्नुपर्ने त्यो वस्तु म तिमीलाई भन्छु, जुन जानेर मानिसले अमृतत्व प्राप्त गर्छ — अनादि परब्रह्म, जो न सत् भनिन्छ न असत्।

Verse 14 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्।सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति

English

With hands and feet everywhere, with eyes, heads, and mouths everywhere, with ears everywhere, He exists in the worlds, enveloping all.

Hindi

वह सब ओर हाथ-पैर वाला है और सब ओर से नेत्र, शिर और मुखवाला तथा सब ओर से श्रोत्रवाला है; वह जगत् में सबको व्याप्त करके स्थित है।।

Nepali

जसका सबैतिर हात, सबैतिर पाउँ, सबैतिर आँखा, सबैतिर शिर र मुख, सबैतिर कान — त्यो सबैलाई व्याप्त गरेर रहन्छ।

Verse 15 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम्।असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च

English

Shining by the functions of all the senses, yet without being attached to them; unattached, yet supporting all; devoid of qualities, yet the experiencer of them.

Hindi

वह समस्त इन्द्रियों के गुणो (कार्यों) के द्वारा प्रकाशित होने वाला, परन्तु (वस्तुत:) समस्त इन्द्रियों से रहित है; आसक्ति रहित तथा गुण रहित होते हुए भी सबको धारणपोषण करने वाला और गुणों का भोक्ता है।।

Nepali

सम्पूर्ण इन्द्रियका धर्मद्वारा प्रकाशित भए पनि स्वयं इन्द्रियरहित; अनासक्त भएर पनि सबैको पालक; निर्गुण भएर पनि गुणको भोक्ता।

Verse 16 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च।सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत्

English

It is within and without all beings, both the unmoving and the moving; It is subtle and unknowable, and It is near and far away.

Hindi

(वह ब्रह्म) भूत मात्र के अन्तर्बाह्य स्थित है; वह चर है और अचर भी। सूक्ष्म होने से वह अविज्ञेय है; वह सुदूर और अत्यन्त समीपस्थ भी है।।

Nepali

त्यो सबै प्राणीको बाहिर र भित्र छ; चर र अचर सबैमा छ; सूक्ष्म भएकाले अज्ञेय छ; नजिक पनि छ र टाढा पनि।

Verse 17 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम्।भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च

English

Undivided yet, It exists as if divided in beings; It is to be known as the supporter of beings; It devours and It generates.

Hindi

और वह अविभक्त है, तथापि वह भूतों में विभक्त के समान स्थित है। वह ज्ञेय ब्रह्म भूतमात्र का भर्ता, संहारकर्ता और उत्पत्ति कर्ता है।।

Nepali

अविभक्त भएर पनि प्राणीहरूमा विभक्त जस्तो देखिन्छ; भूतहरूको भर्ता हो, ग्रासकर्ता र उत्पादनकर्ता पनि त्यही हो भनी जान।

Verse 18 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते।ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम्

English

That Light of all lights is said to be beyond darkness: knowledge, the knowable, and the goal of knowledge, seated in the hearts of all.

Hindi

(वह ब्रह्म) ज्योतियों की भी ज्योति और (अज्ञान) अन्धकार से परे कहा जाता है। वह ज्ञान (चैतन्यस्वरूप) ज्ञेय और ज्ञान के द्वारा जानने योग्य (ज्ञानगम्य) है। वह सभी के हृदय में स्थित है।।

Nepali

ज्योतिहरूको पनि ज्योति, अन्धकारभन्दा परको त्यो ज्ञान, ज्ञेय र ज्ञानगम्य सबैको हृदयमा अवस्थित छ।

Verse 19 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः।मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते

English

Thus, the field, as well as knowledge and the knowable, have been briefly stated. My devotee, knowing this, enters into My being.

Hindi

इस प्रकार, (मेरे द्वारा) क्षेत्र, ज्ञान और ज्ञेय को संक्षेपत: कहा गया। इसे तत्त्व से जानकर (विज्ञाय) मेरा भक्त मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है।।

Nepali

यसरी क्षेत्र, ज्ञान र ज्ञेय सङ्क्षेपमा बताइयो; मेरा भक्तले यसलाई जानेर मेरो स्वरूपमा प्रवेश गर्छ।

Verse 20 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि।विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसंभवान्

English

Know that Nature (matter) and the Spirit are both beginningless, and know also that all modifications and qualities are born from Nature.

Hindi

प्रकृति और पुरुष इन दोनों को ही तुम अनादि जानो। और तुम यह भी जानो कि सभी विकार और गुण प्रकृति से ही उत्पन्न हुए हैं।।

Nepali

प्रकृति र पुरुष दुवै अनादि हुन् भनी जान; र विकार र गुणहरू सबै प्रकृतिबाट उत्पन्न हुन् भनी पनि जान।

Verse 21 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

कार्यकारणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते।पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते

English

In the production of the effect and the cause, Nature (matter) is said to be the cause; in the experience of pleasure and pain, the soul is said to be the one responsible.

Hindi

कार्य और कारण के उत्पन्न करने में हेतु प्रकृति कही जाती है और पुरुष सुख-दु:ख के भोक्तृत्व में हेतु कहा जाता है।।

Nepali

कार्य र कारणको उत्पादनमा प्रकृति कारण भनिन्छ; सुख-दुःखको भोगमा पुरुष कारण भनिन्छ।

Verse 22 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान्।कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु

English

The soul seated in Nature experiences the qualities born of Nature; attachment to the qualities is the cause of its birth in good and evil wombs.

Hindi

प्रकृति में स्थित पुरुष प्रकृति से उत्पन्न गुणों को भोगता है। इन गुणों का संग ही इस पुरुष (जीव) के शुभ और अशुभ योनियों में जन्म लेने का कारण है।।

Nepali

प्रकृतिमा स्थित पुरुष प्रकृतिजात गुणहरूलाई भोग्छ; गुणसङ्गले उसको शुभाशुभ योनिमा जन्म हुने कारण बन्छ।

Verse 23 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

उपद्रष्टाऽनुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः।परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः

English

The Supreme Soul in this body is also called the observer, the permitter, the sustainer, the enjoyer, the great Lord, and the Supreme Self.

Hindi

परम पुरुष ही इस देह में उपद्रष्टा, अनुमन्ता ,भर्ता, भोक्ता, महेश्वर और परमात्मा कहा जाता है।।

Nepali

यस शरीरमा रहेको परम पुरुष नै उपद्रष्टा, अनुमन्ता, भर्ता, भोक्ता, महेश्वर र परमात्मा भनिन्छ।

Verse 24 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैःसह।सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते

English

He who thus knows the Spirit and Matter together with their qualities, in whatever condition he may be, he is not reborn.

Hindi

इस प्रकार पुरुष और गुणों के सहित प्रकृति को जो मनुष्य जानता है, वह सब प्रकार से रहता हुआ (व्यवहार करता हुआ) भी पुन: नहीं जन्मता है।।

Nepali

जसले पुरुष र गुणसहितको प्रकृतिलाई यसरी जान्छ, ऊ जुनसुकै अवस्थामा बाँचे पनि पुनः जन्मिँदैन।

Verse 25 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना।अन्ये सांख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे

English

Some behold the Self within themselves through meditation, others through the Yoga of knowledge, and still others through the Yoga of action.

Hindi

कोई पुरुष ध्यान के अभ्यास से आत्मा को आत्मा (हृदय) में आत्मा (शुद्ध बुद्धि) के द्वारा देखते हैं; अन्य लोग सांख्य योग के द्वारा तथा कोई साधक कर्मयोग से (आत्मा को देखते हैं )।।

Nepali

कोहीले ध्यानद्वारा आत्मामा आत्मा देख्छन्; अरूले साङ्ख्य-योगद्वारा; अरूले कर्म-योगद्वारा।

Verse 26 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वाऽन्येभ्य उपासते।तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः

English

Others, too, who do not know thus, worship, having heard of It from others; they, too, cross beyond death, regarding what they have heard as the supreme refuge.

Hindi

परन्तु, अन्य लोग जो स्वयं इस प्रकार न जानते हुए, दूसरों से (आचार्यों से) सुनकर ही उपासना करते हैं, वे श्रुतिपरायण (अर्थात् श्रवण ही जिनके लिए परम साधन है) लोग भी मृत्यु को नि:सन्देह तर जाते हैं।।

Nepali

अरूले यो विधि नजान्दा पनि अरूबाट सुनेर उपासना गर्छन्; ती श्रवण-परायण पनि मृत्युलाई तर्छन्।

Verse 27 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

यावत्सञ्जायते किञ्चित्सत्त्वं स्थावरजङ्गमम्।क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ

English

Wherever a being is born, whether unmoving or moving, know thou, O best of the Bharatas (Arjuna), that it is from the union of the field and its knower.

Hindi

हे भरत श्रेष्ठ ! यावन्मात्र जो कुछ भी स्थावर जंगम (चराचर) वस्तु उत्पन्न होती है, उस सबको तुम क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के संयोग से उत्पन्न हुई जानो।।

Nepali

हे भरतर्षभ! जे जति प्राणी उत्पन्न हुन्छन् — चर वा अचर — ती सबै क्षेत्र र क्षेत्रज्ञको संयोगबाट उत्पन्न भएका जान।

Verse 28 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्।विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति

English

He who sees the Supreme Lord existing truly in all beings, the imperishable within the perishable, sees indeed.

Hindi

जो पुरुष समस्त नश्वर भूतों में अनश्वर परमेश्वर को समभाव से स्थित देखता है, वही (वास्तव में) देखता है।।

Nepali

जसले सबै प्राणीमा समान रूपले अवस्थित परमेश्वर र विनाशशीलहरूमा अविनाशीलाई देख्छ, उसैले यथार्थ देख्छ।

Verse 29 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम्।न हिनस्त्यात्मनाऽऽत्मानं ततो याति परां गतिम्

English

For he who truly sees the same Lord dwelling everywhere does not destroy the Self by the self; rather, he attains the highest goal.

Hindi

निश्चय ही, वह पुरुष सर्वत्र सम भाव से स्थित परमेश्वर को समान हुआ आत्मा (स्वयं) के द्वारा आत्मा (स्वयं) का नाश नहीं करता है, इससे वह परम गति को प्राप्त होता है।।

Nepali

किनकि सर्वत्र समानरूपले अवस्थित ईश्वरलाई देख्ने पुरुषले आफूले आफूलाई नाश गर्दैन र परम गति प्राप्त गर्छ।

Verse 30 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः।यः पश्यति तथाऽऽत्मानमकर्तारं स पश्यति

English

He sees, who sees that all actions are performed solely by Nature and that the Self is without action.

Hindi

जो पुरुष समस्त कर्मों को सर्वश: प्रकृति द्वारा ही किये गये देखता है तथा आत्मा को अकर्ता देखता है, वही (वास्तव में) देखता है।।

Nepali

जसले सबै कर्म प्रकृतिले मात्रै गरिँदै छन् भनी देख्छ र आत्मालाई अकर्ता देख्छ — उसैले यथार्थ देख्छ।

Verse 31 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति।तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा

English

When a person sees all beings as resting in the One and emanating from the One alone, they then become Brahman.

Hindi

यह पुरुष जब भूतों के पृथक् भावों को एक (परमात्मा) में स्थित देखता है तथा उस (परमात्मा) से ही यह विस्तार हुआ जानता है, तब वह ब्रह्म को प्राप्त होता है।।

Nepali

जब मानिसले प्राणीहरूको पृथक्-पृथक् भाव एउटैमा अवस्थित र त्यहीँबाट विस्तार भएको देख्छ, त्यतिबेला नै ब्रह्म प्राप्त गर्छ।

Verse 32 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः।शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते

English

Being without beginning, devoid of any qualities, the Supreme Self, imperishable, though dwelling in the body, O Arjuna, neither acts nor is tainted.

Hindi

हे कौन्तेय ! अनादि और निर्गुण होने से यह परमात्मा अव्यय है। शरीर में स्थित हुआ भी, वस्तुत:, वह न (कर्म) करता है और न (फलों से) लिप्त होता है।।

Nepali

हे कौन्तेय! अनादि, निर्गुण परमात्मा शरीरमा अवस्थित भए पनि न कर्ता हो, न लिप्त हुन्छ।

Verse 33 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते।सर्वत्रावस्थितो देहे तथाऽऽत्मा नोपलिप्यते

English

As the all-pervading ether is not tainted, due to its subtlety, so the Self seated everywhere in the body is not tainted either.

Hindi

जिस प्रकार सर्वगत आकाश सूक्ष्म होने के कारण लिप्त नहीं होता, उसी प्रकार सर्वत्र देह में स्थित आत्मा लिप्त नहीं होता।।

Nepali

जसरी सर्वव्यापी आकाश सूक्ष्म भएकाले लिप्त हुँदैन, त्यसरी नै शरीरमा सर्वत्र अवस्थित आत्मा पनि लिप्त हुँदैन।

Verse 34 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः।क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत

English

Just as the one sun illuminates the entire world, so too does the Lord of the field (Supreme Self) illuminate the entire field, O Arjuna.

Hindi

हे भारत ! जिस प्रकार एक ही सूर्य इस सम्पूर्ण लोक को प्रकाशित करता है, उसी प्रकार एक ही क्षेत्री (क्षेत्रज्ञ) सम्पूर्ण क्षेत्र को प्रकाशित करता है।।

Nepali

जसरी एउटै सूर्यले सम्पूर्ण लोकलाई प्रकाशित गर्छ, त्यसरी नै हे भारत! क्षेत्रीले सम्पूर्ण क्षेत्रलाई प्रकाशित गर्छ।

Verse 35 श्रीभगवानुवाच · Krishna speaks
Sanskrit

क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा।भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम्

English

They who, by the eye of knowledge, perceive the distinction between the field and its knower, as well as the liberation from the Nature of being, go to the Supreme.

Hindi

इस प्रकार, जो पुरुष ज्ञानचक्षु के द्वारा क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के भेद को तथा प्रकृति के विकारों से मोक्ष को जानते हैं, वे परम ब्रह्म को प्राप्त होते हैं।।

Nepali

जसले ज्ञानचक्षुले क्षेत्र र क्षेत्रज्ञको भिन्नता र भूतप्रकृतिबाट मुक्तिको ज्ञान पाउँछन्, ती परम पदलाई प्राप्त गर्छन्।